अजमेर: राजस्थान राज्य उपभोक्ता आयोग की अजमेर सर्किट बेंच में 15.95 करोड़ रुपये के बीमा क्लेम से जुड़े मामले में आयोग के सदस्यों के बीच मतभेद सामने आए हैं।
आयोग के अध्यक्ष जस्टिस देवेंद्र कच्छावा ने दो न्यायिक सदस्यों के बहुमत वाले फैसले में कई कमियां बताते हुए उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
उन्होंने मामले की दोबारा सुनवाई के लिए नई बेंच गठित कर 24 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए हैं।
यह मामला मैसर्स ऐडिग जेमटेक्स प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है। भीलवाड़ा जिला उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी को करीब 15.95 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति, 9 प्रतिशत सालाना ब्याज और 2.5 लाख रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में देने का आदेश दिया था।
बीमा कंपनी ने जिला आयोग के आदेश को दी थी चुनौती
भीलवाड़ा जिला उपभोक्ता आयोग ने 3 जून 2024 को मैसर्स ऐडिग जेमटेक्स प्राइवेट लिमिटेड का परिवाद स्वीकार किया था।
आयोग ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी को 15,95,65,010 रुपये की क्षतिपूर्ति राशि 9 प्रतिशत सालाना ब्याज और 2.5 लाख रुपये मुकदमे के खर्च सहित दो महीने में चुकाने का आदेश दिया था।
बीमा कंपनी ने इस फैसले को राजस्थान राज्य उपभोक्ता आयोग में चुनौती दी। अपील की सुनवाई अजमेर सर्किट बेंच में हुई।
दो सदस्यों ने फैसला सुनाया, अध्यक्ष ने जताई असहमति
आयोग के अध्यक्ष जस्टिस देवेंद्र कच्छावा, न्यायिक सदस्य सुरेंद्र सिंह और जय गौतम की बेंच ने 29 जून 2026 को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था।
इसके बाद दोनों न्यायिक सदस्यों ने अपना फैसला लिखकर हस्ताक्षर किए और अध्यक्ष को भेज दिया। लेकिन अध्यक्ष ने 14 अगस्त 2026 के आदेश में बहुमत के फैसले में कई कमियां गिनाईं और मामले को नई बेंच के सामने दोबारा सुनवाई के लिए रखने का निर्देश दिया।
अध्यक्ष ने कहा कि फैसले में कुछ महत्वपूर्ण कानूनी और तथ्यात्मक पहलुओं पर उचित तरीके से विचार नहीं किया गया।
पक्षकारों के नाम और कंपनी की स्थिति पर सवाल
अध्यक्ष ने फैसले में पक्षकारों की संख्या को लेकर विरोधाभास बताया। उन्होंने माना कि फैसले के एक पैराग्राफ में बैंक ऑफ बड़ौदा को विपक्षी संख्या 5 बताया गया, जबकि जिला आयोग के अंतिम संशोधित रिकॉर्ड में बैंक विपक्षी संख्या 4 था। रिकॉर्ड में विपक्षी संख्या 5 के रूप में कोई पक्षकार नहीं था।
अध्यक्ष ने यह भी कहा कि बहुमत के फैसले में कंपनी के निलंबित निदेशकों की ओर से पेश होने के आधार पर परिवाद की सुनवाई योग्य होने पर सवाल उठाया गया,
लेकिन इस तथ्य पर विचार नहीं किया गया कि संशोधन आदेश के बाद ऐडिग जेमटेक्स प्राइवेट लिमिटेड स्वयं परिवादी संख्या 3 के रूप में पक्षकार थी।
सर्वेयर रिपोर्ट और बीमा कंपनी के सबूतों पर भी आपत्ति
अध्यक्ष ने बहुमत के फैसले में सर्वेयर रिपोर्ट को लेकर दिए गए निष्कर्षों पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार, फैसले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया कि सर्वेयर रिपोर्ट अंतिम सत्य नहीं होती और बीमा कंपनी दूसरा सर्वेयर नियुक्त कर सकती थी।
इसके बावजूद, मामले में दूसरा सर्वेयर नियुक्त नहीं किए जाने के बावजूद बीमा कंपनी के पक्ष में निष्कर्ष दिया गया और परिवादी को इसके लिए जिम्मेदार माना गया। अध्यक्ष ने इस पर सवाल उठाया।
उन्होंने यह भी कहा कि जिला आयोग पर सर्वेयर रिपोर्ट को स्वीकार नहीं करने का ठोस कारण नहीं देने की टिप्पणी की गई, लेकिन बहुमत के फैसले में भी रिपोर्ट को खारिज करने का स्पष्ट आधार नहीं बताया गया।
दिवालिया प्रक्रिया और साक्ष्यों के आकलन पर भी उठाए सवाल
अध्यक्ष ने यह कि कहा कि बहुमत के फैसले में कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने और रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल नियुक्त होने का जिक्र किया गया। इसके आधार पर यह माना गया कि कंपनी बैंक का कर्ज चुकाने या समझौता करने की स्थिति में नहीं है।
अध्यक्ष ने सवाल उठाया कि इस निष्कर्ष के समर्थन में कोई न्यायसंगत कारण नहीं बताया गया।
फैसले में कंपनी के अधिकृत व्यक्ति सौरभ जैन के शपथ-पत्र को साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने के बावजूद बीमा कंपनी के सबूतों को ज्यादा विश्वसनीय माना गया, लेकिन इसकी वजह स्पष्ट नहीं की गई।
नई बेंच में 24 अक्टूबर को दोबारा सुनवाई के निर्देश
अध्यक्ष ने कहा कि बहस पूरी होने और फैसला लिखे जाने के बीच काफी समय बीतने के कारण संभव है कि रिकॉर्ड के सभी पहलुओं का बारीकी से अवलोकन नहीं हो पाया हो। उन्होंने फैसले में उठाई गई कमियों को दोबारा सुनवाई की जरूरत का आधार बनाया।
अध्यक्ष ने मामले को 24 अक्टूबर को नई बेंच के सामने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। नई बेंच को पहले दिए गए दोनों सदस्यों के फैसलों का भी अवलोकन करने को कहा गया है।
फिलहाल, ₹15.95 करोड़ के बीमा क्लेम से जुड़े मामले में अगला घटनाक्रम 24 अक्टूबर की सुनवाई के बाद सामने आएगा।