जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम (RSRTC) से जुड़े कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि निगम अपनी वित्तीय कठिनाइयों का हवाला देकर कर्मचारियों के वैधानिक बकाया भुगतान से इनकार नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि निगम को अपने प्रशासन और वित्तीय प्रबंधन को सुधारना चाहिए, लेकिन कर्मचारियों को कुप्रबंधन या खराब प्रबंधन का खामियाजा भुगतने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि
यदि सरकार RSRTC के कुप्रबंधन को लेकर सतर्क है, तो उसे सबसे पहले निगम के प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए कदम उठाने चाहिए थे। चालक, परिचालक, सहायक तथा यांत्रिक कर्मचारी RSRTC की रीढ़ हैं, जो सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को बनाए रखने के लिए उत्तरदायी हैं।
जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने यह सख्त टिप्पणियां रोडवेज के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए की हैं।
कर्मचारी मोहन सिंह ने अपने साप्ताहिक अवकाश (वीकली रेस्ट) से संबंधित बकाया भुगतान दिलाने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने अगले दो माह में याचिकाकर्ता के बकाया राशि को ब्याज सहित भुगतान करने का आदेश दिया है।
ये है मामला
अधिवक्ता सुनील समदड़िया ने याचिकाकर्ता मोहन सिंह की ओर से दलीलें प्रस्तुत करते हुए कहा कि RSRTC में कार्यरत रहे मोहन सिंह को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेने के बाद भी उनके कई वैधानिक बकाया भुगतान प्राप्त नहीं हुए।
याचिका में कहा गया कि वर्ष 1998 से वर्ष 2011 के बीच उनके द्वारा साप्ताहिक अवकाश पर किए गए कार्य का बकाया भुगतान किया जाना था। रोडवेज द्वारा बकाया भुगतान नहीं करने पर कोर्ट का सहारा लिया।
जिसके बाद 12 दिसंबर 2015 को राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ में आयोजित राष्ट्रीय लोक अदालत में हुए समझौते के अनुसार निगम ने सभी देय भुगतान नियमों के अनुसार करने का आश्वासन दिया था, लेकिन इसके बावजूद कुछ बकाया राशि का भुगतान नहीं किया गया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि 1998 से 2011 के बीच साप्ताहिक अवकाश के बदले मिलने वाली राशि का भुगतान अभी तक लंबित है, जबकि संबंधित दस्तावेजों और प्रमाणपत्रों में इस भुगतान की पात्रता स्पष्ट रूप से दर्ज है।
निगम की दलील
निगम की ओर से अदालत में दलील दी गई कि निगम की वित्तीय स्थिति कमजोर है और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर भुगतान की प्राथमिकताएं तय की जाती हैं।
निगम ने अपने एक परिपत्र का हवाला देते हुए कहा कि पहले वेतन, पेंशन और अन्य आवश्यक खर्चों को प्राथमिकता दी जाती है, जिसके कारण कुछ भुगतान लंबित रह जाते हैं।
हालांकि अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि किसी भी कर्मचारी के वैधानिक अधिकारों को केवल वित्तीय कठिनाइयों के आधार पर रोका नहीं जा सकता।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियां
रोडवेज प्रशासन की ओर से दिए गए जवाब को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि
संभव है कि कुप्रबंधन, खराब प्रशासन या पेशेवर प्रबंधन के अभाव के कारण राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम (RSRTC) को वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा हो, परंतु इसका किसी ऐसे कर्मचारी के अधिकार और दावे से कोई संबंध नहीं है जिसने निगम में सेवा दी है और परिपत्र जारी होने से पहले ही सेवानिवृत्त हो चुका है।
कोर्ट ने कहा कि
केवल इस कारण कि रोडवेज वित्तीय कठिनाइयों का सामना कर रहा है, वह वर्तमान मामले में हुए समझौता पुरस्कार (Settlement Award) का पालन करने से बच नहीं सकता। किसी भी कर्मचारी के वैध दावे को इस आधार पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि RSRTC के पास भुगतान करने के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध नहीं है।
हाईकोर्ट ने बेहद सख्त शब्दों में कहा कि
यदि निगम वित्तीय संकट का सामना कर रहा है तो यह उसके प्रशासनिक या वित्तीय प्रबंधन की समस्या है, जिसका कर्मचारियों के वैधानिक अधिकारों से कोई संबंध नहीं है। अदालत ने कहा कि कर्मचारी वर्षों तक सेवा देने के बाद सेवानिवृत्त होते हैं और उनके वैधानिक बकाया भुगतान को रोकना न्यायसंगत नहीं है।