चित्तौड़गढ़ सर्किल में दिया था कंपनी को 205.36 करोड़ का ठेका, 27 माह थी अवधि
जयपुर, 2 नवंबर
Rajasthan Highcourt ने एक महत्वपूर्ण फैसले में एक ठेके में हुई देरी और मनमाने कार्य से ब्लैकलिस्टेड की गई मुंबई की DHANLAXMI ELECTRICALS PRIVATE LIMITED कंपनी की दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए उस पर 10 लाख का जुर्माना लगाया है।
अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड ने आरडीएसएस (Revamped Reforms-based and Results-linked Distribution Sector Scheme) से जुड़े प्रोजेक्ट में समय पर कार्य पूर्ण न करने और मनमाना कार्य करने के चलते कंपनी को दिया गया ठेका समाप्त कर दिया था।
इसके साथ ही निगम ने कंपनी को तीन साल के लिए भी ब्लैकलिस्ट किया था, जिसे कंपनी ने याचिका दायर कर राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में कहा कि अजमेर निगम द्वारा ठेका समाप्ति (termination) और ब्लैकलिस्टिंग (blacklisting) की कार्रवाई में न तो कोई मनमानी (arbitrariness) थी और न ही दुर्भावना (mala fide)।
कंपनी पर गंभीर टिप्पणी
Rajasthan Highcourt ने अपने फैसले में याचिकाकर्ता कंपनी पर भी सख्त टिप्पणी की है।
Rajasthan Highcourt ने कहा कि याचिकाकर्ता कंपनी ने उसके विद्युत लाइसेंस रद्द होने जैसे महत्वपूर्ण तथ्य अदालत से छुपाए और कोर्ट से अंतरिम राहत (interim protection) लेकर प्रोजेक्ट में ज्यादा देरी की।
Rajasthan Highcourt ने कंपनी के इस आचरण को “अशुभनीय (lack of bona fides)” और अदालती प्रक्रिया के दुरुपयोग के रूप में वर्णित किया।
न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं
एकलपीठ ने कहा कि यह पूरा मामला संविदात्मक प्रकृति (contractual in nature) का है, जिसमें कई विवादित तथ्यात्मक प्रश्न (disputed questions of fact) शामिल हैं — जैसे सर्वेक्षण कार्य की पूर्णता, साइट एक्सेस, देरी की जिम्मेदारी आदि।
Rajasthan Highcourt ने कहा कि ऐसे तथ्य केवल नागरिक या वाणिज्यिक कोर्ट (Civil/Commercial Court) द्वारा ही साक्ष्य के आधार पर तय किए जा सकते हैं।
इसलिए, संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में दाखिल की गई याचिका इस विवाद में न्यायिक समीक्षा के सीमित दायरे में नहीं आती।
जनहित में जरूरी
Rajasthan Highcourt ने अपने फैसले में माना कि कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने का एवीवीएनएल और राज्य सरकार की ओर से लिया गया फैसला कानूनी रूप से और अनुबंध की शर्तों के अनुरूप सही था।
जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने कहा कि कंपनी का लंबे समय तक कार्य पूर्ण करने में असंतोषजनक था, और ठेका समाप्त करना जनहित (public interest) में आवश्यक था ताकि सार्वजनिक उपयोग में आने वाला प्रोजेक्ट समय पर पूरा किया जा सके।
60 दिन में जमा कराए जुर्माना
Rajasthan Highcourt ने कंपनी की याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही निरर्थक बताते हुए खारिज किया।
Rajasthan Highcourt ने याचिकाकर्ता कंपनी मुंबई की DHANLAXMI ELECTRICALS PRIVATE LIMITED को आदेश दिया कि वह 10 लाख रुपए की कोस्ट अगले 60 दिन में जमा कराए।
कंपनी को जुर्माने की राशि 60 दिनों के भीतर अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (AVVNL) को अदा करनी होगी।
यदि भुगतान नहीं किया गया, तो यह राशि भूमि राजस्व बकाया के रूप में वसूली जाएगी या कंपनी की सिक्युरिटी राशि से समायोजित की जाएगी।
बैंक गारंटी से जुड़ी याचना भी खारिज
Rajasthan Highcourt ने इस मामले में कंपनी द्वारा दायर बैंक गारंटी की जब्ती (Bank Guarantee Invocation) रोकने की मांग को भी अदालत ने खारिज किया।
Rajasthan Highcourt ने इसके साथ ही सभी अन्य एप्लीकेशन भी खारिज कर दी हैं।
जस्टिस समीर जैन ने अपने आदेश में टिप्पणी की कि इस तरह की “भ्रम फैलाने वाली और अनुचित याचिकाएँ” न केवल अदालतों का कीमती समय नष्ट करती हैं, बल्कि सार्वजनिक हित के कार्यों में देरी और राजकोषीय नुकसान भी करती हैं।
कंपनी की दलील
याचिकाकर्ता कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कमलाकर शर्मा और यश शर्मा ने पैरवी करते हुए कई कानूनी बिंदु उठाए।
कंपनी ने अदालत में दलील दी कि कंपनी ने 19 मई 2025 को ही संशोधित कार्य योजना पेश की थी, जिसे एवीवीएनएल ने स्वीकार भी किया था।
ऐसे में जून 2026 तक अनुबंध की वैधता रहते हुए जून 2025 में ही ठेका समाप्त कर देना पूर्व-समाप्ति (premature termination) और अनुचित प्रशासनिक कार्रवाई है।
कंपनी ने यह भी कहा कि अजमेर डिस्कॉम ने 19 मई 2025 के पत्र में कार्य में आने वाली बाधाओं को स्वीकार करते हुए जुलाई 2025 तक की समय सीमा बढ़ाई थी, इसलिए अब ठेका समाप्त करना और बैंक गारंटी जब्त करना विश्वासघात और अनुचित कदम है।
कंपनी का कहना है कि यह निर्णय Clause 42 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है, क्योंकि ब्लैकलिस्टिंग से पहले 14 दिन की पूर्व सूचना देना अनिवार्य था, जो इस मामले में नहीं दी गई।
सरकार का जवाब
अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (एवीवीएनएल) और राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) विज्ञान शाह और एडवोकेट अनुराधा उपाध्याय ने पैरवी करते हुए कंपनी की दलीलों को आधारहीन बताया।
AAG विज्ञान शाह ने अदालत से कहा कि इस याचिका की सुनवाई संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार में नहीं हो सकती, क्योंकि इसमें किसी भी अधिकारी के विरुद्ध दुर्भावना (mala fide) या पक्षपात (bias) का कोई ठोस आरोप नहीं लगाया गया है।
AAG विज्ञान शाह ने कहा कि ठेका विवाद एक contractual और वाणिज्यिक प्रकृति का है, और ऐसे मामलों में रिट याचिका का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
AAG ने कहा कि अगर कंपनी किसी निर्णय से असंतुष्ट है, तो उसे सिविल या वाणिज्यिक कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए, न कि रिट याचिका दाखिल करनी चाहिए।
कंपनी पर तथ्य छिपाने का आरोप
राज्य सरकार ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता कंपनी ने अदालत से सभी तथ्य छिपाए, जिससे अदालत को गुमराह किया गया।
AAG ने कहा कि ब्लैकलिस्टिंग के लिए नोटिस जारी किया गया था, जिसमें सभी दस्तावेज और कारण स्पष्ट रूप से दिए गए थे, लेकिन कंपनी ने इन्हें अपनी याचिका में शामिल नहीं किया।
उन्होंने बताया कि बीते 26 महीनों में कई बार नोटिस, रिमाइंडर और चेतावनियाँ जारी की गईं, परंतु कंपनी की प्रगति केवल 7.29% तक ही सीमित रही।
ठेका समाप्ति अंतिम विकल्प
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि ठेका समाप्ति (termination) कोई पहली कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह अंतिम उपाय था।
इससे पूर्व कंपनी को कई अवसर दिए गए, फिर भी कार्य में सुधार नहीं हुआ।
पहले नोटिस के समय केवल 1.84% काम पूरा हुआ था और अंतिम समय तक यह केवल 7.29% तक पहुँचा, जबकि समय अनुबंध की आत्मा (essence) था।
ब्लैकलिस्टिंग पर कानून
राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि अनुबंध में ब्लैकलिस्टिंग की अनुमति देने वाली स्पष्ट धारा मौजूद थी, और यह अधिकार राजस्थान पारदर्शिता अधिनियम, 2012 (RTPP Act) की धारा 46(4) से भी प्राप्त होता है।
AAG ने कहा कि याचिकाकर्ता का यह तर्क कि उसे “नागरिक मृत्यु (civil death)” दी गई है, गलत जानकारी देने वाला और अतिरंजित है, क्योंकि ब्लैकलिस्टिंग केवल तीन वर्ष की अवधि के लिए की गई है।
AAG ने हाईकोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों की भी नजीर पेश की, जिनमें इस तरह के विवादों में कोर्ट का रिट क्षेत्राधिकार अत्यंत सीमित बताया गया है।
कोर्ट में पेश किए गए फैसलों की नजीर:
- एवीवीएनएल की ओर से पैटेल इंजीनियरिंग लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2012)
- मेडिपोल फार्मास्युटिकल्स बनाम पीजीआईएमईआर (2021)
- टाटा सेल्युलर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1994)
- सिल्पी कंस्ट्रक्शन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2020)
राज्य सरकार ने अदालत में स्पष्ट किया कि कंपनी का इलेक्ट्रिकल लाइसेंस 8 जनवरी 2024 को निलंबित हो गया था, जो चार महीने बाद ही बहाल हुआ। इस अवधि में कंपनी कार्य नहीं कर पाई, इसलिए इस प्रोजेक्ट में देरी हुई।
सरकार ने यह भी कहा कि कंपनी ने अपने पत्राचार में स्वयं स्वीकार किया कि स्वास्थ्य समस्याएँ, पारिवारिक कारण और आर्थिक कठिनाइयाँ कार्य प्रगति में बाधक बनीं।
इससे यह साबित होता है कि देरी की जिम्मेदारी कंपनी की ही रही, न कि विभाग की।
205.36 करोड़ का ठेका
अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड ने 21 नवंबर 2022 को आरडीएसएस (Revamped Reforms-based and Results-linked Distribution Sector Scheme) के 12 सर्किल जुड़े प्रोजेक्ट के लिए निविदा आमंत्रित की थी।
चित्तौड़गढ़ सर्किल के लिए जारी टेंडर जिसकी अनुमानित लागत करीब ₹20,536.60 करोड़ रखी गई थी। इस टेंडर में प्रोजेक्ट की कुल समय सीमा 27 महीने रखी गई, जिसमें सर्वे और अनुमोदन शामिल था।
सर्वे कार्य 3 महीने में पूरा करना था, जबकि आपूर्ति, स्थापना, परीक्षण और कमीशनिंग 24 महीने में पूरी करनी थी।
याचिकाकर्ता कंपनी सफल बोलीदाता के रूप में चुने जाने पर 22 मार्च 2023 को लेटर ऑफ इंटेंट (LoI) और 4 अप्रैल 2023 को लेटर ऑफ अवॉर्ड जारी किया गया।
27 जून 2023 को आपूर्ति और स्थापना (erection) के लिए औपचारिक अनुबंध भी संपन्न हुआ, जिसमें ठेके की शर्तों के अनुसार 60 लाख की बैंक गारंटी जमा करायी गई।
सरकार ने किया रद्द
मामले में विवाद शुरू हुआ 19 जून 2025 को जारी एक आदेश से जिसमें अजमेर डिस्कॉम ने कंपनी को दिए गए ठेके को रद्द करते हुए कंपनी को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया।
डिस्कॉम ने अनुबंध समाप्त करने का आधार अपूर्ण प्रदर्शन, कार्य में देरी और निर्धारित प्रगति न पूरी करने के आरोप लगाया।
यह दावा किया गया कि कई बार नोटिस और अवसर देने के बावजूद, याचिकाकर्ता ने केवल 7.29% ही कार्य पूरा किया था, जबकि अनुबंध के तहत 100% कार्य पूरा करना अनिवार्य था।