राजस्थान हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी कहा ‘मियां-बीवी राजी, नहीं मान रहा क़ाज़ी | राज्यभर की फैमिली कोर्ट्स को दिए आदेश
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि मुस्लिम पति-पत्नी आपसी सहमति से ‘मुबारात’ के जरिए विवाह विच्छेद कर चुके हैं, तो फैमिली कोर्ट का दायित्व है कि वह इसकी वैधता की जांच कर वैवाहिक स्थिति को औपचारिक रूप से घोषित करे।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि केवल तकनीकी आधारों पर ऐसे मामलों को खारिज नहीं किया जा सकता।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने आयशा चौहान बनाम वसीम खान मामले में यह फैसला देते हुए फैमिली कोर्ट, मेड़ता द्वारा 3 अप्रैल 2025 को दिए गए आदेश को रद्द कर दिया हैं.
मियां बिवी राजी, नहीं मान रहा कांजी
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले की शुरूआत में फैमिली कोर्ट पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह प्रकरण ‘मियां-बीवी राजी, क़ाज़ी नहीं मान रहा’ वाली स्थिति का जीवंत उदाहरण है, जहाँ दोनों पक्ष तलाक पर सहमत हैं, फिर भी निचली अदालत ने अनावश्यक हस्तक्षेप किया।”
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939 एक कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य मुस्लिम महिलाओं को जबरन या मृत विवाह में फंसे रहने से मुक्त करना है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि विवाह पूरी तरह टूट चुका है और दोनों पक्ष भविष्य में साथ रहने की कोई संभावना नहीं रखते, तो अदालत द्वारा विवाह को औपचारिक रूप से भंग घोषित करना ही न्यायसंगत है।
फैमिली कोर्ट पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की इस सोच को कानून के विपरीत और अत्यधिक तकनीकी करार दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि—
“जब पति और पत्नी दोनों यह स्वीकार कर रहे हैं कि विवाह समाप्त हो चुका है और वे स्वेच्छा से अलग हो चुके हैं, तब अदालत का यह कर्तव्य नहीं है कि वह केवल औपचारिकताओं के आधार पर एक मृत विवाह को जीवित रखे।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट ने शिया मुस्लिम कानून से जुड़े निर्णयों पर भरोसा किया, जबकि वर्तमान मामले में पक्षकार सुन्नी मुस्लिम कानून से शासित थे, जहाँ तलाक के लिए दो गवाहों की अनिवार्यता नहीं है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
“अदालतें कानून की प्रहरी हैं, न कि टूट चुके रिश्तों को जबरन जीवित रखने का माध्यम।”
तलाक को मंजूरी, फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में आदेश दिया कि अपीलकर्ता पत्नी अपने तथा प्रतिवादी पति के बीच मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत मान्य ‘मुबारात’ के माध्यम से विवाह विच्छेद यानी तलाक की घोषणा पाने की पूर्णतः हकदार है।
कोर्ट ने पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए मेड़ता फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करने का फैसला सुनाया. हाईकोर्ट ने घोषित किया कि अपीलकर्ता और प्रतिवादी के मध्य विवाह विधिवत रूप से भंग हो चुका है।
ये हैं मामला
याचिकाकर्ता आयशा चौहान और प्रतिवादी वसीम खान का विवाह 27 फरवरी 2022 को मुस्लिम रीति-रिवाज से हुआ था।
विवाह के बाद दोनों के बीच गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए और साथ रहना संभव नहीं रहा।
पत्नी के अनुसार, पति ने मुस्लिम कानून के अनुसार तीन अलग-अलग तुहर अवधि में 8 जून 2024, 8 जुलाई 2024 और 8 अगस्त 2024 को तलाक बोली गयी, जिसे पत्नी ने स्वीकार कर लिया।
इसके बाद 20 अगस्त 2024 को दोनों ने आपसी सहमति से मुबारातनामा (Mutual Divorce Agreement) भी किया, जिसमें पत्नी को मेहर, इद्दत अवधि का खर्च, आजीवन भरण-पोषण की राशि और स्त्रीधन लौटाया गया।
इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि तलाक के समय दो गवाहों की उपस्थिति सिद्ध नहीं हुई।
याचिका में दलील
अधिवक्ता विशाल शर्मा ने याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया कि फैमिली कोर्ट, मेड़ता द्वारा पारित आदेश न केवल तथ्यों के विपरीत है, बल्कि स्थापित विधिक सिद्धांतों के भी प्रतिकूल है।
याचिका में कहा गया कि पति और पत्नी दोनों मुस्लिम धर्म से संबंधित हैं तथा उनका विवाह मुस्लिम शरिया और रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था।
विवाह के पश्चात दोनों के बीच गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए, जिससे वैवाहिक जीवन पूरी तरह से टूट चुका था और साथ रहना असंभव हो गया।
याचिका में कहा गया कि ऐसे में पति द्वारा मुस्लिम कानून के अनुसार तीन अलग-अलग तुहर अवधियों में तलाक का उच्चारण किया गया, जिसे पत्नी ने स्वीकार किया। इस तथ्य से दोनों पक्षों में कोई विवाद नहीं है।
सुन्नी मुस्लिम कानून में दो गवाह अनिवार्य नहीं
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए तलाक को अमान्य मान लिया कि तलाक के समय दो गवाह उपस्थित नहीं थे, जबकि यह शर्त सुन्नी मुस्लिम कानून में अनिवार्य नहीं है।
याचिका में कहा गया कि फैमिली कोर्ट ने शिया मुस्लिम कानून से संबंधित निर्णयों पर निर्भर होकर गंभीर विधिक त्रुटि की है, जबकि वर्तमान मामले में पक्षकार सुन्नी मुस्लिम कानून से शासित हैं।
अधिवक्ता ने आगे कहा कि तलाक के पश्चात दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से मुबारात के माध्यम से लिखित तलाक समझौता भी किया, जिसमें मेहर, इद्दत अवधि का खर्च, आजीवन भरण-पोषण तथा स्त्रीधन का निपटारा किया गया। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि तलाक पूर्णतः स्वैच्छिक, बिना किसी दबाव और आपसी सहमति से हुआ।
अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया गया कि जब दोनों पक्ष स्वयं यह स्वीकार कर रहे हैं कि उनका विवाह समाप्त हो चुका है और भविष्य में साथ रहने की कोई संभावना नहीं है, तब अदालत द्वारा केवल तकनीकी आधारों पर विवाह को जीवित मानना न्याय के विरुद्ध है। इससे पक्षकारों को केवल नाममात्र के रिश्ते में बांधे रखना होगा, जो कानून का उद्देश्य नहीं है।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियाँ
राजस्थान हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के दृष्टिकोण को गलत ठहराते हुए कहा कि सुन्नी मुस्लिम कानून में तलाक के लिए दो गवाहों की अनिवार्यता नहीं है।
फैमिली कोर्ट ने शिया कानून से संबंधित निर्णयों पर गलत तरीके से भरोसा किया।
जब दोनों पक्ष स्वयं यह स्वीकार कर रहे हैं कि तलाक हो चुका है, तो केवल तकनीकी आधार पर उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि तलाक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पति ने स्वेच्छा और समझ-बूझ के साथ तलाक दिया हो, न कि केवल औपचारिकताओं में उलझकर वास्तविक स्थिति को नकारा जाए।
‘मुबारात’ को लेकर स्पष्ट कानूनी स्थिति
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि ‘मुबारात’ मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक का एक मान्य और वैध तरीका है, जिसमें पति और पत्नी दोनों की आपसी सहमति आवश्यक होती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह एक प्रकार का आपसी तलाक है, जिसमें पत्नी को अपने अधिकार छोड़ने की अनिवार्यता नहीं होती, जैसा कि ‘खुला’ में होता है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्टों के पूर्व फैसलो का हवाला देते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट का कार्य केवल यह देखना है कि:
तलाक स्वेच्छा से हुआ है या नहीं, कोई दबाव या जबरदस्ती तो नहीं थी और तलाक संबंधी दस्तावेज वास्तविक और प्रमाणिक हैं
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि ये शर्तें पूरी होती हैं, तो फैमिली कोर्ट को वैवाहिक स्थिति घोषित करनी ही होगी।
राजस्थान की फैमिली कोर्ट्स के लिए दिशा-निर्देश
राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले में फैमिली कोर्ट के रवैये को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि राजस्थान में मुस्लिम कानून के तहत तलाक से जुड़े कई मामलों को फैमिली कोर्ट्स द्वारा नियमित रूप से खारिज किया जा रहा है।,
हाईकोर्ट ने कहा कि इसलिए इस मामले में निर्देश जारी किए जा रहे हैं
यदि याचिका में पहले से तलाक होने की बात कही गई हो, तो दोनों पक्षों की व्यक्तिगत उपस्थिति में बयान लिए जाएं।
तलाक से संबंधित दस्तावेज (तलाकनामा, मुबारातनामा, खुलानामा) रिकॉर्ड पर लिए जाएं।
संतुष्ट होने पर फैमिली कोर्ट धारा 7, फैमिली कोर्ट्स एक्ट के तहत विवाह की स्थिति घोषित करे।