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अंतरिम भरण-पोषण मुकदमे की लंबित अवधि में आर्थिक कठिनाई से राहत देने के लिए अस्थायी व्यवस्था, इसे अधिकार या अंतिम राशि का अंतिम निर्धारण नहीं माना जा सकता।

Rajasthan High Court Refuses to Interfere in Interim Maintenance Order, Dismisses Husband and Wife’s Revision Petitions

राजस्थान हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: घरेलू हिंसा मामले में 40 हजार अंतरिम भरण-पोषण बरकरार, पति–पत्नी दोनों की रिवीजन याचिकाएं खारिज

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने एक महत्वपूर्ण वैवाहिक विवाद मामले में अंतरिम भरण-पोषण (इंटरिम मेंटेनेंस) से जुड़े आदेश को बरकरार रखते हुए पति और पत्नी—दोनों की पुनरीक्षण (रिवीजन) याचिकाओं को खारिज कर दिया।

जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने कहा कि अंतरिम भरण-पोषण का उद्देश्य अंतिम अधिकार तय करना नहीं, बल्कि मुकदमे के दौरान आर्थिक कठिनाई से राहत देना है, इसलिए निचली अदालतों द्वारा विवेकाधिकार का प्रयोग स्पष्ट रूप से गलत या मनमाना साबित न होने पर उसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

जस्टिस फरजंद अली ने अपने आदेश में अंतरिम भरण-पोषण (Interim Maintenance) से संबंधित विधिक सिद्धांतों को विस्तार से स्पष्ट करते हुए कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 23 या अन्य संबंधित प्रावधानों के तहत दिया जाने वाला अंतरिम भरण-पोषण पूरी तरह न्यायालय के विवेकाधिकार पर आधारित होता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह विवेकाधिकार मनमाना नहीं, बल्कि पक्षकारों की आय, संपत्ति, दायित्वों और प्रस्तुत दस्तावेजों के प्रारंभिक मूल्यांकन पर आधारित न्यायिक विवेक है। इस स्तर पर अदालत विस्तृत साक्ष्य परीक्षण नहीं करती, बल्कि केवल प्रथम दृष्टया परिस्थितियों को देखकर अस्थायी राहत प्रदान करती है।

अंतरिम आदेश अंतिम अधिकार का निर्धारण नहीं

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अंतरिम भरण-पोषण का आदेश अंतिम अधिकार या अंतिम राशि का निर्धारण नहीं होता। यह आदेश केवल मुकदमे की अवधि के दौरान लागू रहने वाला अस्थायी प्रबंध होता है और अंतिम निर्णय साक्ष्यों के पूर्ण परीक्षण के बाद ही तय किया जाता है।

अंतरिम भरण-पोषण का उद्देश्य

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि अंतरिम भरण-पोषण का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मुकदमे के लंबित रहने के दौरान आश्रित पक्ष आर्थिक कठिनाई या अभाव की स्थिति में न पहुंचे।

कोर्ट ने कहा कि यह किसी पक्ष की आय में साझेदारी देना या दूसरे पक्ष को दंडित करना नहीं है, बल्कि केवल जीवन-निर्वाह की न्यूनतम सुरक्षा प्रदान करना है।

हस्तक्षेप का आधार नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि निचली अदालत ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर विवेकाधिकार का उचित प्रयोग किया है, तो केवल इस कारण कि कोई अन्य राशि भी संभव थी, हाईकोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। हस्तक्षेप तभी उचित है, जब आदेश स्पष्ट रूप से मनमाना, अवैध या गंभीर त्रुटि से ग्रस्त हो।

रिवीजन क्षेत्राधिकार की सीमाएं

हाईकोर्ट ने कहा कि पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र (Revisional Jurisdiction) अत्यंत सीमित होता है।

हाईकोर्ट इस स्तर पर तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन कर निचली अदालत के विवेकाधिकार को अपने विवेक से प्रतिस्थापित नहीं कर सकता, जब तक कि आदेश में स्पष्ट कानूनी त्रुटि या अन्याय न हो।

विवादित तथ्य अंतिम सुनवाई में तय होंगे

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी के घर छोड़ने के कारण, क्रूरता के आरोप, आय-व्यय की वास्तविक स्थिति और अंतिम भरण-पोषण की उचित राशि जैसे प्रश्न साक्ष्यों के आधार पर अंतिम सुनवाई में तय होंगे, न कि अंतरिम चरण में।

यह है मामला

पति-पत्नी का विवाह 11 मई 2011 को हुआ था और उनकी एक पुत्री है। वैवाहिक विवाद उत्पन्न होने के बाद वर्ष 2021 से दोनों अलग-अलग रहने लगे। पत्नी ने वर्ष 2022 में घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत आवेदन दायर कर अंतरिम भरण-पोषण की मांग की।

निचली अदालत ने दोनों पक्षों के आय-व्यय संबंधी दस्तावेजों और परिस्थितियों का मूल्यांकन करते हुए पत्नी के पक्ष में ₹40,000 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण मंजूर किया था।

इस आदेश के खिलाफ पति ने राशि कम करने की मांग करते हुए अपील की, जबकि पत्नी ने इसे अपर्याप्त बताते हुए राशि बढ़ाने की मांग की। अपीलीय अदालत ने दोनों अपीलें खारिज कर दीं, जिसके बाद दोनों पक्ष हाईकोर्ट पहुंचे।

पति और पत्नी की दलीलें

पति की ओर से तर्क दिया गया कि पत्नी बिना उचित कारण के घर छोड़कर गई और उस पर लगाए गए आरोप निराधार हैं।

साथ ही यह भी कहा गया कि वह पहले से ही नाबालिग पुत्री की जिम्मेदारी निभा रहा है, इसलिए ₹40,000 प्रति माह का अंतरिम भरण-पोषण उसके लिए अत्यधिक आर्थिक बोझ है।

वहीं पत्नी की ओर से कहा गया कि उसे मानसिक, शारीरिक और आर्थिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा तथा उसके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है।

उसने अदालत को बताया कि वह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से भी गुजर रही है और पति की वास्तविक आय अधिक होने के बावजूद उसे छिपाया गया है, इसलिए भरण-पोषण राशि बढ़ाई जानी चाहिए।

हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि अंतरिम भरण-पोषण का निर्णय प्रारंभिक और अस्थायी प्रकृति का होता है। इसका उद्देश्य मुकदमे के अंतिम निर्णय से पहले किसी भी पक्ष—विशेष रूप से आश्रित जीवनसाथी—को आर्थिक कठिनाई से बचाना है।

हाईकोर्ट ने कहा कि पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र (रिवीजनल जूरिस्डिक्शन) सीमित होता है और केवल तब हस्तक्षेप किया जा सकता है, जब निचली अदालत का आदेश स्पष्ट रूप से मनमाना, अवैध या गंभीर त्रुटिपूर्ण हो। इस मामले में ऐसा कोई आधार सामने नहीं आया, इसलिए आदेश में बदलाव का कोई कारण नहीं है।

दोनों रिवीजन याचिकाएं खारिज

हाईकोर्ट ने पति द्वारा राशि कम करने और पत्नी द्वारा राशि बढ़ाने—दोनों मांगों को अस्वीकार करते हुए दोनों पुनरीक्षण याचिकाओं को खारिज कर दिया। साथ ही ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत लंबित मुख्य प्रकरण का अंतिम निस्तारण छह माह के भीतर करने का प्रयास किया जाए, ताकि विवाद का शीघ्र समाधान हो सके।

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