जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने GST विवाद में जयपुर के होटल रेड फोर्ट को बड़ी राहत दी है। हाईकोर्ट ने होटल के खिलाफ करीब 49.45 लाख रुपये की जीएसटी डिमांड वाले आदेश को रद्द कर दिया है।
हाईकोर्ट ने पाया कि GST विभाग ने होटल को भेजा गया नोटिस गलत टैब/फोल्डर में डाल दिया था। होटल संचालक को इसकी जानकारी ही नहीं मिली और बिना उनका पक्ष सुने टैक्स की मांग तय कर दी गई।
दरअसल, GST विभाग ने कथित टैक्स देनदारी का भुगतान नहीं करने के आधार पर 49,45,053 रुपये की जीएसटी डिमांड तय की थी।
GST विभाग ने होटल के खिलाफ शो-कॉज नोटिस पोर्टल पर अपलोड किया था, लेकिन वह गलत टैब में पड़ा रहा। होटल को इसकी जानकारी नहीं मिली और वह समय पर अपना जवाब भी नहीं दे सका।
इसके बाद नोटिस का जवाब न मिलने पर विभाग ने टैक्स की बड़ी डिमांड वाला आदेश पास कर दिया।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस आशुतोष कुमार की खंडपीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति या कारोबारी से टैक्स की मांग तय करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का उचित मौका मिलना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने एम/एस होटल रेड फोर्ट और उसके अधिकृत पार्टनर रवि टाक की याचिका पर सुनवाई करते हुए 22 जनवरी 2025 का ऑरिजिनल ऑर्डर और 1 अगस्त 2024 का शो-कॉज नोटिस दोनों रद्द कर दिए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने विभाग को कानून के मुताबिक नया शो-कॉज नोटिस जारी कर कारोबारी को सुनवाई का मौका देने के बाद नया आदेश पास करने की छूट दी है।
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होटल संचालक को कार्रवाई की जानकारी ही नहीं
मामला जयपुर के होटल रेड फोर्ट से जुड़ा है। GST विभाग ने होटल के खिलाफ करीब 49 लाख 45 हजार 53 रुपए की टैक्स मांग तय की थी।
इससे पहले विभाग ने 1 अगस्त 2024 को होटल को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। इसके बाद 22 जनवरी 2025 को टैक्स की मांग से जुड़ा आदेश जारी कर दिया गया।
होटल संचालक का कहना था कि उसे न तो नोटिस मिला और न ही बाद में जारी आदेश की जानकारी दी गई। उसे इस पूरी कार्रवाई का पता काफी समय बाद चला।
होटल और उसके अधिकृत पार्टनर ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर 1 अगस्त 2024 के शो-कॉज नोटिस और उसके बाद 22 जनवरी 2025 को जारी ऑरिजिनल ऑर्डर को चुनौती दी।
पेनल्टी के फोन से नोटिस का पता चला
होटल की ओर से हाईकोर्ट को बताया गया कि करीब दो महीने पहले एक व्यक्ति ने खुद को जीएसटी विभाग का अधिकारी बताते हुए फोन किया और होटल संचालक से पेनल्टी जमा करने को कहा।
इस पर होटल संचालक को हैरानी हुई, क्योंकि उसके मुताबिक उसे इस जीएसटी कार्रवाई के मामले में कोई नोटिस या आदेश मिला ही नहीं था।
फोन करने वाले ने कारोबारी को जीएसटी कॉमन पोर्टल के “एडिशनल नोटिसेज एंड ऑर्डर्स” वाले हिस्से को देखने के लिए कहा।
जब कारोबारी ने पोर्टल चेक किया, तब उसे वहां शो-कॉज नोटिस दिखाई दिया।
इसके बाद पता चला कि उस नोटिस पर पहले ही कार्रवाई हो चुकी थी और 22 जनवरी 2025 को टैक्स की मांग का आदेश भी जारी हो चुका था।
यानी होटल संचालक के मुताबिक उसे उस समय तक यह पता ही नहीं था कि उसके खिलाफ जीएसटी की कार्यवाही चल रही है और उसके खिलाफ करीब 49 लाख रुपये की डिमांड भी तय हो चुकी है।
नोटिस गलत फोल्डर में डाल दिया
होटल की ओर से हाईकोर्ट में सबसे अहम सवाल यही उठाया गया कि जब नोटिस की जानकारी ही नहीं मिली तो अपना जवाब कैसे दिया जाता।
होटल के वकील ने कहा कि नोटिस जीएसटी पोर्टल पर ऐसे हिस्से में अपलोड किया गया, जहां होटल संचालक की नजर ही नहीं गई।
होटल की ओर से कहा गया कि शो-कॉज नोटिस मिलने के बाद जवाब देने और व्यक्तिगत सुनवाई का उचित अवसर नहीं दिया गया।
यह भी कहा कि जिन दस्तावेजों के आधार पर टैक्स की देनदारी तय की गई, वे भी उसे उपलब्ध नहीं कराए गए।
विभाग ने किया विरोध
सरकारी पक्ष ने कहा कि नोटिस और बाद में जारी किया गया आदेश दोनों जीएसटी पोर्टल पर अपलोड किए गए थे। दोनों के लिए अलग पहचान संख्या भी जारी की गई थी।
विभाग की दलील थी कि कानून के तहत जीएसटी पोर्टल पर नोटिस उपलब्ध कराना उसे भेजने का मान्य तरीका है।
विभाग का तर्क था कि रजिस्टर्ड टैक्सपेयर से उम्मीद की जाती है कि वह नियमित रूप से अपना जीएसटी पोर्टल चेक करे।
इसलिए होटल संचालक की जिम्मेदारी थी कि वह पोर्टल पर समय-समय पर नोटिस चेक करता रहे।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस मामले में विभाग की यह दलील स्वीकार नहीं की।
हाईकोर्ट ने पाया कि नोटिस गलत टैब में अपलोड हुआ था, जिसकी वजह से होटल को इसकी जानकारी नहीं मिल सकी
‘सही तरीके से नोटिस देना जरूरी’
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं का लगातार यह कहना था कि उन्हें शो-कॉज नोटिस की कोई जानकारी नहीं थी।
उन्हें बाद में पोर्टल पर जाकर पता चला कि नोटिस पहले ही जारी हो चुका है और उस पर फैसला भी हो गया है।
वहीं कोर्ट ने रिकॉर्ड को देखने के बाद पाया कि विभाग का जवाब मुख्य रूप से इसी बात पर टिका था कि नोटिस पोर्टल पर डाल दिया गया था।
लेकिन कोर्ट ने गौर किया कि नोटिस गलत टैब/फोल्डर में अपलोड किया गया था।
ऐसे में होटल संचालक को उसकी जानकारी नहीं मिली और वह समय पर अपना जवाब नहीं दे सका।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब नोटिस की जानकारी ही संबंधित व्यक्ति तक नहीं पहुंची तो उसके खिलाफ आगे की कार्रवाई करना उचित नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि होटल को अपना जवाब देने और व्यक्तिगत सुनवाई का मौका नहीं मिला।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब नोटिस ही ऐसी जगह अपलोड हुआ जहां संबंधित कारोबारी को उसकी जानकारी नहीं हो सकी, तो उसके जवाब न देने को यह मानकर नहीं देखा जा सकता कि उसने जानबूझकर कार्यवाही में हिस्सा नहीं लिया।
ऐसे में होटल के खिलाफ जारी टैक्स आदेश को कोर्ट ने सही नहीं माना, क्योंकि कार्रवाई से पहले होटल को अपनी बात रखने का मौका मिलना जरूरी था।
पुराना टैक्स आदेश और नोटिस दोनों रद्द
राजस्थान हाईकोर्ट ने अंत में होटल रेड फोर्ट की याचिका स्वीकार करते हुए 1 अगस्त 2024 के कारण बताओ नोटिस और 22 जनवरी 2025 के टैक्स आदेश दोनों को रद्द कर दिया।
इसका मतलब यह नहीं है कि हाईकोर्ट ने होटल को हमेशा के लिए करीब 49 लाख रुपए की टैक्स मांग से मुक्त कर दिया है।
हाईकोर्ट ने सिर्फ यह माना है कि मौजूदा कार्रवाई सही प्रक्रिया का पालन किए बिना की गई थी। इसलिए अब विभाग कानून के मुताबिक आगे की कार्रवाई कर सकता है।
हाईकोर्ट ने विभाग को नया कारण बताओ नोटिस जारी करने और होटल को अपना जवाब देने के साथ सुनवाई का उचित मौका देने की छूट दी है।
पहले के समन को सुनवाई का मौका नहीं माना
मामले में विभाग की ओर से पहले जारी किए गए एक समन का भी जिक्र हुआ।
होटल की ओर से बताया गया कि 16 जुलाई 2024 का समन 22 जुलाई को पेश होने के लिए था। जबकि जीएसटी का कारण बताओ नोटिस इसके बाद 1 अगस्त 2024 को जारी किया गया।
ऐसे में होटल की ओर से कहा गया कि जुलाई में जारी समन को अगस्त में जारी हुए कारण बताओ नोटिस पर जवाब देने का मौका नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने भी माना कि होटल को इस नोटिस पर जवाब देने और अपनी बात रखने का पूरा मौका नहीं मिला था।
अब नए सिरे से होगी GST की कार्रवाई
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अगर विभाग होटल से टैक्स की मांग करना चाहता है तो उसे नए सिरे से प्रक्रिया शुरू करनी होगी।
विभाग को नया कारण बताओ नोटिस जारी करना होगा और होटल को अपना जवाब देने का मौका देना होगा।
जरूरत होने पर व्यक्तिगत सुनवाई भी करनी होगी। इसके बाद ही विभाग नया आदेश जारी कर सकेगा।
यानी पुराने आदेश के आधार पर 49.45 लाख रुपए की टैक्स मांग फिलहाल लागू नहीं रहेगी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह तय नहीं किया है कि होटल पर वास्तव में कितना टैक्स बनता है।
हाईकोर्ट का ये फैसला सिर्फ इस बात पर है कि पहले होटल को सही तरीके से नोटिस देकर उसकी बात सुनना जरूरी था।
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस बाद पर भी जोर दिया कि जीएसटी की कार्यवाही ऑनलाइन होने का मतलब यह नहीं है कि टैक्सपेयर को सुनवाई का अधिकार भी खत्म हो जाएगा।
विभाग को नोटिस की प्रभावी सर्विस और कानून में तय प्रक्रिया का पालन करना होगा।