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ED ने कहा मुनेश गुर्जर के घर से बरामद राशि कम, इसलिए ED नहीं करेगी जांच, Highcourt ने खारिज की जन​हित याचिका

Rajasthan Highcourt

जयपुर, 17 अक्टूबर

Rajasthan Highcourt ने जयपुर हेरिटेज नगर निगम की पूर्व मेयर मुनेश गुर्जर के आवास पर हुई ACB की कार्रवाई से जुड़े एक मामले में दायर जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है.

Public Against Corruption कि ओर से दायर याचिका में जयपुर हेरिटेज की तत्कालीन मेयर मुनेश गुर्जर और उनके पति सुशील कुमार गुर्जर के आवास पर हुई छापेमारी में मिले 41,55,500/- रूपए के आधार पर ED से जांच की मांग कि थी.

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बी एस संधू की खंडपीठ ने जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा कि अदालत किसी भी विशेष मामले में यह निर्णय नहीं दे सकती कि ईडी की कार्यवाही प्रारंभ की जानी चाहिए या नहीं.

Rajasthan Highcourt ने कहा कि इस संबंध में निर्णय लेना संबंधित जांच एजेंसी का अधिकार है.

Rajasthan Highcourt ने कहा कि वो इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं करेगा क्योंकि किसी भी प्रकार की टिप्पणी ACB कोर्ट या किसी अन्य प्राधिकरण के समक्ष लंबित मुकदमे को प्रभावित कर सकते हैं और उन व्यक्तियों को भी हानि पहुँचा सकते हैं जो वर्तमान में मुकदमे का सामना कर रहे हैं.

Rajasthan Highcourt ने कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें हाईकोर्ट के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो, और न ही यह जनहित याचिका (Public Interest Litigation) की श्रेणी में आता है.

जनहित याचिका का आधार

अधिवक्ता डॉ. टी. एन. शर्मा और पूनमचंद भंडारी ने Public Against Corruption संस्था की ओर से पैरवी करते हुए कहा कि 4 अगस्त 2024 को तत्कालीन मेयर मुनेश गुर्जर और उनके पति सुशील कुमार गुर्जर के आवास पर हुई छापेमारी में ₹41,55,500/- नकद राशि बरामद हुई थी।

भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) द्वारा तैयार की गई जप्ती रिपोर्ट में इस राशि का उल्लेख किया गया था।

अधिवक्ताओं ने दलील दी कि इतनी बड़ी नकद राशि का बिना किसी वैध कारण के पाया जाना **मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 3 के अंतर्गत अपराध की श्रेणी में आता है।

याचिका में कहा गया कि ईडी को इस मामले की जांच करनी चाहिए और पीएमएलए की धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज करने के निर्देश दिए जाने चाहिए।

अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि बरामद राशि पर किसी ने भी दावा नहीं किया है और आज तक उसके स्रोत का पता नहीं चल सका है, जबकि संबंधित मेयर, उनके पति और कुछ अन्य व्यक्तियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत चार्जशीट दायर की जा चुकी है।

याचिका में यह भी कहा गया कि इतनी बड़ी राशि जब्त होने के कारण ईडी द्वारा अलग से जांच की जानी चाहिए।

ED का जवाब

प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल भरत व्यास और अधिवक्ता अक्षय भारद्वाज ने Public Against Corruption संस्था की ओर से दायर जनहित याचिका का विरोध किया।

ED की ओर से पेश किए गए हलफनामे में कहा गया कि इस मामले में मिली नकद राशि के संबंध में ED ने संज्ञान लिया है और मामले को रिस्क असेसमेंट मॉनिटरिंग कमेटी (RAMC) को भेजा गया था।

ED ने अपने जवाब में कहा कि 09 जुलाई 2025 को ED निदेशक की देखरेख में RAMC की बैठक हुई, जिसमें मुनेश गुर्जर के मामले पर चर्चा की गई।

ED के अनुसार राशि कम

ASG ने अदालत को बताया कि चार्जशीट में अपराध की राशि मात्र ₹3.5 लाख दर्ज की गई है तथा ACB अब तक ₹41 लाख की बरामद राशि और रिश्वत प्रकरण के बीच कोई सीधा संबंध स्थापित नहीं कर सकी है।

ED की ओर से कहा गया कि इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा मामला दर्ज करने के लिए राशि काफी कम है, इसलिए इस चरण पर ईसीआईआर (Enforcement Case Information Report) दर्ज करना उचित नहीं समझा गया।

ED ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में अपराध की राशि में वृद्धि होती है या कोई बड़ी आर्थिक साजिश सामने आती है, तो प्रकरण पर पुनर्विचार किया जाएगा।

हस्तक्षेप से इनकार

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद Rajasthan Highcourt ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला ऐसा नहीं है जिसमें अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो, और न ही यह सार्वजनिक जनहित याचिका की श्रेणी में आता है।

ED की कार्यवाही को लेकर भी हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच करना या न करना स्वयं ED का अधिकार क्षेत्र है। अदालत इस पर अपनी राय नहीं दे सकती।

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