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पीड़ित पक्ष की आपत्ति से नहीं रोकी जा सकती कैदी की पैरोल -राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Rajasthan HC Grants Parole to Murder Convict, Says Law & Order Responsibility Lies with State, Not Basis to Reject Parole
हत्या के दोषी कैदी को 20 दिन की पैरोल, हाईकोर्ट ने कहा-कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य और पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी, केवल आशंका के आधार पर अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने एक अहम और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल पीड़ित पक्ष की असहमति या आपत्ति के आधार पर किसी दोषी कैदी को पैरोल से वंचित नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य और पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी है, न कि इस आधार पर कैदी के वैधानिक अधिकारों को सीमित किया जाए।

यह महत्वपूर्ण फैसला जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने चित्तौड़गढ़ जिले के निवासी भैरूलाल उर्फ प्रकाश उर्फ पक्का द्वारा दायर आपराधिक रिट याचिका पर सुनाया।

मामला हत्या के एक प्रकरण में दोषी ठहराए गए कैदी भैरूलाल की पहली पैरोल से जुड़ा था, जिसे जिला पैरोल कमेटी ने पीड़ित परिवार की असहमति और संभावित शांति भंग की आशंका के आधार पर अस्वीकार कर दिया था।

पात्रता पूरी होने पर निष्पक्ष निर्णय जरूरी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यदि कोई कैदी पैरोल के लिए निर्धारित कानूनी पात्रता पूरी करता है, तो प्रशासन का कर्तव्य है कि उसके आवेदन पर निष्पक्ष और कारणयुक्त निर्णय लिया जाए।

कोर्ट ने कहा कि केवल आशंका या पीड़ित पक्ष की आपत्ति को पैरोल अस्वीकार करने का अंतिम आधार नहीं बनाया जा सकता।

दिव्या बापना -एमिकस क्यूरी

याचिकाकर्ता जेल में बंद होने के कारण स्वयं प्रभावी पैरवी नहीं कर पा रहा था, इसलिए अदालत ने अधिवक्ता दिव्या बापना को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया।

उन्होंने अदालत के समक्ष दलील दी कि याचिकाकर्ता पर्याप्त अवधि तक कारावास भोग चुका है और नियमों के अनुसार पहली पैरोल का पात्र है।

राज्य सरकार का विरोध

राज्य सरकार की ओर से सरकारी अधिवक्ता एन.एस. चंपावत ने पैरोल याचिका का विरोध करते हुए कहा कि पुलिस रिपोर्ट में पीड़ित परिवार की असहमति दर्ज है और कैदी की रिहाई से शांति भंग होने की आशंका व्यक्त की गई है।

सरकार ने यह भी कहा कि यदि पैरोल दी जाए तो कैदी को अपने मूल निवास स्थान के बजाय किसी अन्य स्थान पर रहने की शर्त लगाई जा सकती है।

याचिकाकर्ता की दलीलें

एमिकस क्यूरी दिव्या बापना ने याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए कहा कि पैरोल दया या अनुग्रह नहीं बल्कि आपराधिक न्याय प्रणाली का सुधारात्मक और पुनर्वासात्मक हिस्सा है।

अधिवक्ता ने कहा कि जेल प्रशासन की रिपोर्ट में याचिकाकर्ता के आचरण को “संतोषजनक नहीं” बताया गया था, लेकिन उसमें किसी अनुशासनहीनता या नियम उल्लंघन का उल्लेख नहीं था, इसलिए इस आधार पर पैरोल से इनकार करना उचित नहीं है।

दलील दी गई कि पैरोल का उद्देश्य कैदी को परिवार और समाज से जोड़ना है, इसलिए उसे घर से दूर रहने की शर्त लगाना पैरोल के मूल उद्देश्य के विपरीत होगा।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

दोनो पक्षों की दलीले सुनने के बाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि पीड़ित परिवार की असहमति अपने-आप में पैरोल रोकने का कानूनी आधार नहीं हो सकती।

हाईकोर्ट ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है और यदि किसी प्रकार की आशंका है तो प्रशासन निगरानी या उचित शर्तें लगा सकता है, लेकिन वैधानिक अधिकार को केवल आशंका के आधार पर नहीं रोका जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पैरोल का उद्देश्य कैदी को परिवार और सामाजिक वातावरण से जोड़कर उसके सुधार और पुनर्वास को बढ़ावा देना है। इसलिए बिना ठोस कारण कैदी को अपने घर से दूर रहने की शर्त लगाना अव्यावहारिक और पैरोल के उद्देश्य के विपरीत होगा।

अदालत का सशर्त अंतिम आदेश

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए दोषी कैदी को 20 दिन की पहली पैरोल देने का आदेश दिया।

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि कैदी ₹50,000 के निजी मुचलके तथा ₹25,000-₹25,000 के दो जमानतदार प्रस्तुत करने के बाद नियमानुसार रिहा किया जाए।\

साथ ही जेल अधीक्षक को आवश्यकतानुसार कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उचित शर्तें लगाने की स्वतंत्रता भी दी गई है।

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