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Rajasthan Highcourt से राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को बड़ा झटका, पर्यावरण क्षतिपूर्ति वसूलने के अधिकार पर दिया बड़ा फैसला

Rajasthan High Court Jodhpur delivers a major verdict stopping RSPCB from collecting environmental compensation without proper legal framework.

जोधपुर, 4 नवंबर

Rajasthan Highcourt से राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को बड़ा झटका, पर्यावरण क्षतिपूर्ति वसूलने के अधिकार पर दिया बड़ा फैसला ने पर्यावरण क्षतिपूर्ति (Environmental Compensation) वसूलने के अधिकार के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

Rajasthan Highcourt से राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को बड़ा झटका, पर्यावरण क्षतिपूर्ति वसूलने के अधिकार पर दिया बड़ा फैसलाने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (RSPCB) को तब तक पर्यावरण क्षतिपूर्ति वसूलने का अधिकार नहीं है, जब तक इस संबंध में उचित नियम और उप-विधान (Rules & Regulations) नहीं बनाए जाते।

जस्टिस सुनील बेनीवाल की एकल पीठ ने टाटा ब्रिक्स कंपनी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है।

टाटा ब्रिक्स कंपनी ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि बिना विधिक अधिकार के RSPCB ने 15.60 लाख रुपये की पर्यावरण क्षतिपूर्ति थोप दी थी।

रिफंड करने के आदेश

Rajasthan Highcourt से राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को बड़ा झटका, पर्यावरण क्षतिपूर्ति वसूलने के अधिकार पर दिया बड़ा फैसला ने अपने फैसले में कहा कि राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा वसूल की गई पर्यावरण क्षतिपूर्ति कानूनी रूप से अवैध है।

Rajasthan Highcourt से राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को बड़ा झटका, पर्यावरण क्षतिपूर्ति वसूलने के अधिकार पर दिया बड़ा फैसला ने कहा कि जब तक उपयुक्त नियम और विनियम अधिसूचित नहीं किए जाते, तब तक ऐसी कोई वसूली नहीं की जा सकती।

जिन उद्योगों से ऐसी राशि वसूल की गई है, उन्हें रिफंड (वापसी) का अधिकार है और सभी को राशि लौटाने के आदेश दिए गए हैं।

Rajasthan Highcourt से राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को बड़ा झटका, पर्यावरण क्षतिपूर्ति वसूलने के अधिकार पर दिया बड़ा फैसला ने याचिकाकर्ता टाटा ब्रिक्स कंपनी से वसूली गई 15.60 लाख रुपये की राशि को छह सप्ताह में लौटाने के आदेश दिए हैं।

साथ ही, हाईकोर्ट ने RSPCB को छूट दी है कि वह अधीनस्थ कानून (subordinate legislation) बनाने के बाद पुनर्स्थापनात्मक (restitutionary) और प्रतिपूरक (compensatory) हानि, साथ ही संभावित पर्यावरणीय क्षति से संबंधित क्षतिपूर्ति की वसूली कर सकता है।

यह है मामला

श्रीगंगानगर जिले की टाटा ब्रिक्स कंपनी ने 2021 में ईंट भट्ठा चलाने के लिए “कंसेंट टू ऑपरेट (Consent to Operate)” की अनुमति मांगी थी, जो फरवरी 2022 में बोर्ड द्वारा 10 साल के लिए दी गई थी।

इसी बीच, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेश के आधार पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जनवरी 2022 में नोटिस जारी कर ₹15.60 लाख की पर्यावरण क्षतिपूर्ति लगा दी।

कंपनी ने इस कार्रवाई को अदालत में चुनौती दी और कहा कि बोर्ड के पास ऐसी कोई वैधानिक शक्ति नहीं है कि वह पर्यावरण क्षतिपूर्ति वसूल सके।

इस याचिका के साथ कई अन्य भट्ठा संचालकों ने भी इसी प्रकार के आदेशों को चुनौती दी थी।

टाटा ब्रिक्स की दलील

टाटा ब्रिक्स कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष शिशोदिया ने पैरवी करते हुए कहा कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का यह कदम कानून से परे है, क्योंकि बोर्ड को यह वसूली करने का अधिकार ही नहीं है।

अधिवक्ता ने कहा कि पर्यावरण क्षतिपूर्ति केवल राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 15 और 18 के तहत NGT ही निर्धारित कर सकता है।

अधिवक्ता शिशोदिया ने इस मामले में तीन महत्वपूर्ण फैसलों —
कंठा विभाग युवा कोली समाज परिवर्तन बनाम गुजरात राज्य (2023), डीपीसीसी बनाम लोढ़ी प्रॉपर्टीज कंपनी लिमिटेड (2025) और Suez India Pvt. Ltd. बनाम उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (2025) — का हवाला दिया।

उन्होंने कहा कि इन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट दोनों ने स्पष्ट किया था कि जब तक पर्यावरण क्षतिपूर्ति की गणना और वसूली के लिए नियम या अधिसूचित प्रक्रिया नहीं बनाई जाती, तब तक राज्य बोर्डों द्वारा किसी भी प्रकार की राशि वसूलना कानूनन अनुचित है।

बोर्ड का पक्ष

राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिवक्ता ने कहा कि NGT ने 2021 में राज्य बोर्डों को अधिकार दिया था कि वे ऐसे उद्योगों से क्षतिपूर्ति वसूलें जो बिना अनुमति के संचालित हो रहे हैं।

अधिवक्ता ने दलील दी कि यह राशि प्रदूषण से हुए नुकसान की भरपाई के लिए ली जाती है, न कि दंड के रूप में।

बोर्ड ने यह भी कहा कि यह प्रक्रिया केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की 2022 की गाइडलाइंस पर आधारित है, जिसमें “General Framework for Imposing Environmental Damages” नामक दस्तावेज में गणना का तरीका बताया गया है।

राज्य सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि याचिकाकर्ताओं को पहले अपील प्राधिकरण के समक्ष जाना चाहिए था।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी प्राधिकरण की कार्रवाई “बिना अधिकार” की हो, तब भी उच्च न्यायालय संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर सकता है।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले Whirlpool Corporation बनाम रजिस्ट्रार ऑफ ट्रेडमार्क्स (1998) का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर या कानून के विपरीत है, तो वैकल्पिक उपाय का अभाव बाधा नहीं बनता।

हाईकोर्ट का आदेश

जस्टिस सुनील बेनीवाल ने अपने 24 पृष्ठों के फैसले में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने लोढ़ी प्रॉपर्टीज केस (2025) में यह स्पष्ट किया है कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड केवल तभी पर्यावरण क्षतिपूर्ति वसूल सकते हैं, जब इसके लिए विधिक प्रावधानों के तहत नियम बनाए जाएं।

हाईकोर्ट ने कहा —

“जब तक ऐसी अधिसूचित नियमावली या विधिक व्यवस्था अस्तित्व में नहीं आती, तब तक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड किसी उद्योग से पर्यावरण क्षतिपूर्ति की मांग नहीं कर सकता।”

Rajasthan Highcourt से राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को बड़ा झटका, पर्यावरण क्षतिपूर्ति वसूलने के अधिकार पर दिया बड़ा फैसला ने यह भी कहा कि वर्तमान में जो राशि RSPCB द्वारा तय की जा रही है, वह केवल दिशा-निर्देशों पर आधारित है, जिनकी कोई कानूनी वैधता नहीं है। इस कारण से, बोर्ड द्वारा लगाए गए सभी आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।

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