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“पीड़िता का कथित बलात्कारी के साथ जाना अस्वाभाविक व्यवहार”: राजस्थान हाईकोर्ट ने पॉक्सो मामले में पूर्व सरपंच को किया बरी

Rajasthan High Court Acquits Life Convict in POCSO Case, Reiterates “Beyond Reasonable Doubt” Principle

नाबालिग दुष्कर्म केस में उम्रकैद रद्द, दोषी बरी, हाईकोर्ट ने कहा-“भावना नहीं, सबूत से चलता है न्याय”

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म जैसे अत्यंत गंभीर आरोपों के बावजूद एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषी को बरी कर दिया।

पूर्व सरपंच के खिलाफ पॉक्सो मामले में दोषसिद्धि को निरस्त करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार हुआ हो, तो यह अत्यंत असंभव प्रतीत होता है कि वह स्वेच्छा से कथित आरोपी के साथ किसी अन्य स्थान पर चली जाए।

साथ ही, पीड़िता की आयु को लेकर संदेह व्यक्त करते हुए न्यायमूर्ति विनीत कुमार माथुर और न्यायमूर्ति चन्द्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि यद्यपि स्कूल प्रमाणपत्र प्रासंगिक साक्ष्य है, लेकिन जब सरकारी अभिलेखों में परस्पर विरोधी सामग्री मौजूद हो, तब सबसे प्रारंभिक प्रवेश (एडमिशन) रिकॉर्ड को निर्णायक महत्व दिया जाएगा।

राजस्थान हाईकोर्ट ने पॉक्सो अधिनियम और आईपीसी की धारा 376(2)(n) के तहत दोषी की उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए कहा कि “आपराधिक न्याय व्यवस्था में संदेह के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती, और जहां अभियोजन अपने आरोप संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहता है, वहां आरोपी को लाभ मिलना ही चाहिए।”

कोर्ट ने दो टूक कहा कि “आपराधिक न्याय व्यवस्था सहानुभूति, आक्रोश या सामाजिक दबाव से नहीं, बल्कि ‘बियॉन्ड रीजनबल डाउट’ की कसौटी पर चलती है।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि गंभीर से गंभीर अपराध में भी यदि अभियोजन संदेह से परे आरोप सिद्ध नहीं कर पाता, तो आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कानून की बुनियादी शर्तों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

2016 का मामला, 2020 में उम्रकैद और अब बरी

यह मामला वर्ष 2016 का है, जिसमें लाजवेन्द्र सिंह पर नाबालिग लड़की के साथ बार-बार दुष्कर्म करने के आरोप लगाए गए थे।

ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2020 में आरोपी को पॉक्सो अधिनियम, आईपीसी की धारा 376(2)(n) तथा एससी/एसटी अत्याचार अधिनियम के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

आरोपी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

बचाव पक्ष की दलीलें

याचिकाकर्ता पक्ष ने सबसे पहले यह गंभीर प्रश्न उठाया कि अभियोजन यह सिद्ध करने में असफल रहा कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी। बचाव में दलील दी गई कि पीड़िता के पहले स्कूल के प्रवेश रिकॉर्ड को जानबूझकर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया।

माता-पिता तथा जांच अधिकारियों ने स्वीकार किया कि पीड़िता की प्रारंभिक स्कूली पढ़ाई के दस्तावेज़ न तो जब्त किए गए और न ही उनकी जांच की गई।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि अभियोजन की पूरी कहानी स्वाभाविक मानवीय आचरण के विपरीत है। दलील दी गई कि अभियोजन का दावा है कि अभियुक्त ने अपनी बेटी को विदेश में बताकर पीड़िता को बहला-फुसलाया, जबकि पीड़िता और उसके माता-पिता ने स्वीकार किया कि उन्होंने न तो अभियुक्त की बेटी को देखा और न ही उसका नाम जानते थे।

शिकायत पत्र स्वयं पीड़िता या उसके माता-पिता द्वारा नहीं, बल्कि एक रिश्तेदार द्वारा लिखा गया, जिसे गवाह तक नहीं बनाया गया।

याचिकाकर्ता पक्ष ने कहा कि कथित घटना के बाद पीड़िता पूरे दिन अपने माता-पिता के साथ रही, फिर भी एफआईआर अगले दिन दर्ज कराई गई।

देरी का जो कारण बताया गया, वह न तो मेडिकल साक्ष्य से पुष्ट होता है और न ही गवाहों के बयानों से। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि यह मामला दोषपूर्ण जांच का उत्कृष्ट उदाहरण है।

दलील दी गई कि होटल, बस स्टैंड और पासपोर्ट कार्यालय जैसे महत्वपूर्ण स्थानों से CCTV फुटेज एकत्र नहीं किए गए, जबकि ये सबसे ठोस और निष्पक्ष साक्ष्य हो सकते थे।

बचाव पक्ष ने दलील दी कि अभियुक्त अपने भाई के साथ एक अलग होटल में ठहरा था, जिसका होटल रजिस्टर और होटल प्रबंधक की गवाही से प्रमाण मिलता है। अभियोजन इन साक्ष्यों को खंडित करने में असफल रहा।

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि मेडिकल रिपोर्ट कथित जबरन एवं बार-बार यौन शोषण की पुष्टि नहीं करती।

अभियोजन पक्ष की दलीलें

मामले में राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि निचली अदालत द्वारा अभियुक्त को दोषी ठहराया जाना पूरी तरह साक्ष्यों, कानून और स्थापित न्यायिक सिद्धांतों पर आधारित है तथा उसमें किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

अभियोजन ने कहा कि यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता का सुसंगत और भरोसेमंद बयान ही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त होता है, और वर्तमान मामले में पीड़िता का बयान प्रारंभिक शिकायत से लेकर न्यायालय में दिए गए साक्ष्य तक एकरूप रहा।

अभियोजन ने कहा कि जिरह के दौरान भी मूल घटना पर कोई गंभीर विरोधाभास नहीं आया और उसके बयान को उसके माता-पिता के कथनों से स्वाभाविक समर्थन प्राप्त है।

राज्य पक्ष ने कहा कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की मार्कशीट में पीड़िता की जन्मतिथि स्पष्ट रूप से अंकित है, जो कानूनन स्वीकार्य साक्ष्य है। आयु निर्धारण के लिए स्कूल प्रमाण-पत्र को अदालत द्वारा बार-बार मान्यता दी गई है।

केवल यह कहना कि पहले स्कूल का रिकॉर्ड पेश नहीं हुआ, अभियोजन के पूरे मामले को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता।

प्रतिवादी पक्ष के अनुसार अभियुक्त इस बिंदु पर केवल संदेह उत्पन्न करने का प्रयास कर रहा है, ठोस खंडन प्रस्तुत नहीं कर सका।

एफआईआर में देरी, विरोध न करना

एफआईआर में देरी को लेकर अभियोजन ने कहा कि यौन शोषण की शिकार नाबालिग लड़की मानसिक आघात, भय और सामाजिक दबाव में रहती है और ऐसे मामलों में तत्काल रिपोर्ट न होना असामान्य नहीं है।

अभियोजन ने सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एफआईआर में कुछ देरी मात्र से अभियोजन की कहानी अविश्वसनीय नहीं हो जाती, विशेषकर जब पीड़िता का बयान सुसंगत हो।

अभियोजन ने यह भी कहा कि सार्वजनिक स्थान पर विरोध न करना सहमति नहीं है। कहा गया कि पीड़िता द्वारा बस, होटल या अन्य सार्वजनिक स्थान पर शोर न मचाना उसकी सहमति का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

अभियोजन ने कहा कि भय, धमकी और मानसिक दबाव में पीड़िता का मौन रहना स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया है।

जांच संबंधी आपत्तियों पर दलील दी गई कि यदि जांच में कुछ कमियां भी हों, तो भी जब पीड़िता का बयान और परिस्थितिजन्य साक्ष्य दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हों, तो अभियुक्त को लाभ नहीं दिया जा सकता।

क्या पीड़िता नाबालिग थी?

पीड़िता के नाबालिग होने के कानूनी बिंदु पर हाईकोर्ट ने कहा कि पॉक्सो जैसे कानून में पीड़िता का नाबालिग होना अभियोजन की नींव है, और इसे संदेह से परे सिद्ध करना अभियोजन की कानूनी जिम्मेदारी है।

कोर्ट ने पाया कि पीड़िता के पहले स्कूल के प्रवेश रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किए गए और जांच अधिकारियों ने स्वीकार किया कि उन्होंने पहले स्कूल से कोई दस्तावेज़ जुटाने का प्रयास ही नहीं किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन ने केवल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की मार्कशीट पर निर्भरता दिखाई और अन्य सरकारी दस्तावेज़ों में जन्मतिथि को लेकर विरोधाभास मौजूद थे।

कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि सबसे प्रासंगिक और प्रारंभिक दस्तावेज़ों को जानबूझकर पेश न करना अभियोजन के खिलाफ प्रतिकूल अनुमान (adverse inference) को जन्म देता है।

अभियोजन की कहानी पर सवाल

हाईकोर्ट ने अभियोजन की पूरी कहानी को कई स्तरों पर अविश्वसनीय और अस्वाभाविक बताया।

कोर्ट के अनुसार अभियुक्त की कथित “विदेश में रहने वाली बेटी” के नाम, पहचान या अस्तित्व की जानकारी पीड़िता और उसके माता-पिता को नहीं थी।

शिकायत किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा लिखी गई, जिसे गवाह नहीं बनाया गया और पहली सूचना और एफआईआर के बीच देरी का संतोषजनक कारण नहीं दिया गया।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में आरोपी को एफआईआर से पहले हिरासत में लेने के संकेत मिले। ऐसी परिस्थितियों में कहानी की स्वाभाविकता समाप्त हो जाती है और संदेह गहराता है।

CCTV, गवाह और तकनीकी सबूत गायब

हाईकोर्ट ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि होटल और पासपोर्ट कार्यालय के CCTV फुटेज नहीं जुटाए गए, बस यात्रियों या सह-यात्रियों से कोई पूछताछ नहीं की गई और जिस होटल में पीड़िता के रुकने का दावा किया गया, वहां के रजिस्टर में अभियुक्त का नाम नहीं था।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कई महत्वपूर्ण गवाहों को बिना कारण पेश नहीं किया गया और जब सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध साक्ष्य मौजूद हों और उन्हें जानबूझकर या लापरवाही से इकट्ठा न किया जाए, तो उसका लाभ अभियुक्त को ही मिलेगा।

बचाव पक्ष के साक्ष्य बने निर्णायक

इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि बचाव पक्ष ने न केवल मौखिक, बल्कि ठोस दस्तावेज़ी साक्ष्य प्रस्तुत किए।

बचाव पक्ष के अनुसार अभियुक्त अपने भाई के साथ एक अलग होटल में ठहरा था और होटल रजिस्टर में अभियुक्त का नाम दर्ज था। होटल प्रबंधक ने गवाही देकर इसकी पुष्टि की और अभियोजन इस साक्ष्य को प्रभावी ढंग से खंडित नहीं कर सका।

हाईकोर्ट ने माना कि बचाव पक्ष को संदेह से परे प्रमाण नहीं देना होता, बल्कि केवल इतना दिखाना होता है कि अभियोजन की कहानी संदिग्ध है—और यह शर्त यहां पूरी होती है।

मेडिकल रिपोर्ट कमजोर

हाईकोर्ट ने मामले में पेश किए गए मेडिकल साक्ष्यों को लेकर कहा कि पीड़िता को किसी प्रकार की गंभीर आंतरिक या बाहरी चोट नहीं पाई गई। पीड़िता द्वारा पहले भी शारीरिक संबंध होने का उल्लेख था, जिसका एफआईआर में जिक्र नहीं था।

कोर्ट ने कहा कि हालांकि चोटों का अभाव अपने-आप में निर्णायक नहीं होता, लेकिन जब इसे अन्य विरोधाभासों के साथ देखा जाए, तो यह अभियोजन के मामले को कमजोर करता है।

हाईकोर्ट का फैसला

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि—

“आपराधिक न्याय प्रणाली सहानुभूति या आक्रोश पर नहीं, बल्कि साक्ष्य और कानून पर चलती है।
संदेह कितना भी छोटा क्यों न हो, यदि वह युक्तिसंगत है, तो उसका लाभ अभियुक्त को देना ही होगा।”

कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए अभियुक्त को सभी आरोपों से बरी कर दिया और कहा कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो, तो उसे आत्मसमर्पण की आवश्यकता नहीं है।

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