जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जालोर जिले के सायला में करोड़ों रुपए की जमीन को बेहद कम कीमत पर रजिस्ट्री कराने के मामले को गंभीर वित्तीय अनियमितता मानते हुए राज्य सरकार और राजस्व विभाग को जांच के निर्देश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने मामले में टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला राज्य के राजस्व के साथ बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी और बेहिसाबी नकद लेनदेन का प्रतीत होता है।
यह मामला जालोर जिले से जुड़े तीन आरोपियों की जमानत याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया।
जालोर निवासी दौलतराम, विशाल सिंह और गौतम चंद ने राजस्थान हाईकोर्ट में जमानत याचिकाएं दायर की थीं। इन जमानत याचिकाओं की सुनवाई के दौरान मामले में खुलासा हुआ कि 5.51 करोड़ की जमीन की 8 लाख में रजिस्ट्री की गई है।
जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की एकलपीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से फिलहाल जमानत आवेदन वापस लेने की बात कही गई और चालान पेश होने के बाद दोबारा जमानत याचिका दायर करने की अनुमति मांगी गई।
इस पर कोर्ट ने याचिकाओं को “नॉट प्रेस्ड” मानते हुए खारिज कर दिया।
परिवादी का विरोध और खुलासा
सुनवाई के दौरान परिवादी विनोद कुमार जैन की ओर से अधिवक्ता रमेश चंद्र पुरोहित और एम.एस. शेख ने जमानत का जोरदार विरोध किया।
परिवादी पक्ष ने अदालत को बताया कि मुल्जिमों ने कथित रूप से विनोद कुमार जैन की जगह एक फर्जी व्यक्ति को खड़ा कर पहले एग्रीमेंट तैयार कराया और बाद में उसी आधार पर रजिस्ट्री भी निष्पादित करवा दी।
इस पूरे घटनाक्रम को सुनियोजित धोखाधड़ी बताते हुए जमानत का विरोध किया गया।
जिस पर जांच अधिकारी ने अदालत का ध्यान केस डायरी में शामिल एक एग्रीमेंट की ओर आकर्षित किया।
दस्तावेज के अनुसार संबंधित जमीन की वास्तविक बाजार कीमत 5 करोड़ 51 लाख रुपए बताई गई थी, जबकि उसी जमीन की रजिस्ट्री मात्र 8 लाख रुपए में कराई गई।
खरीदार का जवाब
खरीदार पक्ष और जांच अधिकारी ने अदालत को बताया कि जमीन की बाजार कीमत और DLC (डिस्ट्रिक्ट लेवल कमेटी) रेट में भारी अंतर होने के कारण ऐसा हुआ।
उनके अनुसार, वास्तविक बाजार मूल्य 5.51 करोड़ रुपए था, लेकिन DLC रेट केवल 8 लाख रुपए होने से दस्तावेज उसी राशि पर पंजीकृत कराया गया।
हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को गंभीरता से लेते हुए कहा कि 5.51 करोड़ रुपए की जमीन को मात्र 8 लाख रुपए में रजिस्टर्ड कराना वास्तविक कीमत से करीब 70 गुना कम है।
अदालत ने कहा कि ऐसा कृत्य न केवल राज्य सरकार को भारी राजस्व नुकसान पहुंचाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि संपत्ति की खरीद-फरोख्त में बड़े स्तर पर बेहिसाबी नकद राशि का उपयोग किया जा रहा है।
कोर्ट ने मामले को राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव के संज्ञान में लाने और सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
साथ ही विस्तृत जांच कर रिपोर्ट अगली सुनवाई पर पेश करने को कहा गया है। अदालत ने आदेश की प्रति तत्काल प्रभाव से प्रमुख सचिव, राजस्व विभाग को भेजने के निर्देश भी दिए हैं।
मामले की अगली सुनवाई जुलाई के दूसरे सप्ताह में तय की है।