बीकानेर में 2004 में अवैध शराब से हुई मौतो का मामला, पुलिस अधिकारी के खिलाफ जारी आदेश किए रद्द
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी सेवा मामलों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई करते समय कारणों का स्पष्ट उल्लेख करना अनिवार्य है।
अनुशासनात्मक, अपीलीय अथवा पुनरीक्षण प्राधिकारी द्वारा पारित ऐसा कोई भी आदेश, जिसमें कारण दर्ज न हों, न केवल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन माना जाएगा, बल्कि वह न्यायिक समीक्षा में टिक भी नहीं पाएगा।
यह महत्वपूर्ण फैसला राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ के जज जस्टिस गणेश राम मीणा ने दिनेश कुमार अग्रवाल की ओर से दायर याचिका पर दिया हैं.
राजस्थान हाईकोर्ट ने इसके साथ ही पुलिस अधिकारी दिनेश कुमार अग्रवाल के खिलाफ डीजीपी द्वारा वेतनवृद्धि रोकने के अनुशासनात्मक आदेश, अपीलीय आदेश और पुनरीक्षण आदेश—तीनों को गैर-कारणयुक्त, मनमाना और प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध मानते हुए निरस्त किया हैं.
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया हैं कि “स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं है” जैसे सामान्य और अस्पष्ट शब्दों में पारित आदेश सेवा न्यायशास्त्र की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
अवैध शराब मृत्युकांड से जुड़ा मामला
याचिकाकर्ता दिनेश कुमार अग्रवाल का चयन राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) के माध्यम से हुआ था.
दिनेशकुमार अग्रवाल को 27 दिसंबर 1999 को राजस्थान पुलिस सेवा में नियुक्त किया गया।
वर्ष 2004-05 में वे आबकारी विभाग में प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत थे और बीकानेर में एक्साइज प्रिवेंटिव फोर्स में उप अधीक्षक के पद पर तैनात थे।
इसी दौरान अवैध शराब के सेवन से कई लोगों की मृत्यु होने की घटनाओं को लेकर विभाग ने यह आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने अपने कर्तव्यों का निर्वहन सही ढंग से नहीं किया और अवैध शराब के निर्माण व वितरण को रोकने में लापरवाही बरती।
इन आरोपों के आधार पर 29 जनवरी 2008 को राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 के तहत चार्जशीट जारी की गई।
विभागीय कार्रवाई और दंड
याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारी ने चार्जशीट का विस्तृत और तथ्यात्मक जवाब प्रस्तुत करते हुए सभी आरोपों का खंडन किया।
इसके बावजूद पुलिस महानिदेशक (DGP) ने 23 जुलाई 2008 को आदेश पारित कर याचिकाकर्ता को दोषी ठहराते हुए दो वार्षिक वेतनवृद्धियाँ बिना संचयी प्रभाव के रोकने का दंड दिया.
इस आदेश में केवल यह उल्लेख किया गया कि प्रस्तुत स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं है, लेकिन यह नहीं बताया गया कि किन तथ्यों, साक्ष्यों या आधारों पर स्पष्टीकरण को अस्वीकार किया गया।
अपील और पुनरीक्षण भी रहे औपचारिक
डीजीपी के निर्णय के खिलाफ याचिकाकर्ता ने नियम 23 के तहत अपील दायर की।
अपीलीय प्राधिकारी ने विभाग से रिपोर्ट मंगवाई और उसी रिपोर्ट के आधार पर 8 जनवरी 2013 को अपील खारिज कर दी।
याचिकाकर्ता को न तो वह रिपोर्ट उपलब्ध कराई गई और न ही उस पर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने राज्यपाल के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दायर की, जिसे 19 जुलाई 2016 को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि पूर्व आदेशों में कोई त्रुटि नहीं है।
पुनरीक्षण आदेश भी पूरी तरह गैर-कारणयुक्त (Non-Speaking) रहा।
हाईकोर्ट में चुनौती
इन सभी आदेशों को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए याचिका दायर कि गयी.
याचिका में दलील दी गयी कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने उनके स्पष्टीकरण पर विचार नहीं किया।
दंडादेश, अपीलीय आदेश और पुनरीक्षण आदेश—तीनों ही फैसलो में कारण नहीं बताया गया.
अपीलीय प्राधिकारी ने विभागीय रिपोर्ट के आधार पर फैसला लिया, जो याचिकाकर्ता को न तो दिखाई गई और न ही उस पर जवाब देने का अवसर मिला।
समान आरोपों में अन्य अधिकारी को राहत दी गई, लेकिन याचिकाकर्ता के मामले में भेदभाव किया गया।
हाईकोर्ट की टिप्पणियाँ
सभी पक्षो को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि कोई भी प्रतिकूल आदेश ‘स्पीकिंग ऑर्डर’ होना चाहिए।
केवल यह लिख देना कि “स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं है”, कारण बताने की कानूनी जिम्मेदारी से मुक्ति नहीं दिलाता।
अनुशासनात्मक प्राधिकारी को यह स्पष्ट करना होता है कि किस आधार पर आरोप सिद्ध माने गए।
अपीलीय प्राधिकारी की भूमिका स्वतंत्र और प्रभावी होती है, न कि केवल विभागीय आदेश की औपचारिक पुष्टि करना।
हाईकोर्ट ने कहा कि पुनरीक्षण प्राधिकारी भी यांत्रिक तरीके से आदेश पारित नहीं कर सकता।
नेचुरल जस्टिस का उल्लंघन
कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता को अपीलीय स्तर पर विभागीय रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई, न ही उस पर प्रतिक्रिया देने का अवसर दिया गया। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन है।
हाईकोर्ट ने कहा कि कारण दर्ज करने का उद्देश्य केवल अदालत की संतुष्टि नहीं, बल्कि प्रभावित व्यक्ति को यह जानने का अधिकार देना है कि उसके विरुद्ध निर्णय क्यों लिया गया।
फैसले के महत्वपूर्ण बिंदू
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट और कठोर शब्दों में कहा कि सेवा कानून के अंतर्गत पारित होने वाला कोई भी प्रतिकूल आदेश ‘स्पीकिंग ऑर्डर’ होना अनिवार्य है। हाईकोर्ट ने कहा कि
कारणों का अभाव आदेश को अवैध बनाता है
अनुशासनात्मक, अपीलीय अथवा पुनरीक्षण प्राधिकारी द्वारा पारित ऐसा आदेश जिसमें कारणों का उल्लेख नहीं किया गया हो, वह न केवल मनमाना होता है बल्कि कानून की दृष्टि में अस्थिर unsustainable) भी होता है।
“स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं है” कहना पर्याप्त नहीं
केवल यह लिख देना कि कर्मचारी का स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं है, कारण बताने की संवैधानिक और वैधानिक जिम्मेदारी से प्राधिकारी को मुक्त नहीं करता। यह बताना आवश्यक है कि—कौन-सा आरोप सिद्ध हुआ, किन साक्ष्यों के आधार पर और कर्मचारी की दलीलों को क्यों अस्वीकार किया गया.
अपील वास्तविक होनी चाहिए, औपचारिक नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलीय प्राधिकारी की भूमिका केवल अनुशासनात्मक आदेश की पुष्टि करने तक सीमित नहीं है। अपील एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और प्रभावी अधिकार है, जिसका सार्थक परीक्षण किया जाना आवश्यक है।
गोपनीय रिपोर्ट के आधार पर निर्णय अवैध
यदि अपीलीय प्राधिकारी किसी विभागीय या विजिलेंस रिपोर्ट के आधार पर निर्णय लेता है, तो वह रिपोर्ट संबंधित कर्मचारी को उपलब्ध कराना और उस पर जवाब देने का अवसर देना अनिवार्य है। ऐसा न करना प्राकृतिक न्याय का गंभीर उल्लंघन है।
पुनरीक्षण प्राधिकारी भी मशीनी आदेश पारित नहीं कर सकता
पुनरीक्षण प्राधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह यह जांचे कि पूर्ववर्ती आदेश वैध, तर्कसंगत और न्यायसंगत हैं या नहीं। बिना स्वतंत्र विवेचना के पारित आदेश गैर-कानूनी है।
कारण दर्ज करने का उद्देश्य केवल संतुष्ट करना नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि ने कहा कि कारण लिखने का उद्देश्य केवल हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को संतुष्ट करना नहीं, बल्कि प्रभावित व्यक्ति को यह बताना है कि उसके विरुद्ध निर्णय क्यों लिया गया।
तीनों आदेश Non-Speaking और अवैध
इस प्रकरण में अनुशासनात्मक आदेश, अपीलीय आदेश और पुनरीक्षण आदेश—तीनों को न्यायालय ने गैर-कारणयुक्त, मनमाना और प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध पाते हुए निरस्त कर दिया।