जोधपुर। नागौर जिले में ग्राम पंचायत सहायकों के चयन में गड़बड़ी और पक्षपात की शिकायतों के बाद तीन अभ्यर्थियों का चयन रद्द करने के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने दखल देने से इनकार कर दिया है।
हाईकोर्ट ने जिला स्तरीय कमेटी के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए कहा कि कमेटी ने संबंधित लोगों को सुनवाई का मौका देने के बाद रिकॉर्ड के आधार पर फैसला लिया था। ऐसे में हाईकोर्ट कमेटी की जगह बैठकर हर तथ्य की दोबारा जांच नहीं कर सकता।
जस्टिस कुलदीप माथुर ने मातादीन सारण, प्रेमसुख और बिमला देवी की याचिका पर फैसला सुनाते हुए चयन रद्द करने के कमेटी के फैसले को बरकरार रखा।
तीनों का चयन ग्राम पंचायत डोबड़ी कलां के सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्राम पंचायत सहायक के पद पर हुआ था। बाद में चयन प्रक्रिया को लेकर शिकायतें सामने आईं और जिला स्तरीय कमेटी ने जांच के बाद उनका चयन रद्द कर दिया था।
हाईकोर्ट ने माना कि कमेटी ने दोबारा सुनवाई के बाद उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर फैसला लिया था, इसलिए इसमें हाईकोर्ट के दखल की जरूरत नहीं है।
52 अभ्यर्थियों ने किया था आवेदन
मामला ग्राम पंचायत डोबड़ी कलां के सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल से जुड़ा है। वर्ष 2017 में ग्राम पंचायत सहायकों की नियुक्ति के लिए 52 अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था।
स्कूल विकास एवं प्रबंधन समिति (SDMC) ने 17 फरवरी 2017 को चयन प्रक्रिया पूरी की। इसमें शैक्षणिक योग्यता, अनुभव और इंटरव्यू में प्रदर्शन को आधार बनाया गया था।
तीनों याचिकाकर्ताओं का चयन हुआ और बाद में जिला स्तर पर मंजूरी मिलने के बाद उन्हें 18 मई 2017 को नियुक्ति आदेश जारी कर दिए गए और तीनों ने काम भी शुरू कर दिया।
शिकायतों के बाद चयन रद्द किया गया
नियुक्ति के बाद चयन प्रक्रिया को लेकर शिकायतें सामने आईं। शिकायतों की जांच के दौरान जिला स्तरीय कमेटी ने चयन प्रक्रिया में तय मानदंडों का पूरी तरह पालन नहीं होने, अनुभव प्रमाणपत्रों को नजरअंदाज करने और कुछ रिश्तेदारों और परिवार के सदस्यों के चयन सहित कई बातों पर सवाल उठाए।
इन शिकायतों और रिकॉर्ड की जांच के बाद कमेटी ने 26 सितंबर 2017 को तीनों याचिकाकर्ताओं का चयन रद्द कर दिया।
इसके खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने मामले में प्रभावित लोगों को सुनवाई का उचित मौका देने और उनके पक्ष पर दोबारा विचार करने के निर्देश दिए।
समिति ने दोबारा सुनवाई के बाद भी चयन रद्द किया
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद जिला स्तरीय कमेटी ने याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का मौका दिया। 6 अगस्त 2018 को हुई सुनवाई में याचिकाकर्ताओं ने अपने अनुभव प्रमाणपत्र, मेरिट सूची, चयन के मानदंड और अधिकारियों की मंजूरी से जुड़े दस्तावेज पेश किए।
याचिकाकर्ताओं ने बताया कि उनके पास विद्यार्थी मित्र के रूप में पांच साल से ज्यादा का अनुभव था। उन्होंने चयन प्रक्रिया में रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाने के आरोपों से भी इनकार किया और अपने पक्ष में मौजूद दस्तावेज कमेटी के सामने रखे।
इसके बावजूद कमेटी ने 15 अगस्त 2018 को उनकी आपत्तियां खारिज कर दीं और चयन रद्द करने का फैसला बरकरार रखा।
कमेटी ने चयन बोर्ड के गठन, तय मानदंडों के पालन, अनुभव प्रमाणपत्रों और रिश्तेदारों के चयन से जुड़े कई पहलुओं को एक साथ देखते हुए चयन प्रक्रिया को पक्षपातपूर्ण और संदिग्ध माना था।
बाद की रिपोर्ट में कुछ आरोपों पर अलग तथ्य सामने आए
मामले में एक अहम तथ्य यह भी सामने आया कि समिति के 15 अगस्त 2018 के आदेश के बाद ब्लॉक प्रारंभिक शिक्षा अधिकारी, मकराना से तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी गई।
7 सितंबर 2018 की इस रिपोर्ट में कहा गया कि याचिकाकर्ताओं के पास जरूरी योग्यता और पर्याप्त अनुभव था। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि एसडीएमसी का पुनर्गठन नहीं हुआ था और इस संबंध में पहले दी गई जानकारी मानवीय भूल के कारण सामने आई थी।
याचिकाकर्ताओं ने इसी रिपोर्ट को अपने पक्ष में आधार बनाया। लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि यह रिपोर्ट 15 अगस्त 2018 के आदेश के बाद तैयार हुई थी। इसलिए जिस समय जिला स्तरीय समिति ने फैसला लिया, उस समय यह रिपोर्ट उसके सामने मौजूद ही नहीं थी।
हाईकोर्ट ने कहा- कमेटी का फैसला खुद से नहीं बदलेगा
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में कोर्ट यह देखता है कि फैसला लेने की प्रक्रिया सही थी या नहीं, संबंधित लोगों को अपनी बात रखने का मौका मिला या नहीं और फैसले के पीछे रिकॉर्ड में कोई आधार था या नहीं। कोर्ट खुद कमेटी की जगह बैठकर तथ्यों की दोबारा जांच नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने माना कि जिला स्तरीय कमेटी ने याचिकाकर्ताओं की बात सुनी और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर फैसला लिया था।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कमेटी का फैसला सिर्फ रिश्तेदारी के आरोप पर आधारित नहीं था। चयन प्रक्रिया से जुड़ी कई बातों को एक साथ देखने के बाद यह फैसला लिया गया था।
इसलिए हाईकोर्ट को इसमें दखल देने का आधार नहीं मिला और इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
याचिका खारिज, 2018 से बनी अंतरिम राहत भी खत्म
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करने के साथ ही 19 नवंबर 2018 को मिली अंतरिम राहत भी खत्म कर दी है। यानी जिस आदेश के कारण तीनों याचिकाकर्ता अब तक सेवा में बने हुए थे, उस पर लगी रोक अब हट गई है।
दरअसल, हाईकोर्ट ने 19 नवंबर 2018 को जिला स्तरीय कमेटी के चयन रद्द करने वाले आदेश पर रोक लगाई थी। इसी वजह से मामले की सुनवाई चलने तक तीनों अपनी सेवा में बने रहे।
इस बीच 8 दिसंबर 2022 को उन्हें राजस्थान सिविल पोस्ट्स (कॉन्ट्रैक्चुअल अपॉइंटमेंट) रूल्स, 2022 के तहत विद्यालय सहायकों के रूप में अलग नियुक्ति मिल गई। लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि बाद में मिली यह नियुक्ति वर्ष 2017 में हुए मूल चयन को सही नहीं ठहराती।
अब अंतरिम राहत खत्म होने के बाद संबंधित अधिकारी जिला स्तरीय कमेटी के चयन रद्द करने वाले आदेश के आधार पर आगे की कार्रवाई कर सकेंगे।