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Rajasthan High court : अतिरिक्त महाधिवक्ता और सरकारी वकील ‘पब्लिक ऑफिस’ की श्रेणी में नहीं, इन पदों पर नियुक्ति सरकार की पसंद और विश्वास का विषय

RJS 2024 Answer Key Row: Rajasthan High Court Dismisses All Petitions

पदमेश मिश्रा की सुप्रीम कोर्ट में अतिरिक्त महाधिवक्ता के पद पर नियुक्ति वैध, खंडपीठ ने एकलपीठ के आदेश पर लगाई मुहर

जयपुर, 2 दिसंबर

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्यों में अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) और सरकारी अधिवक्ताओं (Government Counsels) के पद ‘पब्लिक ऑफिस’ की श्रेणी में नहीं आते, और न ही इन्हें संविधान के अनुच्छेद 165 के तहत परिभाषित महाधिवक्ता (Advocate General) के समकक्ष माना जा सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि इन पदों पर नियुक्ति सरकार की पसंद और विश्वास का विषय है, लेकिन यह स्वतंत्रता मनमानी की अनुमति नहीं देती।

हाईकोर्ट ने कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया में कानूनी नीति और अनिवार्य प्रावधानों का पालन न होने पर न्यायिक समीक्षा संभव है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था राजस्थान हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुनील समदड़िया की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए दी है।

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के लिए पदमेश मिश्रा को अतिरिक्त महाधिवक्ता नियुक्त करने के एकलपीठ के फैसले पर मुहर लगाते हुए कानूनी तौर पर वैध माना है।

हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से AAG पद पर की गई नियुक्ति विधिसम्मत है और लॉ ऑफिसर की नियुक्ति करना राज्य सरकार का प्रशासनिक व वैधानिक अधिकार है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जनता के प्रति प्रत्यक्ष जवाबदेही वाले ‘पब्लिक ऑफिस’ की धारणा सरकारी वकीलों पर लागू नहीं होती।

कोर्ट ने कहा कि महाधिवक्ता को छोड़कर अन्य सभी विधिक अधिकारियों की भूमिका ‘कानूनी प्रतिनिधित्व’ और ‘सरकार की सहायता’ तक सीमित है।

अपीलकर्ता की दलीलें

हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुनील समदड़िया ने अपील दायर कर सुप्रीम कोर्ट में अतिरिक्त महाधिवक्ता के पद एडवोकेट पदमेश मिश्रा की नियुक्ति को चुनौती दी थी

अपील में कहा गया कि राज्य सरकार की वाद नीति, 2018 के अनुसार, 10 साल का वकालत अनुभव रखने वाले अधिवक्ता को ही अतिरिक्त महाधिवक्ता नियुक्त कर सकते हैं, लेकिन राज्य सरकार ने इसमें संशोधन कर विशेषज्ञता के आधार पर किसी भी अधिवक्ता को एएजी बनाने का प्रावधान किया है.

अधिवक्ता ने अपील में कहा कि इसके तहत ही राज्य सरकार ने वकील के तौर पर 2019 में पंजीकृत पदमेश मिश्रा को 23 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट में सरकार का पैनल एडवोकेट नियुक्त किया और इसके तीन दिन बाद ही उसे सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार का अतिरिक्त महाधिवक्ता बना दिया दिया.

अपील में अनुरोध किया गया था कि पदमेश मिश्रा को एएजी के तौर पर कार्य करने से रोका जाए.

अपील में मुख्य रूप से कई कानूनी बिंदूओ को उठाया गया उनमें से प्रमुख बिंदूओं में

10 वर्ष की न्यूनतम अनुभव शर्त का उल्लंघन

अपीलकर्ता ने दलील दी कि पद्मेश मिश्रा के पास 10 वर्ष का न्यूनतम अधिवक्ता अनुभव नहीं है, जो कि राज्य लिटिगेशन पॉलिसी 2018 के अनुसार आवश्यक है. इस स्पष्ट तथ्य की अनदेखी कर सरकार ने मनमाने ढंग से नियुक्ति की, जो कि नियमों का खुला उल्लंघन है।

लिटिगेशन पॉलिसी बाध्यकारी

अपीलकर्ता ने कहा कि राजस्थान राज्य लिटिगेशन पॉलिसी 2018 सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के आधार पर बनी थी, इसलिए यह महज़ सलाह या गाइडलाइन नहीं, बल्कि कानूनी रूप से बाध्यकारी नीति है.
अपील में तर्क दिया कि जब नीति को राजपत्र (गजट) में भी प्रकाशित किया गया है, तो यह कानूनी बल प्राप्त कर चुकी है और इसका उल्लंघन संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है।

संशोधन रंगदारी भरा कदम

अपीलकर्ता ने कहा कि सरकार ने नीति में धारा 14.8 जोड़कर अपने “मनपसंद व्यक्ति” की नियुक्ति का रास्ता साफ किया. अपील में कहा गया कि यह संशोधन विशेष व्यक्ति को लाभ देने के उद्देश्य से तुरंत पहले किया गया, जो कि “रंगदारी, मनमानी और शक्तियों के दुरुपयोग” को दर्शाता है।

AAG पद ‘पब्लिक ऑफिस’माना जाए

अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी वकील जनता के धन से वेतन पाते हैं, अदालतों में राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं, निर्णय सीधे “जनहित और न्याय प्रणाली” को प्रभावित करते हैं, इसलिए यह एक सार्वजनिक पद (Public Office) है, जिस पर कानूनी पात्रता का कड़ाई से पालन आवश्यक है।

नियुक्ति बिना AG की सलाह के

अपील में कहा गया कि AAG की नियुक्ति के लिए Advocate General की सलाह अनिवार्य होती है, लेकिन राज्य सरकार ने इस प्रक्रिया को जानबूझकर दरकिनार किया.

याचिका पूरी तरह उचित

अपीलकर्ता का कहना था कि जब नियुक्त व्यक्ति की योग्यता ही संदिग्ध हो, तो क्वो-वॉरंटो याचिका बिल्कुल वैध और आवश्यक है ताकि यह पूछा जा सके “वह किस अधिकार (Quo Warranto) से पद पर बैठे हैं?”

सिंगल बेंच के फैसला

अपीलकर्ता ने कहा कि सिंगल बेंच ने न तो नीति को सही तरह पढ़ा, न धारा 14.8 की पृष्ठभूमि जानी,
न ही पात्रता की कमी पर विस्तार से विचार किया। इसलिए आदेश कानूनन टिकाऊ नहीं है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।

राज्य सरकार का तर्क

राजस्थान सरकार ने पदमेश मिश्रा की नियुक्ति का बचाव करते हुए कई कानूनी दलीलें दी. मुख्यतौर पर सरकार ने इसे राज्य की पॉलिसी का हिस्सा बताया.

राजस्थान सरकार ने कोर्ट में कहा कि कानून में राज्य सरकार को विधिक व प्रशासनिक शक्तियां दी गई हैं। राज्य सरकार को कानूनी तौर पर यह अधिकार है कि वह अपने लॉ ऑफिसर्स को कहीं पर भी नियुक्त कर सकती है।

राज्य सरकार ने कहा कि अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) और सरकारी अधिवक्ताओं की नियुक्ति पूरी तरह से सरकार के प्रशासनिक अधिकार, policy discretion और professional suitability पर आधारित होती है.

सरकार ने दलील दी कि यह पद किसी प्रकार का ‘पब्लिक ऑफिस’ नहीं है, इसलिए इन पर नियुक्ति हेतु कोई भी व्यक्ति कानूनी अधिकार या दावा नहीं कर सकता।

राज्य का अधिकार: कौन करेगा पैरवी, यह सरकार का विशेषाधिकार

सरकार ने कहा कि राज्य को यह पूर्ण अधिकार है कि वह अदालतों में अपने मामलों की पैरवी हेतु किस अधिवक्ता को नियुक्त करना चाहती है। यह अधिकार प्रशासनिक, वैधानिक, और
नीतिगत (policy-based) तीनों आधारों पर सरकार के पास सुरक्षित है।

‘पब्लिक ऑफिस’ नहीं, बल्कि ‘प्रोफेशनल एंगेजमेंट’

सरकार ने कहा कि अतिरिक्त महाधिवक्ता और सरकारी अधिवक्ता किसी प्रकार का ऐसा सार्वजनिक पद नहीं है, जो प्रत्यक्ष रूप से जनता के प्रति जवाबदेह हो। सरकार ने कहा कि ये नियुक्तियाँ professional engagement, contractual nature पर आधारित होती हैं, न कि संवैधानिक अधिकार या वैधानिक नियुक्ति पर.

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया:

“महाधिवक्ता एक संवैधानिक पद है, लेकिन AAG तथा अन्य सरकारी अधिवक्ता केवल कानून विशेषज्ञ होते हैं, जिन्हें सरकार सहायता के लिए नियुक्त करती है।”

नियुक्ति प्रक्रिया Litigation Policy के अनुरूप

राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि पदमेश मिश्रा की नियुक्ति राज्य मुकदमेबाज़ी नीति (State Litigation Policy), पद की आवश्यकताओं, और उम्मीदवार की योग्यता को ध्यान में रखते हुए की गई।

याचिका पर सवाल

सरकार ने याचिका पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा दायर की गई quo warranto याचिका का आधार ही गलत था, क्योंकि यह एक अप्रयोज्य (unenforceable) नीति पर आधारित थी जिसे कानून का दर्जा प्राप्त नहीं है.

सरकार ने कहा कि राज्य मुकदमेबाज़ी नीति statutory force नहीं रखती और इसे अदालत में किसी संवैधानिक पद की तरह चुनौती नहीं दी जा सकती।

सरकार ने कहा कि “जब नियुक्ति संवैधानिक पद की श्रेणी में आती ही नहीं और नीति भी वैधानिक रूप से बाध्यकारी नहीं है, तब किसी अधिवक्ता की नियुक्ति को चुनौती नहीं दी जा सकती।”

पेशेवर योग्यता से समझौता नहीं

सरकार ने पदमेश मिश्रा की नियुक्ति का बचाव करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट में राज्य का प्रतिनिधित्व अत्यंत महत्वपूर्ण होता है और इसीलिए उसके लिए ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जिसकी कानूनी विशेषज्ञता, अनुभव और सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस का रिकॉर्ड हो.

सरकार की सभी दलीले मंजूर

राजस्थान हाईकोर्ट पदमेश मिश्रा की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सरकार द्वारा ​दी गयी सभी दलीलों को स्वीकार किया हैंं.

खंडपीठ ने सरकार के सभी प्रमुख तर्कों से सहमति जताते हुए यह माना कि नियुक्ति पूरी तरह वैध,
नियमों के अनुरूप, और नीतिगत अधिकार के दायरे में है.

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