जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी कार्मिक के खिलाफ जारी किए गए अनुशासनात्मक और अपीलीय आदेशों में केवल “विचार किया गया” शब्द लिख देना पर्याप्त नहीं माना जाएगा।
इसी आधार पर राजस्थान हाईकोर्ट ने बिना कारण दर्ज किए पारित किए गए आदेश के जरिए जयपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (JVVNL) के सहायक अभियंता (AEN) राजेश कुमार तिवारी पर लगाया गया दंड और अपीलीय आदेश—दोनों को रद्द करते हुए—उन्हें समस्त परिणामी लाभ देने के आदेश दिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे आदेशों में कर्मचारी के बचाव पक्ष तथा उसकी सफाई पर विस्तृत, वास्तविक विचार और तर्क स्पष्ट रूप से लिखे जाने चाहिए, तभी उन्हें न्यायिक रूप से टिकाऊ माना जाएगा।
फ़ैसले में राजस्थान हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि यदि अनुशासनात्मक तथा अपीलीय प्राधिकारी ने आदेश में सिर्फ़ औपचारिक तौर पर “रिकॉर्ड और जवाब पर विचार किया गया” लिखा है, तो इससे यह नहीं माना जा सकता कि उन्होंने कर्मचारी के बचाव और तथ्यात्मक रिपोर्ट का अर्थपूर्ण और सक्रिय विचार किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे आदेश निष्पक्ष, पारदर्शी और न्यायोचित प्रक्रिया के सिद्धांतों के खिलाफ होंगे।
जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने यह आदेश राजेश कुमार तिवारी की ओर से दायर याचिका पर दिया है।
यह है मामला
जयपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (JVVNL) के सहायक अभियंता (AEN) राजेश कुमार तिवारी के खिलाफ कर्तव्यों का सही ढंग से निर्वहन नहीं करने का आरोप लगाते हुए वर्ष 2012 में एक आरोप-पत्र जारी किया गया।
याचिकाकर्ता पर आरोप लगाया गया कि स्क्रैप सामग्री की नीलामी के दौरान नई जी.आई. वायर को स्क्रैप बताकर बाहर भेजने का प्रयास किया गया, जिससे निगम को वित्तीय नुकसान हो सकता था।
इस मामले में अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने वेतन में कमी कर दी।
इस आदेश के खिलाफ की गई अपील को भी इसी तर्क के आधार पर खारिज कर दिया गया कि याचिकाकर्ता ने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया।
अपील खारिज होने पर याचिकाकर्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी।
याचिका में दलील
याचिकाकर्ता का कहना था कि वे उस समय मौके पर मौजूद नहीं थे, जब कथित अनियमितता हुई।
याचिकाकर्ता ने कहा कि उन्होंने स्क्रैप लोडिंग के संबंध में केवल सामान्य प्रशासनिक निर्देश दिए थे, जबकि वास्तविक लोडिंग अन्य कर्मचारियों द्वारा उनकी जानकारी और अनुमति के बिना की गई।
याचिका में कहा गया कि वे शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं और देर रात अंधेरे में लोडिंग के समय मौके पर मौजूद रहना उनके लिए संभव नहीं था।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि जैसे ही उन्हें अनियमितता की जानकारी मिली, उन्होंने तत्काल कार्रवाई करते हुए गलत तरीके से रखी गई सामग्री को वापस सही स्थान पर रखवाया।
इसके बावजूद, अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने उनके जवाब और बचाव पक्ष की दलीलों का विश्लेषण किए बिना एक वार्षिक वेतनवृद्धि रोकने का दंड दे दिया।
याची की विभागीय अपील भी बिना किसी ठोस कारण बताए खारिज कर दी गई।
याचिका में कहा गया कि उनकी सफाई पर न तो वास्तविक विचार किया गया और न ही किसी आदेश में यह बताया गया कि उनकी दलीलें क्यों अस्वीकार की गईं।
हाईकोर्ट का आदेश
बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल “रिकॉर्ड और जवाब विचाराधीन किए गए” जैसा बयानी वाक्यांश लिख देना वैधानिक विचार (consideration) के मानदंडों को पूरा नहीं करता।
हाईकोर्ट ने कहा कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी को कर्मचारी की सफाई, संबंधित सबूतों, तथ्यों और साक्ष्यों को न केवल पढ़ना है, बल्कि उन पर सक्रिय रूप से मस्तिष्क लगाकर तौलने और विचार करने की आवश्यकता है।
जब दंड या किसी भी नकारात्मक निर्णय का प्रभाव कर्मचारी के भविष्य, पदोन्नति या सेवा रिकॉर्ड पर होता है, तो उस निष्कर्ष तक पहुँचने के कारणों को स्पष्ट रूप से आदेशों में शामिल करना अनिवार्य है।
सिर्फ टिप्पणी नहीं, संपूर्ण कारण जरूरी
हाईकोर्ट ने कहा कि अनुशासनात्मक कार्यवाही में “विचार किया गया” लिख देना मात्र औपचारिकता है।
कानून की दृष्टि में ‘विचार’ का अर्थ है सक्रिय मानसिक प्रक्रिया, जिसमें कर्मचारी के बचाव, तथ्यात्मक रिपोर्ट और रिकॉर्ड का निष्पक्ष मूल्यांकन शामिल हो।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब मामूली दंड (Minor Penalty) लगाया जाता है और विस्तृत विभागीय जांच नहीं की जाती, तब प्राधिकारी पर यह और अधिक जिम्मेदारी होती है कि वह कर्मचारी की लिखित सफाई पर स्पष्ट और तर्कसंगत कारण दर्ज करे, क्योंकि वही उसका एकमात्र बचाव होता है।
हाईकोर्ट ने अपीलीय प्राधिकारी की भूमिका पर भी गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि अपील का उद्देश्य केवल औपचारिक पुष्टि नहीं, बल्कि स्वतंत्र, निष्पक्ष और अर्थपूर्ण समीक्षा है। याची की अपील को यांत्रिक ढंग से खारिज करना कानूनन गलत है।
आदेश का हिस्सा
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सिर्फ़ टिप्पणी या नोट-शीट में विचार का उल्लेख होना न्यायिक समीक्षा के लिए पर्याप्त नहीं माना जाएगा; यह आदेश का हिस्सा होना चाहिए।
यदि आदेश में कारण स्पष्ट नहीं किए गए हैं, तो वह निर्णय अन्यायपूर्ण, मनमाना और न्यायिक समीक्षा में अस्वीकार्य माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मामले Chairman, LIC vs. A. Masilamani का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि “consider” शब्द का अर्थ केवल शब्दों का प्रयोग नहीं है, बल्कि तत्वों का समझदारी से आकलन करना और तार्किक निष्कर्ष पर पहुँचने का संकेत देना भी है।