जोधपुर, 22 नवंबर
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दिव्यांगता के आधार पर MBBS में प्रवेश से वंचित की गई एक छात्रा के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की कार्रवाई को मनमाना, अवैध और संविधान के विपरीत करार दिया है।
DR. JUSTICE NUPUR BHATI की एकलपीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में स्पष्ट किया है कि NEET-UG 2025 के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) द्वारा मान्यता प्राप्त केंद्र द्वारा जारी विकलांगता प्रमाणपत्र को राज्य सरकार चुनौती नहीं दे सकती।
दिव्यांग सूची से किया बाहर
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता यशपाल खिलेरी ने पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि इस मामले में अभ्यर्थी को दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज (LHMC)-जो NMC द्वारा नामित 16 अधिकृत केंद्रों में से एक है-ने 28 जुलाई 2025 को PwBD (Persons with Benchmark Disabilities) श्रेणी के लिए उपयुक्त बताया था।
इसके बावजूद, राज्य ने एक दूसरा मेडिकल बोर्ड गठित कर अभ्यर्थी की ‘फंक्शनल क्षमता’ पर सवाल उठाते हुए उसे राज्य कोटा की दिव्यांग सूची से बाहर कर दिया था।
मेडिकल बोर्ड की ‘दूसरी राय’ अनुचित
राज्य सरकार ने 4 अगस्त 2025 को एक मेडिकल बोर्ड गठित कर सात अभ्यर्थियों की दोबारा जांच कराई, जिसमें याचिकाकर्ता अभ्यर्थी को भी MBBS पढ़ाई के लिए “फंक्शनली इनकंपिटेंट” बताया गया।
राज्य सरकार द्वारा गठित बोर्ड को हाईकोर्ट ने NMC के दिशानिर्देशों के अनुसार गठित नहीं होने बताया।
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार अपना अधिकृत PwBD मूल्यांकन बोर्ड बनाए बिना अभ्यर्थी को अयोग्य नहीं ठहरा सकती।
संविधान का उल्लंघन
हाईकोर्ट ने कहा कि मान्यता प्राप्त केंद्र द्वारा जारी प्रमाणपत्र राज्य पर भी बाध्यकारी है।
कोर्ट ने कहा कि राज्य द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया न केवल मनमानी और असंगत है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के तहत दिव्यांग व्यक्तियों को मिले अधिकारों का उल्लंघन भी करती है।
AIQ में मिला PwBD प्रमाणपत्र मान्य
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि MCC ने All India Quota (AIQ) की पहली और दूसरी काउंसलिंग में याचिकाकर्ता अभ्यर्थी को PwBD श्रेणी में मान्यता दी है।
चिकित्सा शिक्षा महानिदेशालय (DGHS) ने उसी प्रमाणपत्र को स्वीकार कर सरकारी मेडिकल कॉलेज कोटा में सीट भी आवंटित की।
इसके विपरीत, राज्य ने उसी प्रमाणपत्र को अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने इसे “पूर्णतः अन्यायपूर्ण और असंगत” बताया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई अहम निर्णयों-विशेषकर Om Rathod, Anmol vs Union of India, और Kabir Paharia—का हवाला देते हुए कहा कि दिव्यांग अभ्यर्थियों की फंक्शनल क्षमता की जांच पारदर्शी, वैज्ञानिक और निष्पक्ष होनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि “Reasonable Accommodation” एक मौलिक अधिकार है, दिव्यांग उम्मीदवारों को चिकित्सा शिक्षा से बाहर करना संविधान की भावना के विपरीत है।
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि किसी भी प्रकार की दूसरी राय तब तक मान्य नहीं होगी जब तक वह उचित तरीके से गठित राज्य मेडिकल बोर्ड द्वारा NMC दिशानिर्देशों के अनुरूप न की जाए।
हाईकोर्ट का आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने आदेश में राज्य सरकार की ‘सेकंड ओपिनियन’ रद्द करते हुए याचिकाकर्ता छात्रा को PwBD मेरिट सूची से बाहर करने को अवैध घोषित किया है।
हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि काउंसलिंग के दौरान अभ्यर्थी के लिए सुरक्षित रखी गई सीट उसकी मेरिट के अनुसार आवंटित की जाए।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता छात्रा को संबंधित मेडिकल कॉलेज में तुरंत प्रवेश देने के आदेश दिए हैं।
अदालत ने कहा कि राज्य का व्यवहार दिव्यांग अभ्यर्थियों के साथ संवैधानिक समानता के सिद्धांत के विरुद्ध है और ऐसे मामलों में संवेदनशीलता एवं कानून दोनों का पालन होना आवश्यक है।