नागौर-मुकुंदगढ़ हाईवे मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- सड़क निर्माण, डिजाइन और रखरखाव का अनुबंध केवल सड़क तक पहुंच की सेवा नहीं; यह कर योग्य निर्माण अनुबंध है
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने हाईवे निर्माण से जुड़े GST के एक महत्वपूर्ण विवाद में स्पष्ट किया है कि सड़क निर्माण परियोजना के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से मिलने वाली वार्षिकी किस्तों पर GST देय होगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि सड़क निर्माण, उसका डिजाइन और रखरखाव करने के बदले मिलने वाली राशि को केवल सड़क या पुल तक पहुंच उपलब्ध कराने वाली सेवा नहीं माना जा सकता। ऐसी सेवा का वास्तविक स्वरूप निर्माण अनुबंध का है और उस पर कर देय है।
जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस प्रवीर भटनागर की खंडपीठ ने नागौर मुकुंदगढ़ हाईवेज प्राइवेट लिमिटेड की ओर से दायर समान प्रकृति की सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए यह फैसला दिया है।
हाईकोर्ट ने केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड द्वारा जारी 17 जून 2021 के सर्कुलर को सही ठहराया है।
क्या था पूरा विवाद
नागौर मुकुंदगढ़ हाईवेज प्राइवेट लिमिटेड ने राजस्थान हाईकोर्ट में कई याचिकाएं दायर कर सड़क निर्माण से प्राप्त वार्षिकी किस्तों Annuity Payment पर कर लगाने की कार्रवाई को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता ने केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड के 17 जून 2021 के सर्कुलर, 9 दिसंबर 2022 को जारी कारण बताओ नोटिस और 7 जुलाई 2023 के वसूली आदेश को चुनौती दी थी।
कंपनी का मुख्य तर्क था कि केंद्र सरकार की 28 जून 2017 की अधिसूचना संख्या 12/2017 में सड़क या पुल तक पहुंच के लिए वार्षिकी के रूप में भुगतान पर कर की दर शून्य रखी गई है।
इसलिए राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के तहत मिलने वाली वार्षिकी राशि पर भी कर नहीं लगाया जा सकता।
कंपनी ने यह भी कहा कि 12 फरवरी 2019 को अग्रिम निर्णय प्राधिकरण ने इसी प्रकार की सेवा को कर से मुक्त माना था। इस निर्णय को राजस्व विभाग ने चुनौती नहीं दी, इसलिए वह कंपनी और संबंधित अधिकारियों पर बाध्यकारी था।
अधिसूचना में क्या है कर छूट का प्रावधान
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में 28 जून 2017 की अधिसूचना के उस प्रावधान पर विस्तार से विचार किया, जिसमें सड़क या पुल तक पहुंच उपलब्ध कराने के लिए वार्षिकी के रूप में मिलने वाले भुगतान को कर से मुक्त किया गया है।
अधिसूचना में संबंधित सेवा को सड़क या पुल तक पहुंच के लिए वार्षिकी के भुगतान के माध्यम से दी जाने वाली सेवा बताया गया है और उस पर कर की दर शून्य रखी गई है।
याचिकाकर्ता ने इसी प्रावधान का आधार लेकर दावा किया कि राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के तहत उसे मिलने वाली वार्षिकी राशि पर भी कर नहीं लगाया जा सकता।
लेकिन हाईकोर्ट ने सेवा की वास्तविक प्रकृति को देखते हुए इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
टैक्स विभाग के सर्कुलर में क्या कहा गया था
केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड ने 17 जून 2021 को जारी सर्कुलर में सड़क निर्माण और सड़क तक पहुंच उपलब्ध कराने वाली सेवा के बीच अंतर स्पष्ट किया था।
सर्कुलर के अनुसार सड़क निर्माण की सेवा अलग श्रेणी में आती है। यदि किसी सड़क निर्माण परियोजना में निर्माण की लागत का एक हिस्सा तत्काल भुगतान किया जाता है और बाकी राशि कई वर्षों में वार्षिकी के रूप में दी जाती है, तो केवल भुगतान को वार्षिकी कह देने से उस राशि पर कर छूट लागू नहीं हो जाती।
बोर्ड ने स्पष्ट किया था कि सड़क निर्माण से संबंधित सेवा पर वार्षिक या स्थगित किस्तों के रूप में किया गया भुगतान भी कर योग्य है।
सर्कुलर से वैधानिक छूट समाप्त नहीं की जा सकती
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड द्वारा जारी कोई प्रशासनिक सर्कुलर वैधानिक अधिसूचना के प्रावधानों को बदल नहीं सकता।
कंपनी का कहना था कि सरकार ने कानून के तहत अधिसूचना जारी कर पहले ही संबंधित सेवा को कर से मुक्त कर दिया है। बाद में जारी सर्कुलर के माध्यम से उस छूट को समाप्त या सीमित नहीं किया जा सकता।
कंपनी ने यह भी दलील दी कि 12 फरवरी 2019 का अग्रिम निर्णय उसके पक्ष में था और राजस्व विभाग ने उस निर्णय को चुनौती नहीं दी।
इसलिए उसके बाद विभाग द्वारा अलग रुख अपनाकर कर की मांग करना उचित नहीं है।
राजस्व विभाग ने किया विरोध
राजस्व विभाग की ओर से कंपनी की दलीलों का विरोध किया गया। विभाग ने कहा कि केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड को कानून के समान और प्रभावी क्रियान्वयन के लिए निर्देश, आदेश और सर्कुलर जारी करने का अधिकार है।
विभाग का कहना था कि 2021 का सर्कुलर कोई नया कर नहीं लगाता, बल्कि पहले से मौजूद कानूनी स्थिति को स्पष्ट करता है।
राजस्व विभाग ने यह भी कहा कि अग्रिम निर्णय हमेशा के लिए बाध्यकारी नहीं होता। यदि कानून, तथ्य या परिस्थितियों में बदलाव हो जाए तो उसके बाध्यकारी प्रभाव की स्थिति भी बदल सकती है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने पूर्व के फैसले को माना महत्वपूर्ण
खंडपीठ ने इस विवाद पर विचार करते समय राजस्थान हाईकोर्ट के ही सीजी टोलवे मामले में 22 मई 2026 को दिए गए फैसले का सहारा लिया।
उस मामले में हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और सड़क निर्माण कंपनी के बीच हुए अनुबंध की प्रकृति का परीक्षण किया था।
हाईकोर्ट ने माना था कि सड़क निर्माण, रखरखाव और उसके बदले टोल वसूलने का अधिकार एक-दूसरे से जुड़े दायित्व हैं और यह पूरा लेन-देन कर योग्य सेवा के दायरे में आता है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि सड़क निर्माण की सेवा और सड़क तक पहुंच उपलब्ध कराने की सेवा अलग-अलग हैं। सड़क निर्माण को केवल टोल या सड़क तक पहुंच से संबंधित कर-मुक्त सेवा नहीं माना जा सकता।
मौजूदा मामले में भी सड़क निर्माण ही मुख्य सेवा
मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के बीच हुए अनुबंध में केवल सड़क पर आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराना शामिल नहीं था।
अनुबंध में सड़क का निर्माण, डिजाइन और रखरखाव शामिल था। इसके बदले निर्माण अवधि में कुछ राशि और बाद में परिचालन अवधि के दौरान वार्षिकी किस्तों के रूप में भुगतान किया जाना था।
इसलिए हाईकोर्ट ने कहा कि सेवा की वास्तविक प्रकृति को देखते हुए इसे निर्माण अनुबंध माना जाएगा।
परियोजना की भुगतान व्यवस्था भी महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने अनुबंध की भुगतान व्यवस्था का भी विस्तार से उल्लेख किया। अनुबंध के अनुसार परियोजना लागत का 50 प्रतिशत हिस्सा निर्माण अवधि में पांच बराबर किस्तों में दिया जाना था। प्रत्येक किस्त निर्माण की निर्धारित प्रगति पूरी होने के बाद देय थी।
शेष 50 प्रतिशत राशि परिचालन अवधि में दस वर्षों के दौरान छह-छह महीने की किस्तों में चुकाई जानी थी।
पहली वार्षिकी किस्त निर्धारित वाणिज्यिक संचालन तिथि के 180वें दिन के बाद देय थी।
इसके बाद प्रत्येक छह महीने में किस्त का भुगतान किया जाना था।
इन किस्तों के साथ अनुबंध के अनुसार ब्याज का भुगतान भी किया जाना था।
50 प्रतिशत राशि पहले और बाकी 50 प्रतिशत वार्षिकी से
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से यह तथ्य ध्यान में रखा कि परियोजना में रियायत प्राप्त कंपनी ने लगभग 50 प्रतिशत राशि का निवेश किया था, जबकि शेष 50 प्रतिशत राशि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा बाद में वार्षिकी के माध्यम से दी जानी थी।
हाईकोर्ट ने माना कि भुगतान को कई वर्षों में बांट देने से सड़क निर्माण की मूल सेवा की प्रकृति नहीं बदल जाती।
यदि मूल अनुबंध सड़क के निर्माण और रखरखाव का है तो उसके लिए बाद में मिलने वाली राशि भी उसी निर्माण सेवा के प्रतिफल का हिस्सा होगी।
केवल ‘वार्षिकी’ नाम देने से कर छूट नहीं मिलेगी
फैसले का महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि किसी सड़क निर्माण परियोजना में भुगतान को वार्षिकी कह देने मात्र से उस पर कर छूट का अधिकार पैदा नहीं हो जाता।
यह देखा जाएगा कि अनुबंध के तहत वास्तव में कौन-सी सेवा दी जा रही है।
यदि सेवा सड़क निर्माण, डिजाइन और रखरखाव की है तो वह निर्माण सेवा है। ऐसी सेवा को केवल इसलिए सड़क तक पहुंच उपलब्ध कराने वाली कर-मुक्त सेवा नहीं माना जा सकता क्योंकि उसका भुगतान वार्षिक या छह महीने की किस्तों में किया जा रहा है।
अग्रिम निर्णय पर भी हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
याचिकाकर्ता ने 2019 के अग्रिम निर्णय को अपने पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण आधार बनाया था। हालांकि हाईकोर्ट ने इस आधार पर भी राहत देने से इनकार कर दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी समय संबंधित अधिकारियों ने कानून की गलत व्याख्या की हो तो केवल उस गलत व्याख्या के कारण राजस्व विभाग हमेशा के लिए उसी स्थिति से बंधा नहीं रहेगा।
हाईकोर्ट ने माना कि केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड को केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम की धारा 168 के तहत कानून के सही और समान क्रियान्वयन के लिए आवश्यक निर्देश जारी करने का अधिकार है।
फैसले में यह भी कहा गया कि यदि किसी गलत व्याख्या के कारण राज्य को महत्वपूर्ण राजस्व हानि हो रही हो तो बोर्ड को स्थिति स्पष्ट करने के लिए हस्तक्षेप करने का अधिकार है।
तेलंगाना हाईकोर्ट के फैसले से अलग रुख
याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में अन्य हाईकोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया था। न्यायालय ने तेलंगाना हाईकोर्ट के एक फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें संबंधित परिपत्र को चुनौती दी गई थी।
लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि राजस्थान हाईकोर्ट की ही समन्वय पीठ ने बाद में सीजी टोलवे मामले में इस मुद्दे पर विस्तृत विचार किया और अलग निष्कर्ष दिया।
मौजूदा खंडपीठ को समन्वय पीठ के उस निर्णय से अलग राय अपनाने का कोई मजबूत कारण नहीं मिला।
हाईकोर्ट ने कहा- अगर निर्माण सेवा को छूट देनी थी तो अधिसूचना में स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए था
हाईकोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण बात कही कि यदि सरकार सड़क निर्माण से जुड़ी निर्माण सेवाओं को भी कर से मुक्त करना चाहती तो अधिसूचना में उसके लिए स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए था।
मौजूदा अधिसूचना में जिस सेवा को छूट दी गई है, वह सड़क या पुल तक पहुंच उपलब्ध कराने वाली सेवा है। सड़क निर्माण की सेवा को उसी छूट में शामिल नहीं किया जा सकता।
सभी याचिकाएं खारिज
सभी पक्षों की बहस और दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड के परिपत्र को चुनौती देने में कोई आधार नहीं है।
हाईकोर्ट ने वार्षिकी भुगतान पर वस्तु एवं सेवा कर लगाने की कार्रवाई को भी सही माना।
2019 के अग्रिम निर्णय के आधार पर भी याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार करते हुए सभी याचिकाएं खारिज करने का आदेश दिया।