14 साल बाद खुलासा- 8 साल जेल में बिताने के आधार पर जिस आरोपी महिला को हाईकोर्ट ने रिहा करने का दिया था आदेश, वो 2 साल बाद ही आ चुकी थी जमानत पर बाहर
जोधपुर, 11 दिसंबर
राजस्थान हाईकोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान बड़ा चौकाने वाला खुलासा हुआ हैं.
वर्ष 2003 में बांसवाड़ा में अपने पति की हत्या के मामले में आरोपी आदिवसी महिला को गिरफतारी के 2 साल बाद ही जमानत पर रिहा कर दिया गया, लेकिन ना तो राज्य की पुलिस और ना ही लोक अभियोजक ने इसकी जानकारी अदालत को दी.
वर्ष 2005 में जेल से रिहा होने के बावजूद राजस्थान हाईकोर्ट ने वर्ष 2011 में आरोपी महिला को 8 साल से जेल में कैद मानते हुए फैसला भी सुना दिया.
इस मामले में पिछले 14 साल से आरोपी महिला कि याचिका राजस्थान हाईकोर्ट में सूचीबद्ध होती रही लेकिन उसकी तरफ से कोई पेश ही नहीं हुआ.
आखिर राजस्थान हाईकोर्ट ने आरोपी महिला की याचिका में महिला अधिवक्ता को न्यायमित्र नियुक्त कर पुरा मामला सामने लाने में कामयाब रहा.
यह तथ्य सामने आने के बाद कि राजस्थान हाईकोर्ट ने आरोपी महिला को 8 साल जेल की सजा भुगतने के आधार पर रिहा करने का आदेश दिया था, लेकिन आरोपी महिला केवल 2 साल ही जेल में रही.
ऐसे में यह कानूनी सवाल खड़ा हो गया कि क्या वर्ष 2005 में जमानत पर रिहा होकर 20 साल तक सामान्य जीवन बिता रही आरोपी आदिवासी महिला को शेष सजा भुगतने के लिए वापस जेल भेजा जाए या नहीं!
कोर्ट, सरकार और अभियोजन की गलती
जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस आनंद शर्मा की खंडपीठ ने अब इस मामले में रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए फैसला सुनाते हुए आरोपी आदिवासी महिला को भुगती हुई 2 साल की सजा के आधार पर ही रिहा करने का फैसला सुनाया हैं.
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह विसंगति कोर्ट रजिस्ट्री, ट्रायल कोर्ट, सरकारी अधिकारियों तथा लोक अभियोजक कार्यालय के बीच संचार की कमी का परिणाम हैं.
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में संपूर्ण गलती प्रशासनिक और अभियोजन पक्ष की हैं.
हाईकोर्ट ने कहा कि यह पुरी गलती महिला के जेल में बिताई गयी सजा के गलत रिकॉर्ड और प्रशासनिक त्रुटि के कारण हुई हैं जिसकी सजा एक गरीब और आदिवासी महिला को नहीं दी जा सकती.
जेल में ही नही, लेकिन हो गया पक्ष में फैसला
वर्ष 2003 में शराब पीकर घर आए पति से हुए एक घरेलू विवाद में पति की मौत से जुड़ा मामला है, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने काली को धारा 302 (हत्या) में उम्रकैद की सुनाई.
सजा के खिलाफ कि गयी अपील पर सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने वर्ष 2011 में सज़ा को कम करते हुए आरोपी महिला को धारा 304 पार्ट–I यानी ग़ैरइरादतन हत्या का दोषी माना.
इसके साथ ही खंडपीठ ने 2003 से 2011 तक कुल 8 साल जेल में भुगती गई सजा के आधार पर तत्काल रिहा करने का आदेश दिया.
राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ को आरोपी महिला के 8 साल से जेल में होने की जानकारी दी गयी थी जिसके आधार पर ही हाईकोर्ट ने 8 साल भुगती हुई सजा मानते हुए अपना फैसला सुनाया.
2004 में ही मिल गई थी जमानत
अपने पति की हत्या के मामले में गिरफतार कि गयी आरोपी महिला ने ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट में सजा के निलंबन की याचिका दायर की थी.
हाईकोर्ट ने 4 नवंबर 2004 को आरोपी महिला की याचिका पर सज़ा निलंबन का आदेश देते हुए जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया.
जमानत मिलने के बावजूद आरोपी महिला जमानत बॉन्ड नहीं भर पायी, जिसके चलते वह करीब 1 साल से भी अधिक समय तक जेल में रही.
23 दिसंबर 2005 को जमानत बॉन्ड पेश करने के आधार पर आरोपी महिला को जमानत पर रिहा कर दिया गया.
लेकिन महिला को जमानत पर रिहा करने की जानकारी ना तो पुलिस ने ट्रायल कोर्ट को दी और ना ही हाईकोर्ट को.
यहां तक कि मामले के लोक अभियोजक ने भी इसकी जानकारी ट्रायल कोर्ट को नहीं दी.
हाईकोर्ट का आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण आदेश में बांसवाड़ा की आदिवासी महिला काली को बड़ी राहत देते हुए कहा है कि उसे अब आगे की सज़ा काटने के लिए जेल नहीं भेजा जाएगा.
कोर्ट ने माना कि अपने पति की हत्या की आरोपी महिला के मामले में गंभीर प्रशासनिक त्रुटि, गलत रिकॉर्ड और न्यायिक संचार की कमी के कारण उसके हिरासत अवधि को लेकर गलत जानकारी कोर्ट में पेश कि गयी.
हाईकोर्ट ने कहा कि कोर्ट के सामने 2011 में यह गलत जानकारी रखी गई कि काली 2003 से लगातार जेल में है और उसने कुल आठ साल की सजा पूरी कर ली है। जबकि वास्तविक रिकॉर्ड यह था कि काली को 2004 में बेल (जमानत) मिल गई थी.
कोर्ट ने कहा कि बेल बॉन्ड जमा नहीं करने पर वह 23 दिसंबर 2005 तक जेल में रही और बेल बॉन्ड जमा करने पर उसे रिहा कर दिया गया.
हाईकोर्ट ने कहा कि महिला की वास्तविक हिरासत अवधि 07 जुलाई 2003 से 23 दिसंबर 2005—लगभग दो साल थी।
कोर्ट ने सख़्त टिप्पणी की कि यह गंभीर चूक पुलिस, अभियोजन, ट्रायल कोर्ट और रजिस्ट्री सभी की सामूहिक रूप से रही हैं.
20 साल बाद जेल भेजना
जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस आनंद शर्मा की खंडपीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में कहा कि
“काली एक गरीब आदिवासी महिला है। घटना के समय 32 वर्ष की थी, आज लगभग 55 वर्ष की है। ऐसे में दो दशक बाद उसे पुनः जेल भेजना न तो व्यावहारिक है, न ही मानवीय।”
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी महिला काली की कोई आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं है।
रिहाई के बाद पिछले 20 वर्षों में उसके खिलाफ कोई नया मुकदमा दर्ज नहीं हुआ.घटना घरेलू झगड़े से उपजी थी, जिसमें पति शराब के नशे में देर रात घर आया और दोनों में तकरार हुई।
झगड़े के दौरान काली ने गुस्से में एक ही वार किया, यह घटना पूर्व-नियोजित नहीं थी।
कोर्ट ने माना कि यह परिस्थिति धारा 304 पार्ट–I के बिल्कुल अनुरूप है और इसमें अधिकतम 10 वर्ष की सजा का प्रावधान होने के बावजूद, विशेष परिस्थितियों में अदालत सज़ा को कम कर सकती है.
हाईकोर्ट ने कहा कि
दोषी को सुधारने का अवसर देना भी राज्य का कर्तव्य है। और आधुनिक दंड व्यवस्था केवल दंडित करने पर आधारित नहीं है.
कोर्ट ने कहा
“कड़ी सज़ाएँ देने का युग समाप्त हो चुका है। उद्देश्य बदला नहीं, बल्कि सुधार होना चाहिए। समाज का हित तभी है जब अपराधी को सुधारकर मुख्यधारा में लौटाया जाए।”
हाईकोर्ट ने इस मामलें में आरोपी महिला काली के खिलाफ गलत रिकॉर्ड मिलने के बावजूद हाईकोर्ट ने 2011 के फैसले को बदलने से इंकार कर दिया.
लेकिन हाईकोर्ट ने दोषसिद्धी में बदलाव करने की बजाय सजा के मामले में रिव्यू नहीं, बल्कि तथ्य सुधार (Correction of factual error) का तरीका अपनाया.
हाईकोर्ट ने पूर्व में 8 साल की भुगती हुई सजा के आधार पर रिहा करने का आदेश दिया था जिसमें तथ्य सुधार करते हुए 2 साल की भुगती हुई सजा के आधार पर काली को रिहा कर दिया.
हाईकोर्ट ने कहा कि काली की सज़ा उतनी ही मानी जाएगी जितनी काली पहले ही काट चुकी है
कोर्ट ने कहा—
“असली न्याय यही है कि काली को अब और जेल न भेजा जाए। दो साल की सज़ा, बीते 20 सालों का संघर्ष, और पति की मृत्यु का भावनात्मक बोझ-ये दंड पर्याप्त हैं।”
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही महिला काली को अब किसी भी अदालत में हाजिरी देने से भी मुक्त कर दिया हैं. साथ ही पहले जारी किसी वारंट या नोटिस को तुरंत वापस लेने का आदेश दिया हैं.
हाईकोर्ट ने इस मामले में अदालत की सहायता करने वाली अधिवक्ता शोभा प्रभाकर को अमीकस क्यूरी के रूप में प्रशंसा की.