जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य के करदाताओं को बड़ी राहत दी हैं.
राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक बार फिर दोहराया हैं कि आयकर विभाग को तकनीक आधारित सुधारों का सख्ती से पालन करना होगा और मनमाने या पुराने तरीकों से जारी किए गए नोटिस न्यायिक जांच में नहीं टिकेंगे.
राजस्थान हाईकोर्ट ने फेसलेस असेसमेंट व्यवस्था को केवल औपचारिकता नहीं बल्कि अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया बताते हुए आयकर विभाग द्वारा जारी किए गए पुनर्मूल्यांकन (री-असेसमेंट) नोटिस को अवैध ठहराते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 151A के तहत लागू फेसलेस और एल्गोरिदम आधारित असेसमेंट प्रणाली का पालन किए बिना जारी किया गया कोई भी नोटिस कानूनन टिकाऊ नहीं है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने गोविंदी गार्डन की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए हैं.
हाईकोर्ट ने आयकर विभाग के नोटिस को रद्द करते हुए करदाताओं को बड़ी राहत दी हैं.
ये हैं मामला
याचिकाकर्ता गोविंदी गार्डन सहित दर्जनों याचिकाओं के माध्यम से आयकर विभाग के डिप्टी कमिश्नर, सेंट्रल सर्कल-2, जयपुर द्वारा जारी नोटिस को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
यह नोटिस वित्तिय वर्ष 2021-22 के लिए ज्यूरिस्डिक्शनल असेसिंग ऑफिसर (JAO) द्वारा धारा 148 के तहत जारी किया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क रखा गया कि नोटिस जारी करते समय आयकर अधिनियम में वर्ष 2021 के बाद लागू किए गए फेसलेस असेसमेंट और री-असेसमेंट स्कीम का पालन नहीं किया गया।
विभाग ने स्थानीय अधिकारी के माध्यम से मैनुअल तरीके से नोटिस जारी किया, जो कानून के प्रावधानों के विपरीत है।
पहले से तय हो चुका है कानूनी प्रश्न
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के अधिवक्ता अधिवक्ता सिद्धार्थ रांका, अपेक्षा, आदित्य विजय, सिद्धार्थ बापना ने यह स्वीकार किया कि इस मामले में उठाया गया मुद्दा पहले ही राजस्थान हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ द्वारा तय किया जा चुका है।
हाईकोर्ट ने शारदा देवी छाजेड़ बनाम आयकर अधिकारी सहित अन्य मामलों में 19 मार्च 2025 को दिए गए निर्णय का हवाला दिया।
उस निर्णय में हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि धारा 151A के तहत लागू स्कीम के अनुसार, आकलन और पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया केवल एल्गोरिदम आधारित और रैंडम आवंटन प्रणाली से ही की जा सकती है।
किसी भी स्थानीय या क्षेत्रीय अधिकारी को अपने स्तर पर नोटिस जारी करने का अधिकार नहीं है।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि
आयकर व्यवस्था में पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने के उद्देश्य से संसद ने तकनीक आधारित फेसलेस सिस्टम लागू किया है।
यदि इस प्रणाली को दरकिनार कर पुराने मैनुअल तरीके अपनाए जाते हैं, तो यह न केवल विधायी मंशा के विरुद्ध है बल्कि करदाताओं के अधिकारों का भी हनन करता है।
स्थानीय नियंत्रण बनाए रखने की मानसिकता को स्वीकार नहीं किया जा सकता, जब कानून स्पष्ट रूप से एल्गोरिदम आधारित प्रक्रिया का निर्देश देता है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि CBDT द्वारा जारी सर्कुलर या निर्देश किसी वैधानिक प्रावधान को कमजोर या अप्रभावी नहीं बना सकते।
नोटिस रद्द, लेकिन विभाग को दी गई सीमित छूट
खंडपीठ ने गोविंदी गार्डन के पक्ष में फैसला सुनाते हुए आयकर विभाग के 1 मार्च 2025 को जारी धारा 148 का नोटिस और उसके आधार पर पारित सभी अनुवर्ती आदेशों को पूर्णतः रद्द और निरस्त कर करने का आदेश दिया गया.
हालांकि, हाईकोर्ट ने अदालत ने आयकर विभाग को यह छूट भी दी कि यदि कानूनन आवश्यक हो, तो वह CBDT की 29 मार्च 2022 की अधिसूचना के अनुरूप और फेसलेस असेसमेंट अधिकारी (FAO) के माध्यम से नया नोटिस जारी कर सकता है।
साथ ही, मुकदमे के दौरान बीता समय सीमा गणना में शामिल नहीं किया जाएगा।