रोडवेक के मृतक कर्मचारी के परिवार पेंशन पर दो महिलाओं का दावा, मामला सिविल कोर्ट भेजा गया
जोधपुर, 7 दिसंबर
राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ से एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है, जिसमें परिवार पेंशन के अधिकार को लेकर दो महिलाओं के बीच छिड़े विवाद पर हाईकोर्ट ने गंभीर टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि वैधानिक रूप से मान्य पत्नी के अधिकारों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने अपने रिपोर्टेबल और ऐतिहासिक फैसले में कहा कि “हिंदू व्यक्तिगत कानून में ‘पहली पत्नी’ और ‘दूसरी पत्नी’ की कोई अवधारणा ही नहीं है। वैध विवाह यदि जीवित है, तो उसके रहते की गई दूसरी शादी को विधिक मान्यता प्राप्त नहीं होती।”
दो पत्नी के इस विवाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने पत्नी होने का दावा करने वाली दोनों महिलाओं को यह छूट दी है कि वे मृतक की संपत्ति एवं पेंशन में अपने अधिकार को लेकर वाद दायर कर सकती हैं।
साथ ही हाईकोर्ट ने दोनों महिला पक्षकारों की आयु को देखते हुए सिविल कोर्ट को मामले की सुनवाई साप्ताहिक तौर पर करने के आदेश दिए हैं।
अदालत के अधिकार क्षेत्र का विषय
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि
पारिवारिक पेंशन केवल उसी व्यक्ति को मिल सकती है जिसने मृतक कर्मचारी से वैधानिक रूप से मान्य विवाह किया हो।
यदि दो महिलाएँ दावा करती हैं लेकिन उनके दावों के समर्थन में कानूनी प्रमाण नहीं है, तो यह विवाद सिविल न्यायालय में उचित परीक्षण के बाद ही हल किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सेवा नियमों के तहत विभाग स्वयं यह निर्णय नहीं ले सकता कि कौन “वास्तविक पत्नी” है—यह अदालत के अधिकार क्षेत्र का विषय है।
एक ही पत्नी हो सकती हैं हकदार
हाईकोर्ट ने इस मामले में कहा कि कर्मचारी का निधन बहुत पहले हो चुका है, पक्षकार स्वयं अधिक आयु के हो चुके हैं, और केवल एक ही पत्नी पेंशन की वास्तविक हकदार हो सकती है।
इसलिए सिविल कोर्ट इस मामले की साप्ताहिक सुनवाई करे और अधिकतम एक वर्ष में इसमें फैसला सुनाए।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता आनंद कंवर की ओर अधिवक्ता ने दलील देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ही दिवंगत मूल सिंह देवड़ा की कानूनी पत्नी हैं और वे पेंशन भुगतान आदेश (PPO) में नामांकित लाभार्थी हैं।
याचिका में कहा कि सभी आवश्यक नामांकन दस्तावेज़—जो नियम 74, राजस्थान सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1996 के अंतर्गत आते हैं—याचिकाकर्ता के नाम पर ही हैं।
मूल सिंह की मृत्यु के बाद परिवार पेंशन का वैध और एकमात्र अधिकार याचिकाकर्ता का है, विशेष रूप से तब जब प्रतिवादी सयार कंवर द्वारा दायर उत्तराधिकार आवेदन निरस्त हो चुका है, और इस प्रकार विवाद स्वतः समाप्त हो गया है।
इसके बावजूद विभाग की ओर से पेंशन जारी नहीं की गई, जो कि पूर्णतः मनमाना, अवैध तथा याचिकाकर्ता के जीवन एवं आजीविका के मूल अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन है।
अधिवक्ता ने यह भी कहा कि परिवार पेंशन एक कल्याणकारी और संरक्षक योजना है, यह विधवा की आर्थिक सुरक्षा के लिए बनाई गई है। PPO एक बार सत्यापित होकर जारी हो जाए तो विभाग की जिम्मेदारी है कि उसे लागू करे।
विभाग की दलील
इस मामले में निगम की ओर से कहा गया कि मूल सिंह की सेवा व सेवानिवृत्ति का रिकॉर्ड सही है, PPO में याचिकाकर्ता आनंद कंवर का नाम दर्ज है।
विभाग ने कहा कि इस मामले में अभी भी विवाद लंबित हैं और “जब तक मामला स्पष्ट नहीं होता, पेंशन जारी नहीं की जा सकती।”
प्रतिवादी का दावा
प्रतिवादी सयार कंवर ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि CPF (भविष्य निधि) नामांकन फॉर्म, वर्ष 1972 में, उन्हें मृतक की पत्नी बताया गया था।
जवाब में कहा गया कि उन्होंने मूल सिंह से 1962 में विवाह किया था। विवाह उनकी मृत्यु तक वैध रूप से चलता रहा। यहां तक कि राशन कार्ड, CPF नामांकन तथा अन्य रिकॉर्ड उन्हें पत्नी के रूप में दर्शाते हैं।
सयार कंवर की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता का दावा “कानूनी रूप से असंगत” है क्योंकि नामांकन वैध पत्नी होने का प्रमाण नहीं होता।
सयार कंवर की ओर से कहा गया कि उनके द्वारा दायर उत्तराधिकार आवेदन केवल प्रक्रिया में त्रुटि के आधार पर निरस्त हुआ था।
वास्तविक वैवाहिक स्थिति के निर्धारण के लिए सिविल कोर्ट ही उचित मंच है।
सिविल कोर्ट पता लगाए वैध पत्नी कौन
सभी पक्षों की बहस के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में दो महिलाओं के प्रतिस्पर्धी दावे मौजूद हैं।
दोनों स्वयं को मृतक की पत्नी बताती हैं लेकिन किसी भी दावे को निर्णायक रूप से सिद्ध करने वाला ठोस दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है। इससे कोर्ट को समाधान निकालने में कठिनाई उत्पन्न होती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि मूल सिंह की मृत्यु (2013) के समय दो महिलाएँ स्वयं को उनकी पत्नी बताती हैं। 1972 का रिकॉर्ड सयार कंवर को पत्नी बताता है और PPO (2000) कार्यरत रिकॉर्ड आनंद कंवर को पत्नी बताता है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में अब यह विवाद सिर्फ पेंशन का नहीं, बल्कि यह निर्धारित करने का है कि—
“कानून की दृष्टि में मृतक की वास्तविक, वैध पत्नी कौन है?”
हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू व्यक्तिगत कानून में ‘पहली पत्नी–दूसरी पत्नी’ जैसी कोई अवधारणा नहीं है, एक विवाह तब तक वैध है जब तक वह कानूनी रूप से समाप्त न हो जाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि वैध पहली शादी के रहते दूसरी शादी अवैध होती है इसलिए परिवार पेंशन का अधिकार केवल विधिक रूप से वैध पत्नी को प्राप्त होता है।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पत्नी होने का अधिकार केवल सिविल कोर्ट ही कर सकता है, इसलिए मामला सिविल कोर्ट को भेजने का आदेश दिया।
ये है मामला
याचिका के अनुसार मृतक मूल सिंह देवड़ा राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम से 30 सितंबर 2000 को सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त हुए।
सेवा-निवृत्ति के 28 अक्टूबर 2000 को जारी पेंशन भुगतान आदेश (PPO) के अनुसार उनकी मृत्यु दिसंबर 2013 तक पेंशन मिलती रही।
(आपके मूल पाठ में 2023 लिखा था; यदि आप चाहें, मैं 2023 ही रहने दूँ, लेकिन वह तथ्यात्मक त्रुटि है।)
याचिकाकर्ता आनंद कंवर ने मूल सिंह देवड़ा की पत्नी बताते हुए परिवार पेंशन जारी करने के लिए आवेदन किया।
याचिकाकर्ता आनंद कंवर का दावा कि 1 जनवरी 2014 को उनका नाम PPO में पत्नी एवं नामांकित लाभार्थी के रूप में दर्ज था।
लेकिन मामले की अन्य प्रतिवादी सयार कंवर ने खुद को मृतक की पत्नी बताते हुए दावा किया कि 1972 के नामांकन फॉर्म में उनका नाम दर्ज है और पारिवारिक पेंशन उन्हें दी जाए।
दो नामांकन के चलते विभाग ने सयार कंवर को उत्तराधिकार प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने को कहा, जिसके लिए उन्होंने सिविल आवेदन दायर किया, जो 28 अप्रैल 2016 को खारिज कर दिया गया।
इसके बावजूद विभाग ने याचिकाकर्ता आनंद कंवर को भी परिवार पेंशन जारी नहीं की।
आनंद कंवर की ओर से दायर की गई याचिका में कहा गया कि स्वर्गीय मूल सिंह देवड़ा की मृत्यु के बाद उन्हें मिलने वाली परिवार पेंशन को प्रतिवादीगण द्वारा मनमाने और अनुचित तरीके से रोक दिया गया है, जबकि कानून के अनुसार वे इसकी वैध उत्तराधिकारी हैं।
सरकार करें संशोधन
राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले में राज्य के महाधिवक्ता को संबोधित करते हुए टिप्पणी की कि इस तरह के मामलों को लेकर राज्य के पेंशन नियमों में संशोधन करने की जरूरत है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार पारिवारिक पेंशन, नामांकन, विवाह-विच्छेद तथा पात्रता से संबंधित प्रावधानों को अधिक पारदर्शी और साधारण भाषा में तैयार कर सकती है जिससे किसी भी प्रकार की व्याख्या संबंधी भ्रम की गुंजाइश न रहे।
हाईकोर्ट ने राज्य के महाधिवक्ता को मामला भेजते हुए अपेक्षा की है कि वे यह सुझाव राज्य सरकार के संज्ञान में लाएँ।