फैमिली कोर्ट द्वारा प्रतिमाह 8 हजार भरण पोषण देने के आदेश पर लगाई मुहर, पत्नि की याचिका खारिज
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने भरण–पोषण कानून से जुड़े एक ऐतिहासिक और रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि भरण–पोषण (Maintenance) को पति की आय के बंटवारे के रूप में नहीं देखा जा सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि भरण–पोषण का उद्देश्य न तो पत्नी को अनुचित लाभ दिलाना है और न ही पति को दंडित करना, बल्कि यह एक सामाजिक न्याय का उपाय है, जिससे आश्रित जीवनसाथी को गरिमापूर्ण जीवन मिल सके।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि पति की अधिक कमाई होने मात्र से पत्नी को उसकी आय का तय प्रतिशत या बड़ा हिस्सा देने का आधार नहीं बन सकता।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने पत्नी की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए पत्नी को ₹8,000 प्रतिमाह भरण–पोषण देने को उचित ठहराया है।
पत्नी की ओर से आपराधिक पुनरीक्षण याचिका के जरिए फैमिली कोर्ट द्वारा निर्धारित ₹8,000 प्रतिमाह भरण–पोषण को “अपर्याप्त” बताते हुए बढ़ाने की मांग की गई थी।
मामले का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह भी रहा कि याचिकाकर्ता पत्नी एक उच्च शिक्षित स्नातक—बी.एड., एम.एड., NET क्वालिफाइड—होने के साथ–साथ वर्तमान में पीएचडी कर रही है, जिसके लिए उसे मासिक स्टाइपेंड प्राप्त हो रहा था।
57 दिन की शादी और मुकदमे
याचिकाकर्ता पत्नी की शादी 2 अक्टूबर 2019 को अहमदाबाद में हिंदू रीति–रिवाजों के साथ हुई थी। प्रतिवादी पति अहमदाबाद के ही Institute of Technology Research and Management में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।
हालांकि यह वैवाहिक संबंध महज 57 दिनों तक ही चल पाया और पत्नी ने आरोप लगाया कि शादी के तुरंत बाद उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया, मानसिक और शारीरिक क्रूरता झेलनी पड़ी और अंततः उसे ससुराल से निकाल दिया गया।
इसके बाद उसने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण–पोषण की मांग की।
फैमिली कोर्ट, श्रीगंगानगर ने सभी साक्ष्यों और परिस्थितियों को देखते हुए पति को ₹8,000 प्रति माह भरण–पोषण देने का आदेश दिया। पत्नी ने इसे कम बताते हुए राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पत्नी की ओर से दलीलें
याचिकाकर्ता पत्नी की ओर से अदालत में कहा गया कि फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश न केवल तथ्यों की अनदेखी पर आधारित है, बल्कि यह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के उद्देश्य और स्थापित विधिक सिद्धांतों के भी विपरीत है।
याचिकाकर्ता पत्नी ने ₹8,000 प्रतिमाह की राशि को अत्यंत अल्प, अन्यायपूर्ण और उसकी वास्तविक आवश्यकताओं के अनुपात में पूरी तरह अपर्याप्त बताया।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि पति की आय, सामाजिक स्थिति और सेवा लाभों की तुलना में यह राशि नाममात्र की “सांत्वना राशि” (supportive maintenance) से अधिक कुछ नहीं है, जो पत्नी को गरिमापूर्ण जीवन देने में पूरी तरह असफल है।
पति की आय 1.5 लाख
याचिकाकर्ता पत्नी की ओर से यह विशेष रूप से रेखांकित किया गया कि पति एक उच्च शिक्षित मैकेनिकल इंजीनियर, पीएचडी धारक है और एक सरकारी तकनीकी संस्थान में विभागाध्यक्ष/एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत है, जिसकी मासिक आय ₹1.5 लाख से ₹1.8 लाख से अधिक है।
याचिका में यह भी कहा गया कि इसके अतिरिक्त पति को सरकारी आवास, अन्य सेवा लाभ, स्थायी नौकरी की सुरक्षा और हरियाणा में अचल संपत्ति जैसे आर्थिक लाभ भी प्राप्त हैं। इसके बावजूद पत्नी को मात्र ₹8,000 प्रतिमाह देना अनुचित और असंतुलित है।
याचिकाकर्ता पत्नी ने फैमिली कोर्ट के आदेश को “अत्यधिक तकनीकी, जल्दबाजी में पारित और तथ्यात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण” बताया।
शिक्षित होना नहीं करता…
याचिका में कहा गया कि अदालत ने पति की वास्तविक आय का समुचित आकलन नहीं किया और पत्नी की वास्तविक आवश्यकताओं पर विचार नहीं किया, और “कमाई की क्षमता” को “वास्तविक कमाई” के बराबर मान लिया गया।
और यह स्थापित कानून नजरअंदाज कर दिया गया कि केवल शिक्षित होना पत्नी को भरण–पोषण से वंचित नहीं करता।
याचिकाकर्ता ने कहा कि भरण–पोषण का उद्देश्य केवल जीवित रहने भर की सहायता नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और सामाजिक गरिमा के साथ जीवन यापन सुनिश्चित करना है।
पति की दलीलें
याचिका पर सुनवाई के दौरान पति की ओर से दलीलें पेश कर बताया गया कि पत्नी की पुनरीक्षण याचिका कानूनी आधार से अधिक आर्थिक दबाव बनाने की मंशा से प्रेरित है।
पति की ओर से कहा गया कि फैमिली कोर्ट द्वारा तय ₹8,000 प्रतिमाह भरण–पोषण आदेश सभी तथ्यों, साक्ष्यों और विधिक सिद्धांतों पर आधारित व न्यायसंगत है।
57 दिन, सहवास से इनकार
पति ने कहा कि दांपत्य जीवन मात्र 57 दिनों का रहा, जिसमें साझा जीवन–स्तर या निर्भरता स्थापित नहीं होती।
पत्नी ने स्वेच्छा से अलगाव चुना, सहवास से इंकार किया और वैवाहिक संबंध बचाने हेतु कोई पहल नहीं की; ऐसे में धारा 125(4) CrPC लागू होती है।
पति की ओर से कहा गया कि दहेज व क्रूरता के आरोप निराधार हैं—कोई मेडिकल, स्वतंत्र गवाह या दस्तावेजी प्रमाण नहीं।
पति की ओर से पत्नी के उच्च शिक्षित होने को लेकर कहा गया कि पत्नी उच्च शिक्षित, NET क्वालिफाइड है, पूर्व में कार्यरत रही है और पीएचडी स्टाइपेंड प्राप्त करती है; अतः वह पूर्ण असहाय नहीं।
याचिका में कहा गया कि पत्नी ने अपनी आय–संपत्ति छिपाई, जबकि पति ने पारदर्शिता बरती और एकल पिता की जिम्मेदारियों के बावजूद नियमित भुगतान किया। भरण–पोषण आय का बंटवारा नहीं है, इसलिए याचिका खारिज हो।
पति की आय बनाम पत्नी की योग्यता
याचिका में तर्क दिया गया कि पति एक सरकारी संस्थान में एसोसिएट प्रोफेसर/एचओडी के पद पर कार्यरत है और उसकी मासिक आय ₹1.5 लाख से अधिक है, जबकि पत्नी बेरोजगार है और पिता पर निर्भर है।
वहीं पति की ओर से यह दलील दी गई कि पत्नी उच्च शिक्षित है—उसके पास बी.एड., एम.एड., NET जैसी योग्यताएं हैं, वह पूर्व में प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य कर चुकी है और वर्तमान में पीएचडी कर रही है। ऐसे में केवल बेरोजगारी का दावा उसे अधिक भरण–पोषण का हकदार नहीं बनाता।
हाईकोर्ट के फैसले की अहम बातें
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में भरण–पोषण कानून के सिद्धांत और सीमाएं स्पष्ट करते हुए कहा—
भरण–पोषण आय का बंटवारा नहीं
अदालत ने दो टूक कहा कि भरण–पोषण को पति की आय का प्रतिशत या बंटवारा मानना कानून की भावना के विपरीत है। पत्नी यह दावा नहीं कर सकती कि पति की अधिक आय होने मात्र से उसे उसका बड़ा हिस्सा मिलना चाहिए।
‘गोल्डन मीन’ का सिद्धांत
हाईकोर्ट ने कहा कि भरण–पोषण तय करते समय अदालतों को संतुलन (Golden Mean) अपनाना चाहिए—जहां एक ओर पत्नी की आवश्यकताओं और सम्मानजनक जीवन का ध्यान रखा जाए, वहीं दूसरी ओर पति की जिम्मेदारियों और आर्थिक क्षमता को भी नजरअंदाज न किया जाए।
कम अवधि की शादी भी प्रासंगिक
हालांकि अदालत ने माना कि विवाह की अवधि अकेला निर्णायक तत्व नहीं है, लेकिन 57 दिनों का वैवाहिक जीवन यह समझने में मदद करता है कि पति–पत्नी के बीच जीवन–स्तर का साझा अनुभव कितना सीमित था। इस तथ्य को फैमिली कोर्ट द्वारा ध्यान में रखना सही ठहराया गया।
उच्च शिक्षा का प्रभाव
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल यह तथ्य कि पत्नी शिक्षित है, उसे भरण–पोषण से वंचित नहीं करता, लेकिन उसकी योग्यता, रोजगार की संभावना और पूर्व अनुभव को भरण–पोषण की राशि तय करते समय अवश्य देखा जा सकता है।
क्रूरता और दहेज के आरोपों पर
पत्नी ने दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा के आरोप लगाए थे, लेकिन अदालत ने कहा कि धारा 125 की कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है और इसमें गंभीर आरोपों को तभी निर्णायक माना जा सकता है जब उनके समर्थन में ठोस साक्ष्य हों।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल 498A जैसे मामलों का लंबित होना अपने–आप में क्रूरता सिद्ध नहीं करता, क्योंकि कानून में अब भी निर्दोषता की presumption लागू होती है।
एकल पिता की जिम्मेदारी भी अहम
हाईकोर्ट ने इस तथ्य को भी महत्व दिया कि पति एक नाबालिग बेटी का एकल अभिभावक है और उसकी शिक्षा–दीक्षा व भविष्य की जिम्मेदारी उसी पर है। हालांकि यह जिम्मेदारी उसे पत्नी के भरण–पोषण से मुक्त नहीं करती, लेकिन यह उसकी कुल आर्थिक देनदारियों का एक प्रासंगिक पहलू है।
₹8,000 की राशि पर
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई ₹8,000 प्रतिमाह की राशि न तो मनमानी है, न ही कानून के विपरीत और न ही परिस्थितियों से असंगत।
कोर्ट ने कहा कि यह राशि पत्नी को न्यूनतम सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से तय की गई है, न कि उसे पति की जीवनशैली के बराबर लाने के लिए।
पुनरीक्षण याचिका खारिज
इन सभी कारणों से हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई गंभीर कानूनी त्रुटि, मनमानी या अन्याय नहीं है। चूंकि पुनरीक्षण अधिकार–क्षेत्र सीमित होता है, इसलिए हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।