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हत्या के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला-परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी अधूरी होने पर दोषसिद्धि नहीं टिक सकती

Incomplete Circumstantial Evidence Leads Rajasthan High Court to Acquit Murder Convict

हाईकोर्ट ने माना महिला की हत्या हुई, लेकिन अभियोजन साबित नही सका हत्या की कहानी, हाईकोर्ट ने हत्या के आरोपी पति को किया बरी

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण आपराधिक अपील में यह स्पष्ट किया है कि केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर तब तक दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती, जब तक घटनाक्रम की पूरी और निर्विवाद कड़ी आरोपी के अपराध से सीधे-सीधे जुड़ी सिद्ध न हो जाए।

राजस्थान हाईकोर्ट ने वर्ष 2015 में एडीजे कोर्ट श्रीमाधोपुर द्वारा दिए गए फैसले को रद्द करते हुए हुए हत्या के आरोपी को बरी कर दिया हैं.

जस्टिस महेन्द्र कुमार गोयल और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने यह फैसला हत्या के आरोपी सरदार उर्फ बालू उर्फ बाला की ओर से दायर अपील पर दिया हैं.

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूर्ण श्रृंखला स्थापित करने में असफल रहा है, जिसके कारण दोषसिद्धि को बनाए रखना कानून सम्मत नहीं है।

दहेज के लिए हत्या का आरोप

पुलिस थाना श्रीमाधोपुर में 17 अक्टूबर 2013 को शिकायतकर्ता भंवरलाल ने रिपोर्ट दर्ज करायी कि उसकी पुत्री किरण उर्फ गोठी की शादी वर्ष 2004 में आरोपी से हुई थी।

शिकायत में आरोप लगाया गया कि शादी के बाद आरोपी और उसके परिवारजन दहेज की मांग को लेकर मृतका को प्रताड़ित करते थे और घटना के दिन सूचना मिली कि आरोपी ने परिवारजनों के साथ मिलकर उसकी हत्या कर दी।

इस रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने धारा 498ए और 302/34 आईपीसी के तहत मामला दर्ज किया तथा जांच के बाद आरोपी के विरुद्ध आरोपपत्र प्रस्तुत किया गया।

सत्र न्यायालय ने सुनवाई के बाद आरोपी को धारा 302 आईपीसी के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके विरुद्ध आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।

अपील में दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता अंशुमान सक्सैना और धर्मशील शर्मा ने दलील दी कि सत्र न्यायालय का निर्णय अनुमान और संदेह पर आधारित है तथा अभियोजन पक्ष कोई ऐसा प्रत्यक्ष या ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया जो आरोपी को घटना से जोड़ता हो।

अधिवक्ता ने कहा कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है, लेकिन इन साक्ष्यों की कड़ी पूरी तरह स्थापित नहीं की गई। साथ ही, कथित बरामदगी और एफएसएल रिपोर्ट भी आरोपी की संलिप्तता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

अधिवक्ता ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला अनुमानों और संदेह पर आधारित है तथा ऐसा कोई कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं है जो आरोपी को सीधे अपराध से जोड़ता हो।

यह मामला पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) पर आधारित है, लेकिन अभियोजन पक्ष घटनाओं की पूर्ण और अखंड श्रृंखला (Complete Chain of Circumstances) स्थापित करने में असफल रहा।

अधिवक्ता ने कहा कि इस मामले में मृतका की बहन के बयान की ट्रायल कोर्ट ने गलत व्याख्या की है।

आरोपी से कथित रूप से बरामद वस्तुओं की बरामदगी विधिवत सिद्ध नहीं की गई तथा एफएसएल रिपोर्ट में रक्त समूह का मिलान स्पष्ट नहीं होने के कारण वह निर्णायक साक्ष्य नहीं माना जा सकता।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक श्रीराम धाकड़ ने सत्र न्यायालय के फैसले का समर्थन करते हुए अपील खारिज करने का अनुरोध किया।

राज्य सरकार ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य आरोपी की संलिप्तता सिद्ध करते हैं और ट्रायल कोर्ट द्वारा साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन किया गया है और अपील खारिज की जानी चाहिए.

हत्या हुई लेकिन अभियोजन असफल

दोनो पक्षों की दलीले सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि यह निर्विवाद है कि मृतका की मृत्यु हत्या के कारण हुई, लेकिन यह महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या अभियोजन पक्ष आरोपी को इस अपराध से जोड़ने में सफल रहा।

हाईकोर्ट ने कहा कि “लास्ट सीन” सिद्धांत को सिद्ध करने के लिए जिन गवाहों के बयान पर भरोसा किया गया, वे आरोपी को घटना के समय मृतका के साथ देखने की पुष्टि नहीं करते।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी द्वारा मृतका के चरित्र पर संदेह करने का कोई ठोस साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि मृतका की बहन और अन्य गवाहों ने भी इस प्रकार की बात का समर्थन नहीं किया। इसके अतिरिक्त, जिन कपड़ों और हथियारों पर मानव रक्त मिलने की बात कही गई, उनमें रक्त समूह का मिलान स्पष्ट नहीं था, इसलिए उन्हें निर्णायक साक्ष्य नहीं माना जा सकता।

परिस्थितिजन्य साक्ष्य

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि तभी संभव है, जब परिस्थितियों की श्रृंखला इतनी पूर्ण हो कि आरोपी की निर्दोषता की कोई भी संभावना शेष न रहे। यदि साक्ष्यों की कड़ी अधूरी हो, तो संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना आवश्यक है।

आरोपी बरी, तत्काल रिहा करने का आदेश

सभी पक्षों की दलीले सुनने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ साक्ष्यों की पूर्ण और अखंड श्रृंखला स्थापित करने में असफल रहा है।

जिसके चलते एडीजे कोर्ट का 15 मई 2015 का फैसले को रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी को सभी आरोप से बरी करते हुए तत्काल रिहा करने का आदेश दिया.

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