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Big Breaking : 15 अप्रैल तक होंगे हर हाल में पंचायत चुनाव, राजस्थान हाईकोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप से किया इनकार, कहा चुनाव प्रक्रिया प्रभावित नहीं कर सकते

Rajasthan High Court Rejects All Petitions Against Panchayati Raj Institutions Reorganisation

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पंचायती राज संस्थाओं के पुनर्गठन को लेकर दायर की गई 60 से अधिक याचिकाओं पर अहम फैसला सुनाया है।

राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने इस मामले से संबंधित सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि न्यायिक हस्तक्षेप के कारण चुनावी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, जिसे किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी 15 अप्रैल तक चुनाव कराना तय कर दिया हैं ऐसे में पंचायतो के पुर्नगठन के मामले में इस स्तर पर हस्तक्षेप करने से चुनाव प्रक्रिया प्रभावित होगी

जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस रवि चिरानिया की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता बालू सहित करीब 60 से ​अधिक याचिकाओं को एक साथ खारिज करते हुए कहा कि इस विषय पर पहले ही निर्णय दिया जा चुका है और सुप्रीम कोर्ट भी इस प्रकरण में अपनी व्यवस्था दे चुका है।

हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने कहा कि पंचायती राज संस्थाओं का पुनर्गठन एक नीतिगत और प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसमें हाईकोर्ट का अत्यधिक हस्तक्षेप चुनावी प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से विलंबित कर सकता है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि हर चुनाव से पहले इस तरह की याचिकाओं पर हस्तक्षेप किया जाए, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित होगी और समयबद्ध चुनाव कराना मुश्किल हो जाएगा।

खंडपीठ ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि इसी प्रकरण से जुड़े मुद्दों पर पूर्व में हाईकोर्ट द्वारा फैसला दिया जा चुका है। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में अपनी स्पष्ट व्यवस्था दे चुका है, ऐसे में दोबारा उन्हीं तथ्यों और तर्कों के आधार पर याचिकाओं पर सुनवाई का कोई औचित्य नहीं बनता।

याचिकाकर्ताओं की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई थी कि पंचायती राज संस्थाओं के पुनर्गठन में नियमों और प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया है। उनका कहना था कि परिसीमन और पुनर्गठन से कई क्षेत्रों में असमानता उत्पन्न हो रही है, जिससे स्थानीय प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है। साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि पुनर्गठन की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है।

हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। खंडपीठ ने कहा कि प्रशासनिक स्तर पर लिए गए फैसलों की वैधता को चुनौती देने के लिए ठोस और नए आधार होने चाहिए, जो इस मामले में सामने नहीं आए।

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