जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने सरकारी विभागों में वर्षों से कार्यरत दैनिक वेतनभोगी और अस्थायी कर्मचारियों के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी स्वीकृत पद पर वर्षों तक निरंतर सेवा देता रहा है, उससे नियमित कर्मचारी की तरह कार्य लिया गया है और बाद में उसे नियमित किया गया है, तो उसकी प्रारंभिक सेवा अवधि को वरिष्ठता, पदोन्नति, वेतनमान और पेंशन जैसे सेवा लाभों से अलग नहीं किया जा सकता।
जस्टिस गणेश राम मीणा ने बाबूलाल मीणा बनाम राज्य सरकार मामले में यह अहम फैसला सुनाते हुए आदेश दिया कि याचिकाकर्ता बाबूलाल मीणा की सेवा 18 अक्टूबर 1986 से नियमित मानी जाए और वर्ष 1986 से 1992 तक की सेवा अवधि को सभी सेवा लाभों के लिए जोड़ा जाए।
हाईकोर्ट ने इस दौरान की गई सेवा को वरिष्ठता, पदोन्नति, चयन वेतनमान और पेंशन के लिए गणनीय माना है।
1986 से मामले की शुरुआत
याचिकाकर्ता बाबूलाल मीणा को पहली बार 18 अक्टूबर 1986 को क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी, जयपुर द्वारा क्लास-IV कर्मचारी के रूप में दैनिक वेतन पर नियुक्त किया गया था।
याचिकाकर्ता की नियुक्ति परिवहन विभाग के बरेठा चेक पोस्ट, जिला धौलपुर में हुई थी। यह नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत पद के विरुद्ध की गई थी।
नियुक्ति के बाद बाबूलाल मीणा ने बिना किसी ब्रेक के लगातार विभाग में सेवाएं दीं।
उन्हें समय-समय पर बरेठा चेक पोस्ट, धौलपुर, परिवहन कार्यालय, हिंडौन, पुनः बरेठा चेक पोस्ट तथा परिवहन आयुक्तालय, जयपुर मुख्यालय जैसे स्थानों पर ट्रांसफर किया गया।
ट्रांसफर से यह स्पष्ट था कि उनसे विभाग में स्थायी प्रकृति का कार्य लिया जा रहा था और वे विभाग की नियमित कार्यप्रणाली का अभिन्न हिस्सा बन चुके थे।
1992 में नियमितीकरण, लेकिन अधिकारों से वंचित
लगभग छह वर्षों तक निरंतर सेवा देने के बाद वर्ष 1992 में बाबूलाल मीणा को परिवहन विभाग द्वारा साक्षात्कार के लिए बुलाया गया।
इसके पश्चात 02 नवंबर 1992 को उन्हें नियमित रूप से क्लास-IV कर्मचारी के पद पर नियुक्त किया गया।
विवाद की शुरुआत
विभाग ने बाबूलाल मीणा की सेवा गणना 02.11.1992 से मानते हुए उनकी पूर्व सेवा अवधि 1986 से 1992 को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।
जिसके चलते याचिकाकर्ता की वरिष्ठता कम होने के साथ-साथ समय से पहले पदोन्नति का अवसर समाप्त हो गया और चयन वेतनमान तथा अन्य आर्थिक लाभ नहीं मिल सके।
वरिष्ठता सूची बनी विवाद
20 जून 2003 को परिवहन विभाग द्वारा एक वरिष्ठता सूची जारी की गई, जिसमें बाबूलाल मीणा का नाम क्रम संख्या 124 पर दर्शाया गया। इस सूची में उनकी नियुक्ति तिथि 02.11.1992 अंकित की गई।
याचिकाकर्ता ने इस पर आपत्ति दर्ज कराई और विभाग को न्याय की मांग नोटिस भेजा, लेकिन जब कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तब उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विजय पाठक ने हाईकोर्ट में विस्तृत और ठोस दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि बाबूलाल मीणा की प्रारंभिक नियुक्ति किसी अवैध या बैकडोर प्रक्रिया से नहीं हुई थी।
याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति स्वीकृत (Sanctioned) पद पर की गई थी। उनसे वर्षों तक वही कार्य लिया गया, जो नियमित कर्मचारियों से लिया जाता है और उन्हें नियमित कर्मचारियों की तरह स्थानांतरण का सामना करना पड़ा।
याचिका में राजस्थान क्लास-IV सेवा नियम, 1963 के नियम 5, 6, 18, 19 और 20 का हवाला देते हुए कहा गया कि अस्थायी या अधोहक सेवा को वरिष्ठता और प्रोबेशन में जोड़ा जाना चाहिए।
राज्य सरकार की आपत्तियां
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए कई आपत्तियां उठाईं। सरकार ने कहा कि याचिका में 11 वर्षों की देरी है और प्रारंभिक नियुक्ति दैनिक वेतन पर थी।
सरकार ने यह भी कहा कि वरिष्ठता केवल नियमित नियुक्ति की तिथि से ही मानी जा सकती है। साथ ही यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता को राहत देने से अन्य कर्मचारियों की वरिष्ठता प्रभावित होगी।
हाईकोर्ट का फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद कहा कि राज्य केवल नियोक्ता नहीं, बल्कि एक कल्याणकारी राज्य है। वर्षों तक किसी कर्मचारी से नियमित कार्य कराना और फिर उसे “अस्थायी” कहकर उसके अधिकार छीनना संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है।
कोर्ट ने टिप्पणी की—
“यदि कोई कर्मचारी स्वीकृत पद पर वर्षों तक कार्य करता है, तब उसे केवल नाम के लिए अस्थायी बताकर उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।”
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया, जिनमें—
उमादेवी बनाम कर्नाटक राज्य (2006)— जिसमें कहा गया कि यदि कर्मचारी ने 10 वर्षों से अधिक सेवा दी है और उसकी नियुक्ति अवैध नहीं है, तो उसके नियमितीकरण पर विचार होना चाहिए।
Jaggo बनाम भारत संघ (2024)— जिसमें अस्थायी कर्मचारियों के शोषण पर कड़ी टिप्पणी की गई।
Shripal बनाम नगर निगम (2025)— जिसमें कहा गया कि वर्षों तक स्थायी प्रकृति का कार्य कराने के बाद कर्मचारियों को अस्थायी बनाए रखना अन्यायपूर्ण है।
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाबूलाल मीणा की सेवा निरंतर रही और उनका कार्य स्थायी प्रकृति का था। वे किसी अवैध प्रक्रिया से नियुक्त नहीं हुए थे, इसलिए उनकी सेवा को 1986 से ही नियमित माना जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि बाबूलाल मीणा को 18 अक्टूबर 1986 से नियमित कर्मचारी माना जाए और 1986 से 1992 तक की सेवा वरिष्ठता में जोड़ी जाए।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को सभी पदोन्नति, वेतनमान और चयन ग्रेड के लाभ देने तथा उक्त अवधि को पेंशन योग्य सेवा मानने के आदेश दिए।
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही सेवानिवृत्ति के बाद सभी बकाया भुगतान करने का आदेश दिया है।