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राजस्थान में नदी बजरी खनन पर विस्तृत फैसला : 93 लीजें समाप्त, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी पर हाईकोर्ट सख्त, सरकारी समिति की रिपोर्ट को बताया “बिना सोच-विचार और यांत्रिक”

Rajasthan High Court Pulls Up State for Ignoring Supreme Court Directions on River Sand Mining

जयपुर। राजस्थान में नदी से बजरी खनन को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद पर राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) के निर्देशों का पालन कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि संवैधानिक और कानूनी बाध्यता है।

डॉ. बृजमोहन सपूत कला संस्कृति सेवा संस्थान द्वारा दायर याचिका पर यह फैसला 20 जनवरी को सुनाया गया था, जिसका विस्तृत फैसला शुक्रवार को जारी किया गया है।

यह भी पढ़िए: खनन पट्टों के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 93 लीजें समाप्त, अमानत राशि लौटाने के आदेश

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ

हाईकोर्ट ने कहा कि उसे खनन विभाग द्वारा अपनाए गए रुख पर आश्चर्य होता है, क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पूर्णतः विपरीत है।

हाईकोर्ट ने कहा कि न तो सीईसी (CEC) की रिपोर्ट में और न ही सुप्रीम कोर्ट के किसी आदेश में यह कहा गया है कि 100 हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल की खनन लीज़ के संबंध में कोई अलग व्यवस्था लागू होगी।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह अदालत के आदेशों की अवहेलना का स्पष्ट उदाहरण है।

हाईकोर्ट ने राज्य की 93 माइंस की लीज़ों की नीलामियों को निरस्त करते हुए कहा कि कोर्ट के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचता कि विभाग द्वारा संचालित उन सभी नीलामियों को निरस्त किया जाए, जिनके अंतर्गत 50 वर्षों या उससे अधिक अवधि के लिए खनन लीज़ प्रदान की गई हैं, जिससे नदी तल की समस्त रेत का लगभग पूर्ण निष्कासन हो जाता और पुनर्भरण (replenishment) की कोई व्यवस्था नहीं रहती।

93 लीजें समाप्त

इन 93 लीज़ों में टोंक ज़िले की 34 लीज़ें, भीलवाड़ा ज़िले की 46 लीज़ें, सवाई माधोपुर ज़िले की 4 लीज़ें तथा अजमेर ज़िले की 9 लीज़ें शामिल हैं।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि राज्य के अधिकारी सीईसी रिपोर्ट के पैरा 11(iii) के अनुसार एक विशिष्ट अभ्यास (exercise) करेंगे और एक विस्तृत योजना तैयार करेंगे, जिसे इस अदालत में पेश किया जाएगा।

इस योजना को विधिवत मंजूरी मिलने के बाद ही नीलामियाँ संचालित की जाएँगी। नीलामी के लिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि जिन ब्लॉकों में पूर्व में खनन हो चुका है, वहाँ पुनः रेत खनन न किया जाए। खनन कार्य पाँच ब्लॉकों में क्रमवार (blockwise) किया जाएगा, भले ही लीज़ का क्षेत्रफल 100 हेक्टेयर या उससे कम क्यों न हो।

हाईकोर्ट ने खनन विभाग को इस संपूर्ण कवायद को अगले चार माह में पूर्ण करने के आदेश दिए हैं। तब तक नीलामी के लिए चिह्नित स्थलों पर किसी भी प्रकार की रेत खनन गतिविधि की अनुमति नहीं दी जाएगी।

सरकार ने नहीं किया पालन

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार ने नदी बजरी खनन से संबंधित मामलों में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) की सिफारिशों की सही ढंग से पालना नहीं की गई है।

हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 11.11.2021 के आदेश द्वारा CEC की सिफारिशों को, सिफारिश संख्या ‘J’ को छोड़कर, तत्काल प्रभाव से लागू करने का आदेश दिया था।

जिसमें यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि—

“पाँच वर्ष की अवधि में जिन वार्षिक ब्लॉकों से एक बार बजरी का खनन किया जा चुका है, उन ब्लॉकों से पुनः बजरी का संग्रह नहीं किया जाएगा।”

यह है मामला

याचिकाकर्ता संस्था ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों की अवहेलना करते हुए नदी बजरी खनन के लिए ई-नीलामी की प्रक्रिया अपनाई।

याचिका के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने 19 फरवरी 2020 को राजस्थान में रेत खनन की स्थिति को “अत्यंत अराजक और पर्यावरण के लिए घातक” बताते हुए CEC को जाँच और रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया था।

CEC ने 23 दिसंबर 2020 को अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें नदी बजरी खनन के लिए सख्त शर्तें और प्रक्रिया तय की गई।

सुप्रीम कोर्ट ने 11 नवंबर 2021 को CEC की लगभग सभी सिफारिशों को स्वीकार करते हुए उन्हें तत्काल लागू करने का आदेश दिया।

इसके बावजूद, याचिका में आरोप लगाया गया कि राज्य सरकार ने 2024 के बाद भी ऐसे नदी बजरी खनन पट्टों की नीलामी कर दी, जिन क्षेत्रों में 2022, 2023 और 2024 में पहले ही खनन हो चुका था।

विवाद का केंद्र

CEC की रिपोर्ट के पैरा 11(iii) को इस पूरे विवाद की रीढ़ माना गया। इसमें स्पष्ट प्रावधान है कि नदी के पूरे पट्टा क्षेत्र को पाँच वार्षिक ब्लॉकों में बाँटा जाएगा।

जिन ब्लॉकों में एक बार खनन हो चुका हो, वहाँ पाँच वर्ष की अवधि में दोबारा बजरी नहीं निकाली जाएगी।

इसका उद्देश्य यह है कि राजस्थान जैसी अल्पवर्षा वाली जगहों पर नदी तल को प्राकृतिक पुनर्भरण (replenishment) के लिए पर्याप्त समय मिल सके।

सुप्रीम कोर्ट ने 11 नवंबर 2021 के आदेश में यह भी साफ कहा कि CEC की सिफारिशें, सिफारिश संख्या ‘J’ को छोड़कर, तत्काल प्रभाव से लागू होंगी।

याचिकाकर्ता की प्रमुख दलीलें

याचिकाकर्ता संस्था ने कोर्ट में दलील दी कि जिन 93 खनन पट्टों की ई-नीलामी की गई, वे पहले से ही पुराने खनन पट्टों का हिस्सा थे, जहाँ हाल के वर्षों में बजरी निकाली जा चुकी थी।

ऐसे में CEC रिपोर्ट के पैरा 11(iii)(f) का सीधा उल्लंघन हुआ। राजस्थान की अधिकांश नदियाँ मौसमी हैं, जिनमें हर साल रेत का पुनर्भरण नहीं होता।

याचिका में कहा गया कि अत्यधिक और अनियंत्रित खनन से नदी तल का क्षरण, भूजल स्तर में गिरावट, बाढ़ की तीव्रता में वृद्धि और जल संकट जैसी गंभीर समस्याएँ पैदा होती हैं।

याचिकाकर्ता ने इसे पर्यावरणीय आपदा की ओर धकेलने वाला कदम बताया।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि CEC की रिपोर्ट का पैरा 11(iii) केवल 2013 के पुराने LOI धारकों पर लागू होता है, न कि 2024 के बाद की नई नीलामियों पर।

नई नीति के तहत अधिकतम 100 हेक्टेयर क्षेत्र के छोटे पट्टे दिए जा रहे हैं, जहाँ वार्षिक ब्लॉक की अवधारणा लागू नहीं होती।

याचिका कथित रूप से तथ्यों को छुपाकर दाखिल की गई है और यह न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश और समिति

16 मई 2025 को हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को तीन वरिष्ठ अधिकारियों की समिति गठित करने का आदेश दिया था।

समिति को यह जाँच करनी थी कि सुप्रीम कोर्ट और CEC के निर्देशों का पालन हुआ है या नहीं।

समिति की रिपोर्ट पर सख्त टिप्पणी

जब समिति की रिपोर्ट कोर्ट में पेश हुई, तो हाईकोर्ट ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा—

रिपोर्ट एक जैसी भाषा में, बिना किसी स्वतंत्र विश्लेषण के तैयार की गई है।

अलग-अलग जिलों की रिपोर्ट एक ही दिन में हस्ताक्षरित मिलीं, जिससे स्पष्ट होता है कि मामलों पर व्यक्तिगत रूप से विचार नहीं किया गया।

समिति सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश की सही जाँच करने में असफल रही, जिसमें कहा गया था कि पहले खनन हो चुके ब्लॉकों से दोबारा बजरी नहीं निकाली जा सकती।

कोर्ट ने इसे “मशीनी और औपचारिक कार्रवाई” बताया।

हाईकोर्ट का आदेश

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश संपूर्ण राज्य पर लागू होते हैं, न कि किसी एक वर्ग या अवधि तक सीमित।

पर्यावरण से जुड़े मामलों में राज्य सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। यदि सरकारी समितियाँ केवल औपचारिकता निभाएँगी, तो न्यायालय हस्तक्षेप करने से पीछे नहीं हटेगा।

कोर्ट ने राज्य सरकार को भविष्य में CEC और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने के संकेत दिए।

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