जोधपुर, 12 नवंबर
Rajasthan Highcourt ने एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि गंभीर चोट या हत्या के प्रयास के मामलों में केवल एक्स-रे रिपोर्ट पर आधारित मेडिकल ज्यूरिस्ट की राय पर्याप्त नहीं मानी जा सकती.
Highcourt ने कहा कि ऐसे मामलों में एक्स-रे तैयार करने वाले रेडियोलॉजिस्ट की गवाही आवश्यक है ताकि चोट की गंभीरता का सही निर्धारण हो सके.
जस्टिस संदीप शाह की एकलपीठ ने यह आदेश पाली जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित 12 मार्च 2025 के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया हैं.
Highcourt ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश पाली के आदेश को निरस्त करते हुए यह आदेश दिया कि ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि रेडियोलॉजिस्ट डॉ. सोन सिंह को गवाह के रूप में बुलाकर उनका परीक्षण करे और आरोपियों को प्रतिपरीक्षण का अवसर भी प्रदान करे.
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही जिला अदालत को आदेश दिया कि इस पुरे मामले को तीन माह के भीतर सुनवाई कर निस्तारण करें.
आपसी झगड़े का मामला
याचिकाकर्ता इश्तियाक अहमद ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर करते हुए बताया कि 22 जुलाई 2022 की शाम को पाली जिले के भिश्तियों की गली क्षेत्र में बच्चों के बीच हुए झगड़े को सुलझाने के दौरान मोहम्मद हैदर, इल्मुद्दीन और मोहम्मद शमसुद्दीन पर मोहम्मद हुसैन व अन्य ने हमला कर दिया.
इस संबंध में 23 जुलाई 2022 को कोतवाली थाना, पाली में एफआईआर दर्ज की गई और जांच उपरांत चालान पेश हुआ.
ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से मेडिकल ज्यूरिस्ट डॉ. अमित कुमावत को गवाह के रूप में पेश किया गया, जिन्होंने चोट रिपोर्ट के आधार पर राय दी.
लेकिन जिरह के दौरान उन्होंने स्वीकार किया कि उनकी राय रेडियोलॉजिस्ट द्वारा तैयार की गई एक्स-रे रिपोर्ट पर आधारित थी, जिसे उन्होंने स्वयं तैयार नहीं किया था.
इस स्थिति में अभियोजन ने धारा 311 सीआरपीसी के तहत आवेदन प्रस्तुत किया कि डॉ. सोन सिंह (रेडियोलॉजिस्ट) को भी गवाह के रूप में बुलाया जाए, ताकि चोटों की वास्तविक प्रकृति स्पष्ट हो सके.
ट्रायल कोर्ट का फैसला और हाईकोर्ट का रुख
अभियोजन की ओर से पेश किए गए प्रार्थना पत्र को ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मेडिकल ज्यूरिस्ट की गवाही ही पर्याप्त है.
इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में निगरानी याचिका दायर की.?
सुनवाई के बाद जस्टिस संदीप शाह ने कहा कि धारा 311 सीआरपीसी का उद्देश्य सत्य की खोज है, और अदालत किसी भी चरण में ऐसे साक्ष्य बुला सकती है जो न्याय के लिए आवश्यक हों.
कोर्ट ने कहा —
“जब मेडिकल ज्यूरिस्ट स्वयं यह स्वीकार करता है कि उसकी राय रेडियोलॉजिस्ट की रिपोर्ट पर आधारित है, तो रेडियोलॉजिस्ट की गवाही के बिना चोट की गंभीरता का सही निर्धारण नहीं हो सकता।”
इस आधार पर हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष का आवेदन स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और रेडियोलॉजिस्ट की गवाही करवाने के निर्देश जारी किए.
गंभीर चोट के मामलों में रेडियोलॉजिस्ट की गवाही जरूरी — हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
जोधपुर, 12 नवंबर
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि गंभीर चोट या हत्या के प्रयास के मामलों में केवल एक्स-रे रिपोर्ट पर आधारित मेडिकल ज्यूरिस्ट की राय पर्याप्त नहीं मानी जा सकती.
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में एक्स-रे तैयार करने वाले रेडियोलॉजिस्ट की गवाही आवश्यक है ताकि चोट की गंभीरता का सही निर्धारण हो सके.
जस्टिस संदीप शाह की एकलपीठ ने यह आदेश पाली जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित 12 मार्च 2025 के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया हैं.
हाईकोर्ट ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश पाली के आदेश को निरस्त करते हुए यह आदेश दिया कि ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि रेडियोलॉजिस्ट डॉ. सोन सिंह को गवाह के रूप में बुलाकर उनका परीक्षण करे और आरोपियों को प्रतिपरीक्षण का अवसर भी प्रदान करे.
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही जिला अदालत को आदेश दिया कि इस पुरे मामले को तीन माह के भीतर सुनवाई कर निस्तारण करें.
आपसी झगड़े का मामला
याचिकाकर्ता इश्तियाक अहमद ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर करते हुए बताया कि 22 जुलाई 2022 की शाम को पाली जिले के भिश्तियों की गली क्षेत्र में बच्चों के बीच हुए झगड़े को सुलझाने के दौरान मोहम्मद हैदर, इल्मुद्दीन और मोहम्मद शमसुद्दीन पर मोहम्मद हुसैन व अन्य ने हमला कर दिया.
इस संबंध में 23 जुलाई 2022 को कोतवाली थाना, पाली में एफआईआर दर्ज की गई और जांच उपरांत चालान पेश हुआ.
ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से मेडिकल ज्यूरिस्ट डॉ. अमित कुमावत को गवाह के रूप में पेश किया गया, जिन्होंने चोट रिपोर्ट के आधार पर राय दी.
लेकिन जिरह के दौरान उन्होंने स्वीकार किया कि उनकी राय रेडियोलॉजिस्ट द्वारा तैयार की गई एक्स-रे रिपोर्ट पर आधारित थी, जिसे उन्होंने स्वयं तैयार नहीं किया था.
इस स्थिति में अभियोजन ने धारा 311 सीआरपीसी के तहत आवेदन प्रस्तुत किया कि डॉ. सोन सिंह (रेडियोलॉजिस्ट) को भी गवाह के रूप में बुलाया जाए, ताकि चोटों की वास्तविक प्रकृति स्पष्ट हो सके.
ट्रायल कोर्ट का फैसला और हाईकोर्ट का रुख
अभियोजन की ओर से पेश किए गए प्रार्थना पत्र को ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मेडिकल ज्यूरिस्ट की गवाही ही पर्याप्त है.
इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में निगरानी याचिका दायर की.?
सुनवाई के बाद जस्टिस संदीप शाह ने कहा कि धारा 311 सीआरपीसी का उद्देश्य सत्य की खोज है, और अदालत किसी भी चरण में ऐसे साक्ष्य बुला सकती है जो न्याय के लिए आवश्यक हों.
कोर्ट ने कहा —
“जब मेडिकल ज्यूरिस्ट स्वयं यह स्वीकार करता है कि उसकी राय रेडियोलॉजिस्ट की रिपोर्ट पर आधारित है, तो रेडियोलॉजिस्ट की गवाही के बिना चोट की गंभीरता का सही निर्धारण नहीं हो सकता।”
इस आधार पर हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष का आवेदन स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और रेडियोलॉजिस्ट की गवाही करवाने के निर्देश जारी किए.