जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए 11 साल की मासूम नाबालिग से दुष्कर्म के गंभीर मामले में दोषी ठहराए गए आरोपी की सजा निलंबन (सस्पेंशन ऑफ सेंटेंस) की याचिका खारिज कर दी।
जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने यह आदेश दौसा के धानयाबांध निवासी याचिकाकर्ता विष्णु उर्फ विक्रम सहाय की ओर से दायर सजा निलंबन याचिका को खारिज करते हुए दिया है।
जिंदा रहने तक जेल की सजा
आरोपी याचिकाकर्ता को मासूम बालिका के साथ दुष्कर्म करने के मामले में दौसा की विशेष पॉक्सो कोर्ट ने वर्ष 2024 में जिंदा रहने तक, यानी प्राकृतिक जीवन की शेष अवधि तक की आजीवन कारावास और एक लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी।
पॉक्सो कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा के खिलाफ अपील लंबित रहने के चलते आरोपी ने हाईकोर्ट में सजा निलंबन की याचिका दायर की है।
याचिका में दावा किया गया कि पीड़िता की उम्र 11 वर्ष से कम होने का पर्याप्त प्रमाण नहीं है और चिकित्सकीय साक्ष्य भी आरोपों की पुष्टि नहीं करते। साथ ही यह भी कहा गया कि दोनों पक्षों के बीच पुरानी रंजिश होने के कारण उसे झूठा फंसाया गया है।
आरोपी के बचाव में दलीलें
आरोपी की ओर से अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता की उम्र 11 वर्ष से कम मानते हुए कठोर सजा सुनाई, लेकिन उम्र संबंधी निष्कर्ष पर्याप्त और ठोस साक्ष्यों पर आधारित नहीं है।
अधिवक्ता ने कहा कि उम्र निर्धारण में संदेह होने के कारण आरोपी को कम से कम सजा निलंबन का लाभ दिया जाना चाहिए।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि दुष्कर्म के आरोपों की चिकित्सकीय पुष्टि स्पष्ट रूप से नहीं हुई है। मेडिकल रिपोर्ट में आरोपों का पूर्ण समर्थन नहीं मिलने के कारण दोषसिद्धि पर पुनर्विचार आवश्यक है। इसलिए अपील लंबित रहने तक आरोपी को जेल में रखना न्यायसंगत नहीं माना जाना चाहिए।
इसके अतिरिक्त बचाव पक्ष ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच पुरानी रंजिश है और इसी कारण आरोपी को झूठा फंसाया गया है।
बचाव पक्ष के अनुसार पूर्व विवादों के चलते शिकायत दर्ज कराई गई और आरोपी को साजिश के तहत मामले में घसीटा गया। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत से अनुरोध किया गया कि अपील के अंतिम निर्णय तक आरोपी की सजा निलंबित कर दी जाए।
सरकार ने किया सख्त विरोध
राज्य सरकार की ओर से GA cum AAG राजेश चौधरी ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए दलील दी कि ट्रायल कोर्ट का निर्णय ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों पर आधारित है।
अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि पीड़िता का जन्म प्रमाणपत्र रिकॉर्ड पर मौजूद है, जिसके आधार पर उसकी उम्र 11 वर्ष से कम सिद्ध होती है और ट्रायल कोर्ट ने इसी साक्ष्य पर भरोसा किया है।
GA cum AAG राजेश चौधरी ने यह भी कहा कि पीड़िता ने अपने बयान में आरोपी के खिलाफ कई बार दुष्कर्म किए जाने के स्पष्ट और सुसंगत आरोप लगाए हैं। उसका बयान सुसंगत और विश्वसनीय है, जिसे अदालत ने स्वीकार किया है।
डीएनए रिपोर्ट का हवाला
सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में राज्य सरकार ने डीएनए रिपोर्ट का उल्लेख किया।
अधिवक्ता ने कहा कि जांच के दौरान पीड़िता के कपड़ों से प्राप्त वीर्य के नमूनों की डीएनए प्रोफाइल आरोपी के रक्त नमूने से मेल खाती है, जो आरोपी की संलिप्तता का मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण है। इस तरह मामले में केवल मौखिक साक्ष्य ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक साक्ष्य भी आरोपी के खिलाफ मौजूद हैं।
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि आरोप अत्यंत गंभीर हैं और आरोपी को पहले ही ट्रायल कोर्ट द्वारा आजीवन कारावास की सजा दी जा चुकी है। ऐसे मामलों में सजा निलंबन केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दिया जाता है, जबकि इस मामले में ऐसी कोई परिस्थिति मौजूद नहीं है। इसलिए आरोपी को किसी भी प्रकार की राहत नहीं दी जानी चाहिए।
हाईकोर्ट का आदेश
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों, विशेष रूप से डीएनए रिपोर्ट और पीड़िता के बयान को देखते हुए आरोपी को राहत देने का कोई आधार नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और सरकार की ओर से दी गई दलीलों को सुनने के बाद पाया कि पीड़िता के कपड़ों पर मिले वीर्य के नमूनों की डीएनए प्रोफाइल आरोपी के रक्त नमूने से मेल खाती है, जो मामले में मजबूत वैज्ञानिक साक्ष्य है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरोपों की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों की गंभीरता को देखते हुए आरोपी को सजा निलंबन का लाभ देना उचित नहीं होगा।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में, जहां पीड़िता नाबालिग हो और वैज्ञानिक साक्ष्य आरोपी की संलिप्तता दर्शाते हों, वहां सजा निलंबन के लिए असाधारण परिस्थितियों का होना आवश्यक है, जो इस मामले में नहीं पाया गया।