जयपुर : राजस्थान हाईकोर्ट ने रक्षा मंत्रालय के अधीन कार्यरत कैंटीन स्टोर्स डिपार्टमेंट (CSD) के एक कर्मचारी की ट्रांसफर चुनौती खारिज करते हुए अहम फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने कहा कि ट्रांसफर सेवा का सामान्य हिस्सा है और कोई भी कर्मचारी किसी एक स्थान पर बने रहने का कानूनी अधिकार नहीं रखता। यदि तबादला प्रशासनिक जरूरतों के तहत किया गया है और उसमें दुर्भावना या नियमों का उल्लंघन साबित नहीं होता, तो कोर्ट हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
जस्टिस उमा शंकर व्यास और जस्टिस अशोक कुमार जैन की खंडपीठ ने छत्रपाल सिंह गौर की याचिका खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता जयपुर स्थित CSD डिपो में LDC (Stores) के पद पर कार्यरत था और उसे मुंबई स्थित मुख्यालय (हेडक्वार्टर) ट्रांसफर किया गया था।
कोर्ट ने साफ किया है कि
ट्रांसफर किसी भी सरकारी या सार्वजनिक सेवा का सामान्य हिस्सा होता है। यदि ट्रांसफर एडमिनिस्ट्रेटिव जरूरतों के तहत हुआ है और उसमें मालाफाइड या नियमों के उल्लंघन का कोई ठोस सबूत न हो, तो कोर्ट उसमें दखल नहीं दे सकती।
खंडपीठ ने यह फैसला देते हुए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के आदेश को बरकरार रखा और कर्मचारी की याचिका खारिज कर दी।
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RTI और बोनस विवाद के बाद शुरू हुआ विवाद
याचिकाकर्ता का कहना था कि उसने वित्तीय वर्ष 2022-23 का बोनस नहीं मिलने पर विभाग के खिलाफ आवाज उठाई थी। उसने इस संबंध में रक्षा मंत्री को ई-मेल भेजा और सूचना के अधिकार (RTI) कानून के तहत जानकारी भी मांगी थी।
कर्मचारी का आरोप था कि विभाग उसके इन कदमों से नाराज हो गया और उसे प्रताड़ित करने के उद्देश्य से जयपुर से मुंबई ट्रांसफर कर दिया गया।
उसने कोर्ट को बताया कि उसका सर्विस रिकॉर्ड पूरी तरह साफ है। उसके खिलाफ कभी कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हुई और न ही किसी तरह का दंडात्मक रिकॉर्ड मौजूद है। इसके बावजूद उसे अचानक दूरस्थ स्थान पर भेज दिया गया।
याचिकाकर्ता का दावा था कि ट्रांसफर वास्तव में एडमिनिस्ट्रेटिव फैसला नहीं बल्कि प्रतिशोधात्मक कार्रवाई थी।
कर्मचारी ने ट्रांसफर पॉलिसी का दिया हवाला
ट्रांसफर आदेश को चुनौती देते हुए कर्मचारी ने CSD की 2011 की ट्रांसफर पॉलिसी का सहारा लिया।
उसका तर्क था कि विभाग में कई ऐसे कर्मचारी मौजूद थे जो उससे अधिक समय से जयपुर में तैनात थे। ट्रांसफर पॉलिसी के अनुसार पहले उन कर्मचारियों को स्थानांतरित किया जाना चाहिए था जो “लॉन्गेस्ट स्टेयी” श्रेणी में आते थे।
याचिकाकर्ता ने लगभग 25 कर्मचारियों की सूची भी पेश की और कहा कि विभाग ने अपनी ही नीति का पालन नहीं किया।
उसने यह भी कहा कि उसकी नियुक्ति LDC (Stores) के रूप में हुई थी। इसलिए उसे स्टोर्स से जुड़े प्रतिष्ठानों में ही तैनात किया जा सकता है, जबकि मुंबई हेडक्वार्टर में उसकी पोस्टिंग नियमों के अनुरूप नहीं है।
प्रशासन का पक्ष: ‘नियम पीछे, विभाग की जरूरत पहले’
दूसरी ओर, प्रशासन की तरफ से स्पष्ट किया गया कि यह ट्रांसफर पूरी तरह से प्रशासनिक जरूरत के आधार पर किया गया था।
रिकॉर्ड के अनुसार, मुंबई हेड ऑफिस में स्टाफ की कमी थी, जिसके कारण संगठनात्मक आवश्यकता को देखते हुए कर्मचारी का ट्रांसफर किया गया।
साथ ही यह भी बताया गया कि ट्रांसफर पॉलिसी केवल एक गाइडलाइन है, कोई बाध्यकारी नियम नहीं। प्रशासन को यह अधिकार है कि वह आवश्यकतानुसार इन गाइडलाइंस से हटकर निर्णय ले सके।
कोर्ट के सामने यह भी तथ्य आया कि याचिकाकर्ता ने जयपुर में तीन साल से अधिक समय तक काम किया, जबकि न्यूनतम कार्यकाल केवल दो साल का था।
ट्रांसफर पॉलिसी कोई वैधानिक अधिकार नहीं: हाईकोर्ट
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने कर्मचारी की दलीलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि ट्रांसफर पॉलिसी कोई वैधानिक नियम नहीं होती, बल्कि प्रशासनिक गाइडलाइन होती है। ऐसी गाइडलाइन विभाग को कामकाज चलाने में सहायता देती हैं, लेकिन उनसे हर स्थिति में बंधे रहना जरूरी नहीं है।
खंडपीठ ने कहा कि संबंधित ट्रांसफर पॉलिसी में ही यह प्रावधान मौजूद है कि एडमिनिस्ट्रेटिव जरूरत होने पर “लॉन्गेस्ट स्टेयी” सिद्धांत से हटकर भी ट्रांसफर किया जा सकता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी को केवल इस आधार पर राहत नहीं दी जा सकती कि विभाग ने ट्रांसफर पॉलिसी का अक्षरशः पालन नहीं किया।
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‘कहां काम लेना है, यह नियोक्ता तय करेगा’
फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी की सेवाओं का उपयोग कहां और किस प्रकार किया जाना है, यह तय करना पूरी तरह नियोक्ता का अधिकार है।
कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी यह नहीं तय कर सकता कि उसे किस कार्यालय या किस शहर में तैनात किया जाए। किसी व्यक्ति की उपयुक्तता, कार्यकुशलता और विभागीय जरूरतों का आकलन संबंधित विभाग ही कर सकता है।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि केवल इसलिए कि कर्मचारी LDC (Stores) के पद पर नियुक्त हुआ था, यह नहीं माना जा सकता कि उसे केवल स्टोर्स ईकाइयों में ही कार्य करना होगा। यदि विभाग को उसकी सेवाओं की जरूरत किसी अन्य कार्यालय या हेडक्वार्टर में महसूस होती है, तो उसे वहां भेजा जा सकता है।
दुर्भावनापूर्ण ट्रांसफर के आरोप पर कोर्ट का रुख
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि कर्मचारी ने ट्रांसफर को RTI आवेदन और बोनस विवाद से जोड़ने की कोशिश की। लेकिन कोर्ट को रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि ट्रांसफर प्रतिशोध की भावना से किया गया था।
कोर्ट ने पाया कि RTI के तहत मांगी गई जानकारी विभाग ने उपलब्ध करा दी थी। वहीं बोनस से जुड़ा मामला अलग प्रक्रिया में विचाराधीन था।
खंडपीठ ने कहा कि केवल RTI दायर कर देना या किसी अधिकारी को ई-मेल भेज देना यह साबित नहीं करता कि बाद में हुआ ट्रांसफर दुर्भावनापूर्ण था।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि विवादित आदेश के तहत केवल याचिकाकर्ता का ही नहीं, बल्कि तीन कर्मचारियों का एक साथ ट्रांसफर किया गया था। इससे यह तर्क कमजोर पड़ जाता है कि कार्रवाई विशेष रूप से उसी को निशाना बनाने के लिए की गई थी।
‘ऑल इंडिया ट्रांसफर लायबिलिटी’ बना बड़ा आधार
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि कर्मचारी ने नौकरी जॉइन करते समय ऑल इंडिया ट्रांसफर लायबिलिटी स्वीकार की थी।
रिकॉर्ड के अनुसार वह पहले बठिंडा में कार्यरत था और बाद में अपनी पसंद के आधार पर जयपुर आया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई कर्मचारी ऑल इंडिया ट्रांसफर लायबिलिटी वाली नौकरी स्वीकार करता है, तो वह किसी एक स्थान पर स्थायी रूप से बने रहने का दावा नहीं कर सकता।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता मार्च 2023 से जयपुर में तैनात था। फरवरी 2025 में ट्रांसफर आदेश जारी होने के बावजूद CAT से मिले अंतरिम संरक्षण के कारण वह मई 2026 तक वहीं कार्य करता रहा।
इस प्रकार वह निर्धारित कार्यकाल से अधिक समय तक जयपुर में रह चुका था।
मॉडल एम्प्लॉयर बनने की नसीहत, लेकिन ट्रांसफर बरकरार
फैसले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों को “मॉडल एम्प्लॉयर” की तरह व्यवहार करना चाहिए।
कर्मचारियों के साथ निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी है। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि हर ट्रांसफर आदेश को कोर्ट में चुनौती देकर रद्द कराया जा सके।
कोर्ट ने दोहराया कि जब तक ट्रांसफर आदेश में मालाफाइड, कानूनी त्रुटि या अधिकारों के दुरुपयोग का स्पष्ट मामला सामने न आए, तब तक न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं माना जाएगा।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता अपने ट्रांसफर को दुर्भावनापूर्ण या नियमों के विपरीत साबित करने में विफल रहा।
कोर्ट को ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि RTI आवेदन, बोनस विवाद या किसी व्यक्तिगत कारण से उसे निशाना बनाया गया।
कोर्ट ने कहा कि ट्रांसफर विभाग की प्रशासनिक जरूरतों के तहत किया गया था और कर्मचारी पहले ही निर्धारित कार्यकाल से अधिक समय जयपुर में बिता चुका था। इसलिए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है और याचिका खारिज की जाती है।
फैसले का असर
यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सरकारी नौकरी में “पसंदीदा पोस्टिंग” का कोई कानूनी अधिकार नहीं होता।
साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि ट्रांसफर पॉलिसी केवल दिशा-निर्देश है, कोई कठोर नियम नहीं।
इस फैसले से प्रशासन को अपने कामकाज के अनुसार कर्मचारियों की तैनाती तय करने का अधिकार मिलता है, वहीं कर्मचारियों को यह समझना होगा कि सेवा में ट्रांसफर एक सामान्य और अनिवार्य प्रक्रिया है।