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झूठे मुकदमों में पुलिस अधिकारी स्वयं शिकायत दर्ज नहीं कर सकता, हाईकोर्ट ने कहा-यह अदालत का अधिकार

Kota-based 18-year-old girl and 19-year-old boy received High Court protection after reporting serious threats from family members.

IPC की धारा 211 में पुलिस अधिकारी द्वारा सीधे शिकायत दायर करना कानूनन अवैध, SHO द्वारा दायर शिकायत के आधार पर दर्ज कार्यवाही रद्द

जयपुर, 4 दिसंबर

राजस्थान हाईकोर्ट ने झूठे मुकदमों और झूठे वाद के मामले में एक महत्वपूर्ण रिपोर्टेबल जजमेंट में बड़ी कानूनी व्यवस्था को स्पष्ट करते हुए कहा है कि IPC की धारा 211 यानी झूठा मुकदमा दर्ज कराने के मामलों में पुलिस अधिकारी द्वारा सीधे शिकायत दायर करना कानूनन अवैध है, क्योंकि CrPC की धारा 195(1)(b)(i) के अनुसार यह अधिकार केवल संबंधित अदालत को ही है।

जस्टिस अनुप कुमार ढंड की एकलपीठ ने यह महत्वपूर्ण आदेश याचिकाकर्ता Dev Narayan Gurjar की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में पुलिस अधिकारी द्वारा याचिकाकर्ता के खिलाफ IPC की धारा 211 (झूठा अभियोग लगाने) के तहत दर्ज आपराधिक मामले की कार्यवाही को पूरी तरह से रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि धारा 211 भारतीय दंड संहिता के तहत शुरू की गई कार्यवाही कानून के निर्धारित प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि “धारा 211 IPC से संबंधित मामलों में संज्ञान तभी लिया जा सकता है, जब संबंधित कोर्ट स्वयं लिखित रूप में शिकायत प्रस्तुत करे। यदि कोई कोर्ट ऐसी अनुमति नहीं देता, तो पुलिस अधिकारी द्वारा की गई शिकायत विधिक प्रावधानों के विपरीत मानी जाएगी।”

हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि रिकॉर्ड में कहीं यह नहीं दर्शाया गया है कि निचली अदालत ने SHO को ऐसी शिकायत दायर करने की अनुमति दी थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में SHO की शिकायत उसके अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) से बाहर है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि “किसी शिकायत पर नकारात्मक फाइनल रिपोर्ट लग जाने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि शिकायतकर्ता ने झूठा अभियोग लगाया था। ऐसे मामलों में अदालत को स्वतंत्र रूप से संतुष्ट होना आवश्यक है।”

हाईकोर्ट ने निचली अदालत पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि “संज्ञान लेते समय मजिस्ट्रेट द्वारा आवश्यक न्यायिक संतुष्टि (judicial satisfaction) दर्ज नहीं की गई है। संज्ञान आदेश में आवश्यक कारणों (reasons) का उल्लेख नहीं किया गया है, जो कि न्यायिक आदेश के लिए आवश्यक है।”

हाईकोर्ट ने कहा कि “पूरी प्रक्रिया में वह सावधानी और वैधानिक पालन नहीं दिखता, जो धारा 195 CrPC जैसे प्रतिबंधात्मक प्रावधानों वाले मामलों में अपेक्षित होता है।”

यह है मामला

25 वर्षीय दुबली (जयपुर) निवासी याचिकाकर्ता देव नारायण गुर्जर ने JVVNL (जयपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड) के कुछ अधिकारियों के खिलाफ यह आरोप लगाते हुए शिकायत दायर की थी कि परीक्षा के दौरान उनकी OMR/उत्तर पुस्तिका में हेराफेरी की गई और उनके साथ धोखाधड़ी हुई।

इस शिकायत पर मजिस्ट्रेट ने पुलिस जांच के आदेश दिए, जिस पर जयपुर के Jyoti Nagar थाना दक्षिण ने FIR दर्ज कर जांच की।

जांच के बाद पुलिस ने नकारात्मक फाइनल रिपोर्ट (Negative FR) पेश करते हुए याचिकाकर्ता की शिकायत को झूठा बताया।

इसके बाद SHO, ज्योति नगर, जयपुर (दक्षिण) ने स्वयं देव नारायण के खिलाफ धारा 211 IPC के तहत शिकायत दायर कर दी—यह आरोप लगाते हुए कि उन्होंने झूठी शिकायत कर अधिकारियों को परेशान किया।

यहां तक कि मजिस्ट्रेट ने SHO की इस शिकायत पर सीधे संज्ञान (cognizance) ले लिया। इस आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

बचाव पक्ष की दलीलें

याचिकाकर्ता देव नारायण गुर्जर की ओर से अधिवक्ता निशांत शर्मा और दिनेश कुमार ने दलीलें पेश करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 211 IPC के तहत कार्यवाही प्रारंभ करना न केवल कानून के विपरीत है, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों का भी उल्लंघन करता है।

याचिकाकर्ता ने कहा कि IPC की धारा 211 गैर-संज्ञेय अपराध की है, जिसमें पुलिस स्वतः कार्यवाही नहीं कर सकती।

याचिकाकर्ता ने प्रमुख रूप से यह तर्क दिया कि धारा 211 IPC एक गैर-संज्ञेय (Non-Cognizable) अपराध है, जिसमें पुलिस न तो FIR दर्ज कर सकती है और न ही स्वयं शिकायत दायर कर सकती है।

गैर-संज्ञेय अपराधों में अदालत की अनुमति के बिना पुलिस जांच नहीं कर सकती और न ही सीधे कार्रवाई शुरू कर सकती है।

अधिवक्ता ने कहा कि CrPC की धारा 195(1)(b)(i) का स्पष्ट प्रतिबंध है कि ऐसे मामलों में केवल अदालत ही निर्णय ले सकती है। SHO द्वारा स्वयं शिकायत दायर करना कानूनी प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन है।

अधिवक्ता ने कहा कि धारा 211 IPC (झूठा अभियोग लगाने) के मामले में संज्ञान तभी लिया जा सकता है, जब संबंधित अदालत स्वयं लिखित शिकायत प्रस्तुत करे।

जबकि इस मामले में न तो कोर्ट ने खुद शिकायत की और न किसी SHO या अन्य पुलिस अधिकारी को अधिकृत किया।

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