जयपुर। देश की न्यायिक व्यवस्था को झकझोर देने वाले इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) जयपुर रिश्वत कांड में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है।
Rajasthan High Court में सीबीआई द्वारा गिरफ्तार आरोपियों की ओर से जमानत याचिकाए दायर कि गयी हैं.
जस्टिस सी पी श्रीमाली की अदालत में आरोपियों की ओर से दायर याचिकाओं पर राजस्थान हाईकोर्ट में सुनवाई पूर्ण हो चुकी हैं.

“कच्चे ऑर्डर” से “फाइनल फैसले” तक—पैसे का खेल!
सीबीआई की जांच ने जिस साजिश का पर्दाफाश किया है, उसने न्याय के मंदिर की पवित्रता पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।
सीबीआई जांच में सामने आया कि ITAT जयपुर बेंच में लंबित मामलों में मनचाहे फैसले दिलाने के लिए अंदरूनी प्रक्रियाओं से खिलवाड़ किया जा रहा था।
आरोप है कि ज्यूडिशियल मेंबर डॉ. सीतालक्ष्मी अंतिम निर्णय से पहले ड्राफ्ट/“कच्चे ऑर्डर” एडवोकेट सिसोदिया को भेजती थीं। रिश्वत की पुष्टि होने के बाद ही वही ऑर्डर फाइनल कर जारी किए जाते थे।
फ़िल्मी अंदाज़ में सीबीआई का ऑपरेशन
Central Bureau of Investigation ने अक्टूबर में एक सीक्रेट ऑपरेशन के जरिए इस संगठित नेटवर्क को बेनकाब किया।
कई दिनों की निगरानी के बाद की गई कार्रवाई में न सिर्फ ट्रिब्यूनल की ज्यूडिशियल मेंबर, बल्कि उनसे जुड़े वकील, अपीलकर्ता, असिस्टेंट रजिस्ट्रार और अकाउंटेंट मेंबर तक गिरफ्त में आए।
5.5 लाख लेते वकील गिरफ्तार, गाड़ी से निकले 30 लाख
25 नवंबर को सीबीआई ने एडवोकेट राजेंद्र सिंह सिसोदिया को 5.5 लाख रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथ दबोचा। जांच में खुलासा हुआ कि यह रकम हवाला नेटवर्क के जरिए पहुंचाई गई थी। छापेमारी में सिसोदिया के ठिकानों से 80 लाख रुपये भी बरामद किए गए।
अगले ही दिन, 26 नवंबर को सीबीआई ने डॉ. एस. सीतालक्ष्मी को गिरफ्तार किया। उनकी सरकारी गाड़ी से 30 लाख रुपये नकद बरामद हुए। इसी कड़ी में अपीलकर्ता मुज्जमिल और अकाउंटेंट मेंबर कमलेश राठौड़ भी हिरासत में लिए गए, जिनके परिसरों से करीब 20 लाख रुपये मिले।
ताबड़तोड़ छापे, एक करोड़ से ज्यादा कैश
जांच का दायरा बढ़ते ही सीबीआई ने जयपुर, कोटा, जोधपुर समेत कई शहरों में एक साथ छापेमारी की। यहां से एक करोड़ रुपये से अधिक नकदी, हवाला लेन-देन से जुड़े दस्तावेज, प्रॉपर्टी रिकॉर्ड और कई आपत्तिजनक कागजात बरामद हुए—जो इस पूरे खेल को संगठित गिरोह की तरह स्थापित करते हैं।
पुराने फैसलों की भी जांच
सीबीआई अब ज्यूडिशियल मेंबर के पिछले आदेशों की भी बारीकी से पड़ताल कर रही है। कई मामलों में दिए गए अधिकृत आदेशों की निष्पक्षता पर सवाल तय माने जा रहे हैं। अगर आरोप पुष्ट होते हैं, तो ITAT के अनेक फैसलों पर पुनर्विचार की नौबत आ सकती है।