हाईकोर्ट ने कहा-पॉक्सो और हत्या के अपराध साबित,दोष सिद्ध, लेकिन मामला ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की श्रेणी में नहीं, रिमिशन का लाभ भी नहीं मिलेगा।
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने नागौर जिले में 7 वर्षीय बालिका के अपहरण, दुष्कर्म और हत्या के बहुचर्चित मामले में दोषी दिनेश की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड (फांसी) की सजा को प्राकृतिक जीवनकाल तक आजीवन कारावास में बदल दिया हैं.
राजस्थान हाईकोर्ट ने इसके साथ ही स्पष्ट किया कि जिंदा रहने तक दोषी को जेल की सलाखों के पिछे अपना जीवन बिताना होगा और दोषी को किसी भी प्रकार की रिमिशन (सजा में छूट) का लाभ नहीं मिलेगा।
जस्टिस विनीत कुमार माथुर एवं जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए यह महत्वपूर्ण फैसला ट्रायल कोर्ट के फैसले के लिए राज्य सरकार द्वारा भेजे गए मर्डर रेफरेंस और फैसले के खिलाफ दोषी की ओर से दायर आपराधिक अपील पर एक साथ सुनवाई करते हुए दिया हैं.
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी फांसी
विशेष न्यायालय (पॉक्सो) ने आरोपी दिनेश को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 363, 342, 302, 201 सहित पॉक्सो अधिनियम की धारा 5(l)(m)(i)/6 के तहत दोषी ठहराते हुए हत्या और पॉक्सो के गंभीर अपराध में मृत्युदंड तथा अन्य धाराओं में अलग-अलग सजाएं सुनाई थीं।
दोषी की ओर से बहस
बचाव पक्ष में दोषी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कहा निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) नहीं होने का कारण बताते हुए कहा कि पूरे मामले की सुनवाई अत्यधिक जल्दबाजी में पूरी की गई।
बचाव पक्ष ने कहा कि आरोप पत्र दाखिल होने के तुरंत बाद आरोप तय कर दिए गए और लगातार साक्ष्य दर्ज कर निर्णय सुना दिया गया।
अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि बचाव पक्ष को पर्याप्त समय और प्रभावी अवसर नहीं मिला। इसलिए पूरे मुकदमे (Trial) को निरस्त कर De Novo Trial (नए सिरे से सुनवाई) कराने की मांग की गई।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि कअभियोजन की कहानी संदेहास्पद और घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं है।
बचाव पक्ष ने अपनी दलीलों में कहा कि “लास्ट सीन” (Last Seen) का सिद्धांत विश्वसनीय रूप से सिद्ध नहीं हुआ।
कोर्ट में यह भी कहा गया कि अभियुक्त के शरीर पर संघर्ष के निशान नहीं मिले। मेडिकल रिपोर्ट से अभियोजन की कहानी पूरी तरह पुष्ट नहीं होती।
बचाव पक्ष ने कहा कि यह मामला “Rarest of Rare” की श्रेणी में नहीं आता। इसलिए फांसी की सजा बरकरार नहीं रखी जानी चाहिए।
सरकार का विरोध और दलील
राज्य सरकार की ओर से मामले में लोक अभियोजक ने दलीले पेश करते हुए कहा कि अंतिम बार अभियुक्त के साथ मृतक बालिका को देखा गया था और आरोपी ने धारा 313 CrPC के बयान में इसका संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया।
सरकार ने कहा कि FIR और जांच में कोई संदेह नहीं और बच्ची के लापता होने पर परिजनों ने तत्काल खोजबीन की। उसके बाद पुलिस को सूचना दी गई और विधि अनुसार FIR दर्ज हुई।
सरकार ने कहा कि जांच की प्रक्रिया स्वाभाविक और कानूनी थी और घटनास्थल से मिले नमूनों, अभियुक्त के कपड़ों, मृतका के कपड़ों तथा अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों का FSL एवं DNA परीक्षण अभियोजन की कहानी की पुष्टि करता है।
बचाव पक्ष ने कहा कि फोरेंसिक रिपोर्ट से अभियुक्त का अपराध से संबंध स्थापित हुआ।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट तथा चिकित्सकों की गवाही से दुष्कर्म और हत्या की पुष्टि होती है।
मेडिकल एवं वैज्ञानिक साक्ष्य अभियोजन के मामले को मजबूत करते हैं।
सरकार ने कहा कि आरोपी को प्रत्येक गवाह से जिरह का पूरा अवसर दिया गया।
ट्रायल के दौरान कभी भी बचाव पक्ष ने पर्याप्त अवसर न मिलने की शिकायत नहीं की।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध मौखिक, चिकित्सकीय और वैज्ञानिक साक्ष्यों से आरोपी के विरुद्ध अपराध सिद्ध होता है। इसलिए उसकी दोषसिद्धि में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।
हालांकि, केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर हर मामले को “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि मृत्युदंड तभी दिया जाना चाहिए जब आजीवन कारावास पूरी तरह अपर्याप्त हो।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनो पक्षों की बहस और दलीले सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने बिंदूवार कानूनी बिंदुओ पर अपने फैसले को स्पष्ट किया.
निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि बचाव पक्ष की इस दलील को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि मुकदमे की सुनवाई जल्दबाजी में हुई।
हाईकोर्ट ने कहा कि अभियुक्त को प्रत्येक गवाह से जिरह करने का अवसर दिया गया।
ट्रायल के दौरान बचाव पक्ष ने कभी अतिरिक्त समय, गवाहों को पुनः बुलाने अथवा अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने की मांग नहीं की।
अपील के स्तर पर पहली बार इस आधार पर पूरे ट्रायल को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
परिस्थितिजन्य साक्ष्य श्रृंखला
हाईकोर्ट ने कहा कि मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) पर आधारित है, लेकिन अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक ऐसी पूर्ण श्रृंखला बनाते हैं जो केवल अभियुक्त की ओर ही संकेत करती है। अभियुक्त इन परिस्थितियों का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सका।
वैज्ञानिक एवं फोरेंसिक साक्ष्य
हाईकोर्ट ने कहा कि घटनास्थल से प्राप्त साक्ष्य, FSL रिपोर्ट, DNA विश्लेषण तथा अन्य वैज्ञानिक प्रमाण अभियोजन के मामले को मजबूत करते हैं।
इन साक्ष्यों से अभियुक्त और अपराध के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित होता है।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और डॉक्टरों की गवाही से यह स्पष्ट होता है कि बालिका के साथ यौन अपराध किया गया तथा उसकी हत्या की गई। मेडिकल साक्ष्य अभियोजन की कहानी के अनुरूप हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि जांच या गवाहों के बयानों में यदि कुछ मामूली विरोधाभास हों तो मात्र उसी आधार पर पूरे अभियोजन मामले को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। महत्वपूर्ण तथ्य और वैज्ञानिक साक्ष्य अभियोजन के पक्ष में हैं।
दोषसिद्धि न्यायोचित
हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया है और अभियुक्त को दोषी ठहराने का निर्णय पूरी तरह विधिसम्मत है। इसलिए दोषसिद्धि में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।
मृत्युदंड पर क्यों बदला फैसला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गयी फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदलने के पक्ष में ठोस आधार बताया.
हाईकोर्ट ने कहा कि अपराध अत्यंत जघन्य, अमानवीय और समाज को झकझोर देने वाला है, लेकिन केवल अपराध की गंभीरता ही मृत्युदंड का आधार नहीं हो सकती।
कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा विकसित “Rarest of Rare” सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक मामले के तथ्यों, अपराधी की परिस्थितियों तथा शमनकारी (mitigating) एवं गंभीर (aggravating) परिस्थितियों का संतुलन आवश्यक है। इसलिए इस मामले में मृत्युदंड को उपयुक्त नहीं माना गया।
लेकिन प्राकृतिक जीवनकाल तक जेल
हाईकोर्ट ने दोषी को फांसी देने से तो इनकार कर दिया लेकिन अपराध की गंभीरता और पीड़िता के साथ हुई क्रूरता को देखते हुए अभियुक्त को प्राकृतिक जीवनकाल तक आजीवन कारावास की सजा देने पर जोर दिया.
हाईकोर्ट ने दोषी को आजीवन उम्रकैद की सजा सुनाते हुए रिमीशन (सजा में छूट) का लाभ नहीं देने का आदेश दिया.
प्रत्येक अपराध में ₹50,000-₹50,000 का अर्थदंड भी लगाया गया तथा स्पष्ट किया कि दोषी रिमिशन का पात्र नहीं होगा।
REPORTABLE Judgment : Details
RAJASTHAN HIGH COURT JODHPUR
D.B. Murder Reference No. 2/2021
State of Rajasthan Versus Dinesh
D.B. Criminal Appeal (Db) No. 133/2021
Dinesh, S/o Ramchandra Versus State of Rajasthan
JUSTICE VINIT KUMAR MATHUR
JUSTICE CHANDRA SHEKHAR SHARMA
Date of Pronouncement 24.07.2026
