टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

Rajasthan Hihgcourt से बड़ी राहत: 30 साल पुराने फौजदारी मामले में भुगती गई सजा के आधार पर दोषी को रिहा करने का आदेश

Rajasthan Highcourt

जयपुर, 11 अक्टूबर

Rajasthan Highcourt जयपुर बेंच ने 30 साल पुराने एक फौजदारी मामले में याचिकाकर्ता/आरोपी को बड़ी राहत देते हुए भुगती हुई सजा के आधार पर रिहा करने का आदेश दिया है।

बहरोड़ निवासी कुंवरसिंह के खिलाफ 1995 के एक फौजदारी मामले में ACJM Court, बहरोड़ ने सजा सुनाई थी।

बहरोड़ ACJM कोर्ट ने कुंवरसिंह को आईपीसी की धाराओं 279, 337, 338 और 304-A के तहत दोषी मानते हुए अलग-अलग कुल 2 वर्ष की जेल की सजा सुनाई थी।

आरोपी बस था ड्राईवर

आईपीसी की धारा 304-A किसी की लापरवाही से मृत्यु होने पर दो वर्ष की सजा का प्रावधान करती है।

याचिकाकर्ता आरोपी ने एक बस का ड्राईवर रहते हुए एक दुर्घटना को अंजाम दिया था जिससे बस में एक सीट पर बैठी तीन सवारियों में से एक सवारी की मृत्यु हो गयी.

इस मामले में मृतक के परिजनों की ओर से लापरवाही से मृत्यु कारित करने के मामले में याचिकाकर्ता आरोपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया था.

एसीजेएम कोर्ट के फैसले को ADJ कोर्ट ने भी बरकरार रखा। जिसके बाद याचिकाकर्ता को कुछ माह जेल में रहना पड़ा।

याचिकाकर्ता ने Highcourt में निगरानी याचिका दायर कर अधिनस्थ अदालत के फैसले को चुनौती दी।

बचाव पक्ष की दलील

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता मोहित बलवदा ने अदालत में पैरवी करते हुए दलील दी कि यह मामला 30 वर्ष पुराना हो चुका है और याचिकाकर्ता ने लंबे समय से कानूनी लड़ाई लड़ी है।

अधिवक्ता ने कहा कि ऐसे विशेष परिस्थितियों में, जहां मामले अत्यंत पुराने हैं और कोई गंभीर अपराध या अतिरिक्त परिस्थितियाँ नहीं हैं, वहां दंड पर पुनर्विचार आवश्यक नहीं है।

अधिवक्ता ने यह भी बताया कि अधिनस्थ अदालत द्वारा 15 जून 2007 को दिए गए फैसले को कोर्ट द्वारा निलंबित कर दिया गया था।

इसलिए अब याचिकाकर्ता को भुगती हुई सजा के आधार पर रिहा करना उचित होगा।

सरकार ने किया विरोध

याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता ने कहा कि अधिनस्थ अदालत के फैसले में कोई गलती नहीं की गई है और आरोपी याचिकाकर्ता की लापरवाही के चलते एक व्यक्ति की मृत्यु हुई है।

सरकारी अधिवक्ता ने कहा कि अधिनस्थ अदालत के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि या दोष नहीं है, इसलिए पुनरीक्षण के लिए इसमें हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है।

अदालत का फैसला

दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि अधिनस्थ अदालत के दोषसिद्धि के फैसले में कोई कानूनी पेंच नहीं है, इसलिए अदालत दोषसिद्धि के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती।

हाईकोर्ट ने कहा कि जहाँ तक दंड की अवधि का सवाल है, यह ध्यान देने योग्य है कि यह घटना वर्ष 1995 की है। याचिकाकर्ता ने लगभग 30 वर्षों तक लंबी कानूनी लड़ाई का अनुभव किया है और अदालत से न्याय के मार्ग में यह अवधि बिताई है।

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता कुछ समय के लिए जेल में भी रहा। इस कारण से, याचिकाकर्ता के मामले में दया का दृष्टिकोण अपनाना उचित है।

सबसे अधिक लोकप्रिय