संयुक्त परिवार संपत्ति में अधिकार का दावा करने वाली याचिका निरस्त, कोर्ट ने कहा—जिसके खिलाफ कोई राहत नहीं मांगी गई, उसे मुकदमे में शामिल करना आवश्यक नहीं
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने भूमि विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी भी सिविल मुकदमे में वादी (Plaintiff) को यह अधिकार होता है कि वह तय करे कि किन व्यक्तियों को पक्षकार बनाया जाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि जिस व्यक्ति के खिलाफ कोई राहत नहीं मांगी गई है, उसे जबरन मुकदमे में पक्षकार नहीं बनाया जा सकता। इसी सिद्धांत के आधार पर कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की याचिका खारिज कर दी।
जस्टिस संजीत पुरोहित की एकलपीठ ने यह आदेश उदयपुर जिले के सुखेर गांव स्थित भूमि विवाद से जुड़े मामले में कुमारी रेखा और उनकी माता की ओर से दायर याचिका पर दिया है। दोनों की ओर से दायर याचिका में स्वयं को मुकदमे में आवश्यक पक्षकार बनाए जाने की मांग की गई थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।
क्या था मामला
यह विवाद उदयपुर जिले के गिरवा तहसील स्थित ग्राम सुखेर की भूमि से संबंधित है।
प्रतिवादी वेणी राम ने सुखेर गांव के पुराने खसरा नंबर 547 व 559 पर अपने लंबे कब्जे के आधार पर खातेदारी अधिकार घोषित करने, राजस्व रिकॉर्ड में संशोधन और स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया था।
इस मुकदमे में पक्षकार बनने के लिए याचिकाकर्ता कुमारी रेखा और उनकी माता ने भी आवेदन किया।
याचिकाकर्ताओं ने आवेदन देकर कहा कि वे स्व. देवा जी के परिवार के सदस्य हैं और भूमि संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति है, इसलिए मुकदमे के परिणाम से उनके अधिकार प्रभावित होंगे। इस आधार पर उन्होंने खुद को मुकदमे में पक्षकार बनाने की मांग की।
एसडीओ, गिरवा ने 30 अप्रैल 2012 को आदेश पारित करते हुए याचिकाकर्ताओं का पक्षकार बनाए जाने का आवेदन खारिज कर दिया, क्योंकि वादी ने उनके खिलाफ कोई राहत नहीं मांगी थी।
इस आदेश के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका भी 27 दिसंबर 2023 को राजस्व बोर्ड ने खारिज कर दी और कहा कि मुकदमे का निर्णय वर्तमान पक्षकारों के बीच ही किया जा सकता है।
इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर कहा कि वे मृतक जमनालाल के कानूनी उत्तराधिकारी हैं और भूमि पर उनका भी अधिकार है, इसलिए उन्हें आवश्यक पक्षकार माना जाए।
याचिकाकर्ता पक्ष की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि संबंधित भूमि संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति है और स्वर्गीय देवा जी की मृत्यु के बाद उनके दोनों पुत्रों—वेणी राम और जमनालाल—को इसमें अधिकार प्राप्त हुआ।
याचिकाकर्ता, जो जमनालाल के कानूनी उत्तराधिकारी हैं, ने कहा कि मुकदमे के परिणाम से उनके अधिकार प्रभावित होंगे, इसलिए उन्हें मुकदमे में आवश्यक पक्षकार (Necessary Party) के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।
अधिवक्ता ने कहा कि यदि उन्हें मुकदमे में शामिल नहीं किया गया तो भविष्य में अलग-अलग मुकदमेबाजी की स्थिति उत्पन्न होगी और अनावश्यक रूप से मुकदमों की संख्या बढ़ेगी।
याचिकाकर्ताओं का यह भी तर्क था कि निचली अदालत और पुनरीक्षण न्यायालय ने आदेश 1 नियम 10 सीपीसी के प्रावधानों पर सही ढंग से विचार नहीं किया और उनके अधिकारों की अनदेखी करते हुए आवेदन खारिज कर दिया।
प्रतिवादी पक्ष की दलीलें
प्रतिवादी की ओर से यह दलील दी गई कि मूल वादी ने अपने लंबे कब्जे के आधार पर खातेदारी अधिकार और स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया है और इस मुकदमे में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई राहत नहीं मांगी गई है। इसलिए उन्हें मुकदमे में पक्षकार बनाना आवश्यक नहीं है।
प्रतिवादी पक्ष की ओर से कहा गया कि सिविल कानून के स्थापित सिद्धांत के अनुसार वादी “डोमिनस लिटिस” होता है, अर्थात मुकदमे का स्वामी वही होता है और वही तय करता है कि किसे पक्षकार बनाया जाए।
प्रतिवादी पक्ष ने कहा कि किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके खिलाफ कोई राहत नहीं मांगी गई हो, वादी की इच्छा के विरुद्ध जबरन मुकदमे में शामिल नहीं किया जा सकता।
प्रतिवादी ने यह भी तर्क रखा कि यदि याचिकाकर्ताओं का भूमि पर कोई स्वतंत्र अधिकार है तो वे उसके लिए अलग से मुकदमा दायर कर सकते हैं, लेकिन वर्तमान मुकदमे में उनके अधिकारों का निर्धारण नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह मुकदमा केवल कब्जे के आधार पर खातेदारी अधिकार और निषेधाज्ञा से संबंधित है।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मूल वादी ने जो मुकदमा दायर किया है, वह केवल अपने कब्जे के आधार पर खातेदारी अधिकार और स्थायी निषेधाज्ञा से संबंधित है।
कोर्ट ने कहा कि इस मुकदमे में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई राहत नहीं मांगी गई है, इसलिए उनकी उपस्थिति मुकदमे के निर्णय के लिए आवश्यक नहीं है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ताओं का भूमि पर कोई स्वतंत्र अधिकार है, तो वे इसके लिए अलग से मुकदमा दायर कर सकते हैं, लेकिन वर्तमान मुकदमे में उन्हें केवल इस आधार पर पक्षकार नहीं बनाया जा सकता कि वे संयुक्त परिवार के सदस्य हैं।
कोर्ट ने अपने आदेश में “डोमिनस लिटिस” (Dominus Litis) सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि मुकदमे का मालिक वादी होता है और वही तय करता है कि किसके खिलाफ मुकदमा दायर किया जाए।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि
जब तक किसी व्यक्ति की उपस्थिति मुकदमे के प्रभावी और पूर्ण निर्णय के लिए आवश्यक न हो, उसे जबरन पक्षकार नहीं बनाया जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का हस्तक्षेप सीमित परिस्थितियों में ही किया जाता है। यदि निचली अदालतों के आदेश में कोई स्पष्ट कानूनी त्रुटि, अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन या गंभीर अन्याय नहीं दिखता, तो हाईकोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इस मामले में ऐसा कोई आधार नहीं पाया गया।
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने पाया कि बोर्ड ऑफ रेवेन्यू और निचली अदालत के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है, इसलिए याचिका निराधार है।
हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज करते हुए संबंधित आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया।