झालावाड़ के तत्कालिन अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) बिमलसिंह को हाईकोर्ट से मिली बड़ी राहत, दूसरे अधिकारी को बिना याचिका के दी राहत
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने अदालतों द्वारा सरकारी अधिकारियों के खिलाफ की जाने वाली टिप्पणियों को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए न्यायिक व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर एक बड़ा सिद्धांत स्पष्ट किया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि किसी भी सरकारी अधिकारी या व्यक्ति के खिलाफ बिना सुनवाई के की गई कठोर, अपमानजनक या भविष्य को प्रभावित करने वाली टिप्पणियाँ न केवल अवैध हैं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 और प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन हैं।
जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने यह आदेश पुलिस अधिकारी विमलसिंह की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए हैं। विमलसिंह ने विशेष न्यायाधीश (एनडीपीएस प्रकरण), झालावाड़ के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके खिलाफ सख्त टिप्पणियाँ की गई थीं।
विमलसिंह घटना के समय झालावाड़ में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) के पद पर पदस्थ थे, जो वर्तमान में भीलवाड़ा में एएसपी के पद पर कार्यरत हैं।
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही विशेष न्यायाधीश (एनडीपीएस प्रकरण), झालावाड़ के उस आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारी के खिलाफ गंभीर टिप्पणियाँ करते हुए अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई के आदेश दिए गए थे।
बरी करते हुए दिया था फैसला
यह मामला वर्ष 2018 का है, जब थाना सरोला कलां, जिला झालावाड़ में NDPS अधिनियम के तहत तेजराज उर्फ तेजू सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ मादक पदार्थ तस्करी का प्रकरण दर्ज किया गया।
पुलिस ने बरामदगी, तलाशी और जांच प्रक्रिया का दावा करते हुए आरोपियों के विरुद्ध चालान पेश किया, जिसके बाद मामला विशेष न्यायाधीश, NDPS प्रकरण, झालावाड़ के समक्ष ट्रायल में चला।
ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका।
बचाव पक्ष ने तलाशी, जब्ती, सैंपल सीलिंग और कानूनी प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ उजागर कीं। 29 अप्रैल 2023 को ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया।
फैसले में अदालत ने जांच अधिकारियों की भूमिका को लापरवाह बताते हुए तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के विरुद्ध कठोर टिप्पणियाँ कीं।
इसके साथ ही अदालत ने पुलिस महानिदेशक, राजस्थान को याचिकाकर्ता अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक एवं कानूनी कार्रवाई शुरू करने के आदेश दिए थे।
याचिकाकर्ता की दलीलें
राजस्थान हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता विमलसिंह ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए अदालत में दलीलें दीं कि अदालत ने फैसले से पूर्व उन्हें न तो कोई नोटिस दिया और न ही सुनवाई का अवसर।
याचिकाकर्ता ने कहा कि बिना पक्ष सुने ऐसी टिप्पणियाँ करना न्यायिक मर्यादा के विरुद्ध है। इस प्रकार की टिप्पणियाँ अधिकारी के सेवा रिकॉर्ड, प्रतिष्ठा और भविष्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती हैं।
इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट के आदेश के उस हिस्से को रद्द करने की मांग की, जिसमें उनके खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे।
हाईकोर्ट का रुख: “यह न्याय नहीं, अन्याय है”
मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने बेहद स्पष्ट और कठोर शब्दों में कहा कि—
“किसी भी व्यक्ति के खिलाफ ऐसी टिप्पणियाँ, जिनके गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं, बिना सुनवाई के नहीं की जा सकतीं। ऐसा करना प्राकृतिक न्याय का घोर उल्लंघन है।”
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले Manish Dixit बनाम State of Rajasthan (2001) का हवाला देते हुए कहा कि यदि अदालतें बिना सुने कठोर टिप्पणियाँ करें, तो यह कानून की बुनियादी आत्मा के खिलाफ है।
दूसरे अधिकारी को बिना मांगे दी राहत-समानता का सिद्धांत लागू
हाईकोर्ट ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए दूसरे जांच अधिकारी डॉ. भास्कर बिश्नोई को भी बिना याचिका के राहत दी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में केवल याचिकाकर्ता ही नहीं, बल्कि डॉ. भास्कर बिश्नोई नामक एक अन्य अधिकारी के खिलाफ भी समान टिप्पणियाँ की गई थीं।
हालांकि डॉ. बिश्नोई ने हाईकोर्ट में कोई याचिका दायर नहीं की थी, लेकिन फिर भी अदालत ने कहा—
“जब एक ही आदेश में समान स्थिति वाले व्यक्तियों के खिलाफ समान कानूनी त्रुटि है, तो राहत केवल याचिकाकर्ता तक सीमित नहीं रह सकती।”
हाईकोर्ट ने समानता (Parity) और अनुच्छेद 21 के अधिकारों का हवाला देते हुए कहा कि समान परिस्थितियों में खड़े व्यक्ति को राहत न देना स्पष्ट अन्याय होगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले
हाईकोर्ट ने अपने फैसले को मजबूती देते हुए सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले Javed Shaukat Ali Qureshi बनाम State of Gujarat (2023) का भी उल्लेख किया। इस फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि—
समान अपराध और समान भूमिका के बावजूद अलग-अलग व्यवहार न्यायसंगत नहीं हो सकता। समान परिस्थितियों में समान राहत देना संवैधानिक अदालतों का कर्तव्य है।
इसी सिद्धांत को अपनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियाँ कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं हैं।
हाईकोर्ट का स्पष्ट आदेश
सभी तथ्यों, दलीलों और कानून के सिद्धांतों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि 29 अप्रैल 2023 के ट्रायल कोर्ट के आदेश का वह हिस्सा पूरी तरह निरस्त किया जाता है, जिसमें याचिकाकर्ता और अन्य अधिकारी के खिलाफ कठोर टिप्पणियाँ की गई थीं।
उन टिप्पणियों के आधार पर अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई के आदेश भी रद्द करने का फैसला दिया गया।
लेकिन हाईकोर्ट ने अनुशासनात्मक प्राधिकरण को स्वतंत्र रूप से मामले की जांच करने की छूट देते हुए कहा कि वह ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित नहीं होगा।
साथ ही यह भी कहा कि यदि कोई कार्रवाई की जाती है, तो उसमें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पूर्ण पालन अनिवार्य होगा।