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अजमेर के चर्चित संभवनाथ जैन मंदिर के पुजारी की हत्या का आरोपी बरी, हाईकोर्ट ने कहा अभियोजन साक्ष्यों की श्रृंखला स्थापित नहीं कर पाया

Rajasthan High Court Acquits Accused in Ajmer Jain Temple Priest Murder Case, Cites Failure to Prove Chain of Evidence
जिस सीसीटीवी फूटेज को महत्वपूर्ण सबूत के तौर पर पेश किया गया, पुलिस ने उसकी एफएसएल जाच तक नहीं कराई

जयपुर, 24 फरवरी। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने अजमेर के बहुचर्चित संभवनाथ जैन मंदिर के पुजारी की हत्या करने के आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अजमेर ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए यह फैसला सुनाया है।

जस्टिस महेन्द्र कुमार गोयल और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूर्ण और अविच्छिन्न श्रृंखला स्थापित करने में असफल रहा है।

गौरतलब है कि पुजारी की हत्या के मामले में अजमेर जिला न्यायालय ने 4 सितंबर 2025 के फैसले में आरोपी कालू पुत्र भीमा सिंह को आजीवन उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

क्या था पूरा मामला?

5 मार्च 2024 को अजमेर के दरगाह थाना क्षेत्र में स्थित श्री संभवनाथ भगवान जैन मंदिर के पुजारी शंकरलाल पर कथित रूप से लोहे की रॉड से हमला किया गया था।

रिपोर्ट के अनुसार, एक अज्ञात युवक ने पानी मांगने के बहाने दरवाजा खुलवाया और फिर पुजारी पर हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल पुजारी को जेएलएन अस्पताल, अजमेर में भर्ती कराया गया।

प्रारंभिक तौर पर पुलिस ने धारा 341, 323 और 307 आईपीसी के तहत मामला दर्ज किया।

पुजारी को लगभग 50 घंटे बाद स्वस्थ अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई, लेकिन 11 मार्च 2024 को उनकी मृत्यु हो गई।

इसके बाद मामले में धारा 302 (हत्या) जोड़ दी गई और आरोपी को गिरफ्तार कर ट्रायल कोर्ट ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई।

अपील में दलीलें

आरोपी अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता Nonit Hatila और Ashish Sharma ने दलीलें देते हुए कहा कि सत्र न्यायालय, अजमेर ने उपलब्ध साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया और बिना पर्याप्त व ठोस प्रमाणों के धारा 302 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि कर दी।

अधिवक्ता ने कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार पुजारी शंकरलाल को लगी चोटें “साधारण प्रकृति” की थीं और उन्हें 6 मार्च 2024 को लगभग 50 घंटे बाद स्वस्थ अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी।
11 मार्च 2024 को उनकी मृत्यु “मायोकार्डियल इंफार्क्शन” (हृदयाघात) से हुई।

अधिवक्ता ने दलील दी कि अभियोजन यह सिद्ध नहीं कर सका कि कथित हमले और बाद में हुई मृत्यु के बीच कोई प्रत्यक्ष व निकट संबंध (proximate nexus) था। ऐसे में हत्या का अपराध सिद्ध नहीं होता।

अधिवक्ताओं ने कहा कि घटना कथित रूप से व्यस्त मंदिर परिसर में हुई, लेकिन कोई स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी गवाह पेश नहीं किया गया।

अधिवक्ता ने कहा कि पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था। एफआईआर में हमलावर को “लड़का” बताया गया था, जबकि अपीलकर्ता लगभग 35 वर्ष का व्यक्ति है।

अधिवक्ता ने कहा कि एफआईआर में लोहे की रॉड से हमले का उल्लेख था, लेकिन पुलिस ने पत्थर की बरामदगी दिखाई। कथित मफलर की बरामदगी संदिग्ध परिस्थितियों में दर्शाई गई।

अपीलकर्ता ने कहा कि यह विरोधाभास अभियोजन की कहानी को कमजोर करता है।

सीसीटीवी फुटेज की जांच नहीं

सबसे महत्वपूर्ण इस मामले में होटल इजहार से प्राप्त सीसीटीवी फुटेज घटनास्थल से 60-80 मीटर दूर का था। इन फुटेज को एफएसएल जांच के लिए नहीं भेजा गया और न ही वीडियो में दिख रहे व्यक्ति की स्पष्ट पहचान कराई गई।

राज्य सरकार का जवाब

अपील का विरोध करते हुए राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि सत्र न्यायालय ने सभी साक्ष्यों और गवाहों का समुचित विश्लेषण कर विधि अनुसार निर्णय दिया है।

सरकार ने कहा कि घटनास्थल, परिस्थितियां और उपलब्ध साक्ष्य आरोपी की संलिप्तता दर्शाते हैं और आरोपी की गिरफ्तारी, कथित बरामदगी और सीसीटीवी फुटेज से अपराध की कड़ी स्थापित होती है।

सरकार ने कहा कि पुजारी पर हमला हुआ और उसके कुछ दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई। इस मामले में घटनाक्रम की निरंतरता (continuity of events) आरोपी की भूमिका को दर्शाती है।

अभियोजन का तर्क था कि चोटों और मृत्यु के बीच संबंध को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।

राज्य सरकार ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के मामलों में यदि समग्र परिस्थितियां आरोपी की ओर इशारा करती हैं, तो दोषसिद्धि संभव है।

हाईकोर्ट ने किन आधारों पर दी राहत?

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार पुजारी को लगी चोटें साधारण प्रकृति की थीं।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण “मायोकार्डियल इंफार्क्शन” (हृदयाघात) बताया गया।

अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि कथित हमले और बाद में हुई हृदयाघात से मृत्यु के बीच कोई प्रत्यक्ष और निकट संबंध था।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं था, जबकि घटना व्यस्त क्षेत्र में स्थित मंदिर परिसर में हुई।

हाईकोर्ट ने कहा कि एफआईआर में हमलावर को “लड़का” बताया गया था, जबकि आरोपी लगभग 35 वर्ष का व्यक्ति है।

हाईकोर्ट ने कहा कि एफआईआर में लोहे की रॉड से हमले का उल्लेख था, लेकिन पुलिस ने खून से सना पत्थर बरामद दिखाया, रॉड की कोई बरामदगी नहीं हुई और कथित मफलर की बरामदगी संदिग्ध पाई गई।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि होटल इजहार से प्राप्त सीसीटीवी फुटेज घटनास्थल से 60-80 मीटर दूर का था, न तो साइट प्लान में होटल का उल्लेख था और न ही फुटेज को एफएसएल भेजा गया।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले शरद बिर्धीचंद सरडा बनाम महाराष्ट्र राज्य (1984) का हवाला देते हुए कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के मामलों में प्रत्येक कड़ी का ठोस और निर्विवाद रूप से स्थापित होना आवश्यक है। संदेह, चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।

ट्रायल कोर्ट की त्रुटियों पर टिप्पणी

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया। मेडिकल रिपोर्ट, बरामदगी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य में गंभीर विरोधाभास थे। ऐसे में धारा 302 के तहत दोषसिद्धि कायम रखना न्यायसंगत नहीं है।

हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष “पूर्ण और अविच्छिन्न परिस्थितियों की श्रृंखला” स्थापित करने में असफल रहा, जिससे आरोपी की दोषसिद्धि संदेह से परे सिद्ध हो सके।

आरोपी को तुरंत रिहा करने के आदेश

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपी याचिकाकर्ता की अपील स्वीकार करते हुए जिला सत्र न्यायालय का फैसला रद्द करते हुए बरी कर दिया और तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।

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