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बिना ट्रायल, बिना सजा के 6 साल की जेल, राजस्थान हाईकोर्ट ने जमानत देते हुए कहा- यह अनुच्छेद 21 का गंभीर उल्लंघन, सजा से पहले सजा न्याय नहीं

Rajasthan High Court Grants Bail After 6 Years Without Trial, Calls Prolonged Detention Violation of Article 21
हाईकोर्ट ने अदालतों की कार्यप्रणाली पर कहा -“जब न्यायिक प्रक्रिया स्वयं दंडात्मक स्वरूप ले ले, तो यह कानून के शासन के लिए खतरनाक संकेत है।”

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने बिना सजा सुनाए करीब 6 साल से भी अधिक समय से विचाराधीन बंदी के रूप में जेल में बंद एक आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए हैरानी और नाराजगी जताते हुए रिपोर्टेबल फैसला सुनाया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने बिना ट्रायल और बिना सजा के लंबे समय तक किसी अभियुक्त को जेल में रखने पर जमानत देते हुए सख्त हैरानी और नाराजगी जताते हुए अनिश्चितकाल तक कैद में रखने को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का घोर उल्लंघन बताया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया यदि दंडात्मक स्वरूप ग्रहण कर ले, तो वह न्याय व्यवस्था की आत्मा के विरुद्ध है।

जस्टिस अनिल कुमार उपमन ने वर्ष 2019 से लगातार न्यायिक हिरासत में रह रहे शैतान सिंह को जमानत देते हुए यह फैसला दिया है।

प्रक्रिया बन गई है दंड

हाईकोर्ट ने न्यायिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी अप्रत्यक्ष रूप से आत्मालोचनात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि—
“जब न्यायिक प्रक्रिया स्वयं दंडात्मक स्वरूप ले ले, तो यह कानून के शासन के लिए खतरनाक संकेत है।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्थगन संस्कृति (Adjournment Culture) न्याय के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन चुकी है और इसे रोकना न्यायपालिका की सामूहिक जिम्मेदारी है।

2019 से जेल में बंद, ट्रायल अब भी अधूरा

अधिवक्ता राजीव सुराणा ने याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता शैतान सिंह को वर्ष 20 सितंबर 2019 को गिरफ्तार किया गया था।

उस पर भारतीय दंड संहिता की कई गंभीर धाराओं के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत भी आरोप लगाए गए थे।

जांच पूरी होने के बाद आरोप-पत्र दाखिल किया गया, किंतु इसके बावजूद छह वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी ट्रायल अंतिम निर्णायक चरण तक नहीं पहुंच सका।

अधिवक्ता ने कहा कि मामला अभी भी आरोप निर्धारण की अवस्था में ही अटका हुआ है और सुनवाई में लगातार स्थगन होता रहा है।

सजा से पहले सजा नहीं हो सकती

हाईकोर्ट ने याचिका में आए तथ्यों पर सुनवाई करते हुए इसे “न्यायिक प्रक्रिया की विफलता” बताते हुए गंभीर चिंता व्यक्त की।

जस्टिस अनिल कुमार उपमन ने कहा कि—
“किसी भी आरोपी को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसका अपराध विधि अनुसार सिद्ध न हो जाए। ऐसे में उसे वर्षों तक जेल में बंद रखना, वास्तव में सजा देने के समान है, जो संविधान की मूल भावना के विपरीत है।”

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रायल की देरी का भार अकेले आरोपी पर नहीं डाला जा सकता, विशेषकर तब, जब रिकॉर्ड यह दर्शाता हो कि अभियोजन स्वयं मामलों को आगे बढ़ाने में अपेक्षित तत्परता नहीं दिखा रहा।

अनुच्छेद 21 और शीघ्र सुनवाई का अधिकार

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या करते हुए कहा कि इसमें केवल जीवन का अधिकार ही नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन और शीघ्र न्याय का अधिकार भी निहित है।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि—
“लंबे समय तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रखना, बिना किसी ठोस प्रगति के, असंवैधानिक है और इसे किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता।”

अदालत ने दो टूक कहा कि यदि अदालतें स्वयं समयबद्ध ट्रायल सुनिश्चित नहीं कर पातीं, तो आरोपी को उसका खामियाजा भुगतने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

अपराध की गंभीरता अकेला आधार नहीं

राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और आरोपी के विरुद्ध अन्य मामले भी दर्ज हैं। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि—
“अपराध की गंभीरता अपने आप में जमानत से इनकार करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती, विशेषकर तब, जब आरोपी पहले ही संभावित अधिकतम सजा की अवधि के करीब जेल में समय बिता चुका हो।”

अदालत ने यह भी जोड़ा कि यदि ट्रायल पूरा होने में और समय लगने की संभावना है, तो आरोपी को जेल में बनाए रखना न्याय के बजाय अन्याय होगा।

शर्तों पर मिली जमानत

राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता आरोपी शैतान सिंह को सशर्त जमानत देते हुए ₹1 लाख के निजी मुचलके और ₹50-50 हजार के दो जमानती प्रस्तुत करने की शर्त लगाई है।

इसके साथ ही याचिकाकर्ता आरोपी को प्रत्येक माह संबंधित पुलिस थाने में उपस्थिति दर्ज करानी होगी।

बिना अनुमति क्षेत्र नहीं छोड़ेगा और ट्रायल के दौरान किसी भी प्रकार के आपराधिक कृत्य में संलिप्त नहीं होगा।

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