हाईकोर्ट ने कहा, विवाह से पहले महिला पिता के परिवार की सदस्य और विवाह के बाद पति के परिवार का हिस्सा, एक छात्रवृत्ति के आधार पर दो अलग-अलग परिवार अयोग्य नहीं हो सकते
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने स्वामी विवेकानंद स्कॉलरशिप फॉर एकेडमिक एक्सीलेंस स्कीम से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि विवाह से पहले पत्नी को मिली छात्रवृत्ति के आधार पर पति को छात्रवृत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि विवाह से पहले महिला अपने पिता के परिवार की सदस्य होती है और विवाह के बाद पति के परिवार का हिस्सा बनती है।
ऐसे में एक छात्रवृत्ति के आधार पर दो अलग-अलग परिवारों को अयोग्य ठहराना न केवल अनुचित है, बल्कि योजना के उद्देश्य के भी विपरीत है।
जस्टिस अनुरूप सिंघी ने यह महत्वपूर्ण फैसला पुत्र की ओर से पिता देवेंद्र कुमार कोठारी द्वारा दायर याचिका पर दिया है।
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याचिकाकर्ता देवेंद्र कुमार कोठारी ने अपने पुत्र प्रखर कोठारी की ओर से यह रिट याचिका दायर की थी।
प्रखर कोठारी अमेरिका की नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के केलॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में एमबीएआई (MBAi) पोस्ट-ग्रेजुएट प्रोग्राम में अध्ययनरत हैं।
उन्होंने राज्य सरकार की स्वामी विवेकानंद छात्रवृत्ति योजना के तहत आवेदन किया था, लेकिन 19 दिसंबर 2025 को उनका आवेदन खारिज कर दिया गया।
प्रशासन की ओर से मौखिक रूप से बताया गया कि प्रखर की पत्नी आरुषि असावा को पहले ही इसी योजना के तहत 9 सितंबर 2022 को छात्रवृत्ति मिल चुकी थी।
इसलिए योजना की शर्त 9(ii) के तहत ई-3 श्रेणी में एक परिवार से केवल एक ही सदस्य को छात्रवृत्ति दी जा सकती है; इस आधार पर प्रखर को अयोग्य मान लिया गया।
याचिका में दलील
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अभिनव शर्मा, पूजा शर्मा ने पैरवी करते हुए दलील दी कि पत्नी आरुषि असावा को छात्रवृत्ति विवाह से पहले मिली थी, उस समय वह अपने पिता के परिवार की सदस्य थीं।
प्रखर कोठारी से उनका विवाह 1 अप्रैल 2023 को हुआ। अतः विवाह से पूर्व दी गई छात्रवृत्ति को पति के परिवार के खाते में जोड़ना कानूनन और तार्किक दोनों दृष्टि से गलत है।
अधिवक्ता ने यह भी कहा कि छात्रवृत्ति जैसी कल्याणकारी योजनाओं की व्याख्या संकीर्ण या तकनीकी ढंग से नहीं की जानी चाहिए।
योजना का उद्देश्य मेधावी छात्रों को आर्थिक सहायता देकर उच्च शिक्षा के अवसर प्रदान करना है, न कि ऐसे आधारों पर उन्हें वंचित करना, जिनका उनके नियंत्रण से कोई संबंध नहीं है।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि योजना की शर्तें स्पष्ट हैं।
योजना में ई-3 श्रेणी में किसी भी परिस्थिति में एक परिवार से केवल एक सदस्य ही लाभान्वित हो सकता है।
चूंकि पत्नी को पहले ही छात्रवृत्ति मिल चुकी थी, इसलिए पति को लाभ देना योजना की शर्तों का उल्लंघन होगा।
सरकार ने यह भी कहा कि छात्रवृत्ति योजना लाभकारी जरूर है, लेकिन इसका विस्तार निर्धारित शर्तों से बाहर जाकर नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने योजना के उद्देश्य और उसकी शर्तों को लेकर कहा कि—
“छात्रवृत्ति का उद्देश्य वित्तीय बाधाओं को दूर कर योग्य छात्रों को उच्च शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना है। ऐसी योजनाओं की व्याख्या उदार, व्यावहारिक और उद्देश्यपरक होनी चाहिए, न कि कठोर और तकनीकी।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि विवाह से पहले किसी महिला को छात्रवृत्ति मिलती है, तो उसे उसके पिता के परिवार की छात्रवृत्ति माना जाएगा।
विवाह के बाद वह पति के परिवार की सदस्य बनती है। ऐसे में एक ही छात्रवृत्ति को दो परिवारों के लिए अयोग्यता का आधार बनाना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
‘परिवार’ की परिभाषा पर स्पष्टता
हाईकोर्ट ने योजना की धारा 8 और 9 का हवाला देते हुए कहा कि “परिवार” की परिभाषा परिस्थितियों के अनुसार तय होती है।
विवाह से पहले और विवाह के बाद परिवार की पहचान बदल जाती है।
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि—
“एक महिला को विवाह से पूर्व मिली छात्रवृत्ति के कारण उसके पति को विवाह के बाद छात्रवृत्ति से वंचित करना योजना के उद्देश्य के विपरीत है।”
पूर्व के फैसले का भी हवाला
अदालत ने इसी तरह के एक पूर्व मामले आराध्या जैन बनाम राजस्थान का हवाला देते हुए कहा कि छात्रवृत्ति योजनाओं में हाइपर-टेक्निकल एप्रोच अपनाना गलत है।
योजना का उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब उसका लाभ वास्तविक जरूरतमंद और योग्य छात्रों तक पहुंचे।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने विभाग द्वारा 19 दिसंबर 2025 को जारी वह आदेश रद्द कर दिया, जिसके तहत प्रखर कोठारी का आवेदन खारिज किया गया था।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और चयन समिति को निर्देश दिए कि वे प्रखर कोठारी के आवेदन पर नये सिरे से, मेरिट के आधार पर, योजना की शर्तों के अनुसार विचार करें और पहले की अस्वीकृति से प्रभावित न हों।