हाईकोर्ट ने कहा – नाबालिग अवस्था के अपराधों को आजीवन कलंक की तरह नहीं देखा जा सकता।
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि नाबालिग अवस्था में किए गए तुच्छ और मामूली अपराधों के आधार पर किसी व्यक्ति की आजीविका छीनी नहीं जा सकती, विशेषकर तब जब वह अपराध समाज के लिए गंभीर या नैतिक पतन से जुड़ा न हो।
डॉ. जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने नगर पालिका में सफाईकर्मी पद पर नियुक्त एक दिव्यांग युवक की सेवाएं समाप्त करने के आदेश को रद्द करते हुए उसकी नौकरी बहाल करने का आदेश देते हुए यह फैसला दिया हैं.
खंडपीठ ने एकलपीठ के पूर्व आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि नाबालिग अवस्था के अपराधों को आजीवन कलंक की तरह नहीं देखा जा सकता।
खंडपीठ ने नगर पालिका रावतसर, जिला हनुमानगढ़ के बर्खास्त कर्मचारी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया हैं.
क्या है पूरा मामला
हनुमानगढ़ जिला निवासी अपीलकर्ता श्रवण नगर पालिका, रावतसर में सफाईकर्मी के पद पर चयनित किया गया था। श्रवण 70 प्रतिशत स्थायी बौनापन (ड्वार्फ़िज़्म) से पीड़ित हैं।
चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें 14 जुलाई 2018 को नियुक्ति आदेश जारी किया गया।
नियुक्ति आदेश में यह शर्त निहित थी कि सेवा पुलिस सत्यापन संतोषजनक होने पर ही स्थायी मानी जाएगी।
पुलिस सत्यापन के दौरान यह सामने आया कि श्रवण के खिलाफ पूर्व में चार आपराधिक प्रकरण दर्ज रहे थे।
इनमें से तीन मामलों में उसे राजस्थान सार्वजनिक जुआ अधिनियम, 1949 के तहत दोषसिद्ध किया गया था, जबकि एक मामले में राजस्थान आबकारी अधिनियम, 1950 के तहत उसे बरी कर दिया गया था।
इन तथ्यों के आधार पर नगर पालिका ने 24 अगस्त 2018 को श्रवण की सेवाएं समाप्त कर दीं।
एकलपीठ ने खारिज की थी याचिका
याचिकाकर्ता ने सेवा समाप्ति के आदेश को चुनौती देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ में रिट याचिका दायर की, लेकिन 23 अप्रैल 2024 को एकलपीठ ने याचिका खारिज कर दी।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने विशेष अपील के माध्यम से खंडपीठ का रुख किया।
नाबालिग अवस्था में हुए थे सभी मामले
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता दुर्गेश खत्री ने दलील दी कि जिन मामलों में याचिकाकर्ता को दोषसिद्ध किया गया, उस समय वह नाबालिग (Juvenile) था।
सभी दोषसिद्धि तुच्छ और मामूली अपराधों (जुआ अधिनियम) से संबंधित थीं, जिनका पद की उपयुक्तता से कोई सीधा संबंध नहीं था।
अधिवक्ता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के Avtar Singh बनाम भारत संघ (2016) के निर्णय के अनुसार, तुच्छ अपराधों में तथ्य छिपाने मात्र से नियुक्ति स्वतः रद्द नहीं की जा सकती।
आपराधिक मामलों के रिकॉर्ड अब वीड आउट (Weeded Out) हो चुके हैं, जो यह दर्शाता है कि वे गंभीर प्रकृति के नहीं थे।
इनका किसी भी प्रकार से नैतिक अधमता, हिंसा या सार्वजनिक सुरक्षा से कोई गंभीर संबंध नहीं था।
इसके अतिरिक्त, यह भी बताया गया कि ये सभी मामले इतने पुराने हैं कि अब उनके रिकॉर्ड भी वीड आउट (रिकॉर्ड से हटाए जा चुके) हैं।
यह तथ्य भी इस बात को पुष्ट करता है कि उन्हें नाबालिग अवस्था की भूलों के कारण आजीवन दंडित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
अपीलकर्ता के अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले Avtar Singh बनाम भारत संघ (2016) 8 SCC 471 का हवाला दिया।
इस निर्णय में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि यदि कोई अपराध तुच्छ प्रकृति का हो, तो केवल उसके दमन (suppression) के आधार पर उम्मीदवार की नियुक्ति स्वतः रद्द नहीं की जा सकती।
नियोक्ता के पास विवेकाधिकार होता है कि वह परिस्थितियों को देखते हुए ऐसे मामलों को नज़रअंदाज़ कर सकता है
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार और नगर पालिका की ओर से यह तर्क दिया गया कि नियुक्ति स्पष्ट रूप से पुलिस सत्यापन के अधीन थी और आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाना एक गंभीर कदाचार है।
ऐसे में नियोक्ता को यह अधिकार है कि वह नियुक्ति रद्द कर सके।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
राजस्थान हाईकोर्ट ने माना कि नियोक्ता के पास विवेकाधिकार अवश्य है, लेकिन यह विवेकाधिकार मनमाना या असंवेदनशील नहीं हो सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि सभी आपराधिक मामले नाबालिग अवस्था के हैं और दोषसिद्धि वाले अपराध अत्यंत तुच्छ प्रकृति के हैं
पद की प्रकृति (सफाईकर्मी) ऐसी नहीं है जिसमें इन अपराधों से कोई सीधा संबंध हो
अपीलकर्ता एक दिव्यांग व्यक्ति है, जिसके लिए नौकरी सामाजिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण साधन है
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने माना कि सेवा समाप्ति का निर्णय अनुचित और असमानुपातिक था।
किशोर न्याय अधिनियम का संरक्षण
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 की धारा 19 का विशेष उल्लेख किया। इस धारा के अनुसार—
नाबालिग द्वारा किए गए अपराध के कारण उसे भविष्य में किसी प्रकार की अयोग्यता नहीं झेलनी चाहिए
ऐसे अपराधों के रिकॉर्ड को एक निश्चित समय बाद हटा दिया जाना चाहिए
अदालत ने कहा कि इस कानून का उद्देश्य ही यह है कि नाबालिग अवस्था की गलतियों के कारण किसी व्यक्ति का पूरा भविष्य नष्ट न हो
नौकरी बहाल, लेकिन लाभ नाममात्र
हाईकोर्ट ने विशेष अपील को स्वीकार करते हुए एकलपीठ के आदेश को रद्द किया.
इसके साथ ही नगर पालिका का 24 अगस्त 2018 का सेवा समाप्ति आदेश निरस्त करते हुए अपीलकर्ता श्रवण की नियुक्ति को बहाल करने का आदेश दिया.
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिस अवधि में अपीलकर्ता ने वास्तव में सेवा नहीं दी, उस अवधि के लिए उसे वास्तविक वेतन नहीं, बल्कि केवल काल्पनिक (नोटनल) लाभ दिए जाएंगे।