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जोधपुर के 12 वार्डों की सीमाएं बदलने की PIL खत्म, राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की, कानूनी सवाल खुला रखा

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जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जोधपुर नगर निगम के 12 वार्डों की सीमाएं बदलने को लेकर दायर याचिका पर अब सुनवाई खत्म कर दी है।

जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस संदीप शाह की बेंच ने कहा कि समय बीत जाने के कारण अब इस याचिका में फैसला देने के लिए कुछ बाकी नहीं रह गया है। इसलिए याचिका को निष्प्रभावी मानते हुए उसे खारिज कर दिया गया।

हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने वार्डों की सीमाएं बदलने की प्रक्रिया को लेकर जो कानूनी सवाल उठाए थे, हाईकोर्ट ने उन पर कोई फैसला नहीं दिया है। कोर्ट ने कहा कि इन सवालों को किसी दूसरे उचित मामले में तय किया जा सकता है।

यह याचिका कांग्रेस के जोधपुर जिला अध्यक्ष ओंकार वर्मा और कांग्रेस के संगठन महामंत्री कुश गहलोत ने दायर की थी।

इसमें राजस्थान सरकार के स्वायत्त शासन विभाग, स्थानीय निकाय विभाग, राज्य निर्वाचन आयोग, जिला निर्वाचन अधिकारी एवं जिला कलेक्टर जोधपुर और नगर निगम जोधपुर को पक्षकार बनाया गया था।

सितंबर 2025 के परिसीमन में बदलाव को दी गई थी चुनौती

याचिका में 7 अगस्त 2026 को जारी उस अधिसूचना को चुनौती दी गई थी, जिसके जरिए जोधपुर नगर निगम के 12 वार्डों की सीमाओं में बदलाव किया गया था।

याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया था कि सितंबर 2025 में तय प्रक्रिया पूरी कर वार्डों का परिसीमन किया गया था। इस दौरान लोगों से आपत्तियां और सुझाव भी मांगे गए थे। इसके बाद परिसीमन को अंतिम रूप देकर राजपत्र में प्रकाशित कर दिया गया था।

करीब 11 महीने बाद दोबारा बदली गईं सीमाएं

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सितंबर 2025 में परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने और उसे अंतिम रूप दिए जाने के करीब 11 महीने बाद 12 वार्डों की सीमाओं में फिर बदलाव कर दिया गया।

उनका तर्क था कि अगर बदलाव के कारण मोहल्ले, गलियां, इलाके या मतदाता एक वार्ड से दूसरे वार्ड में चले जाते हैं, तो इसे सिर्फ छोटी-मोटी गलती सुधारना नहीं माना जा सकता।

ऐसे बदलाव के लिए प्रभावित लोगों को दोबारा जानकारी देकर उनकी आपत्तियां और सुझाव लेना जरूरी था। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि अगस्त 2026 में बदलाव करने से पहले यह प्रक्रिया नहीं अपनाई गई।

सवाल था- पुराने परिसीमन में गलती क्या थी?

याचिकाकर्ताओं ने यह भी सवाल उठाया था कि अगस्त 2026 की नई अधिसूचना में यह साफ नहीं किया गया कि सितंबर 2025 में किए गए अंतिम परिसीमन में आखिर गलती क्या थी।

यह भी पूछा गया था कि उस गलती का पता किस रिपोर्ट या सर्वे के आधार पर चला और पुराने परिसीमन को दोबारा बदलने का अधिकार किस नियम के तहत इस्तेमाल किया गया।

याचिकाकर्ताओं ने वार्डों की आरक्षण लॉटरी के बाद परिसीमन में बदलाव किए जाने पर भी सवाल उठाए थे।

पहले हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा था जवाब

इस मामले की शुरुआती सुनवाई में हाईकोर्ट ने राजस्थान सरकार और संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। याचिका में राज्य निर्वाचन आयोग, जिला निर्वाचन अधिकारी और कलेक्टर जोधपुर समेत नगर निगम को भी पक्षकार बनाया गया था।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मनीष व्यास ने पैरवी की, जबकि सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता आई.आर. चौधरी ने पक्ष रखा। उनके साथ अधिवक्ता पवन भारती भी मौजूद रहे।

अब हाईकोर्ट ने याचिका क्यों खत्म हुई?

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने खुद कोर्ट को बताया कि समय बीत जाने के कारण अब इस याचिका में कुछ बाकी नहीं रह गया है। यानी याचिका निष्प्रभावी हो चुकी है।

हालांकि, उन्होंने याचिका में उठाए गए कानूनी सवाल को भविष्य के किसी उचित मामले में तय करने के लिए खुला रखने की मांग की।

हाईकोर्ट ने मांग स्वीकार करते हुए कहा कि मौजूदा याचिका अब निष्प्रभावी हो चुकी है, इसलिए इसे खारिज किया जाता है। साथ ही, इसमें उठाए गए कानूनी सवालों पर किसी उचित मामले में बाद में फैसला किया जा सकता है।

यानी हाईकोर्ट ने यह फैसला नहीं दिया कि 12 वार्डों की सीमाओं में किया गया बदलाव सही था या गलत। कोर्ट ने सिर्फ यह माना कि समय बीत जाने के कारण अब इस याचिका पर कोई प्रभावी आदेश देने की जरूरत नहीं रह गई थी।

इस तरह याचिका तो खत्म हो गई, लेकिन परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर उठाए गए कानूनी सवालों पर हाईकोर्ट ने आगे का रास्ता खुला रखा है।

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