जोधपुर, 2 दिसंबर
राजस्थान हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्ति से जुड़े एक मामले में जन्मतिथि में बदलाव को लेकर महत्वपूर्ण आदेश दिया है।
जस्टिस मुनुरी लक्ष्मण की एकलपीठ ने स्पष्ट किया है कि सेवानिवृत्ति के निकट आते समय अपनी जन्मतिथि में बदलाव या संशोधन करवाना न तो उचित है और न ही कानून के अनुसार विधि-सम्मत।
एकलपीठ ने याचिकाकर्ता वाहन चालक लच्छीराम की रिट याचिका को खारिज करते हुए कहा कि नियुक्ति के समय पेश किए गए दस्तावेज ही सेवानिवृत्ति के लिए भी सत्य माने जाएंगे, न कि सेवानिवृत्ति से पूर्व अचानक प्रस्तुत किया गया नया प्रमाणपत्र।
1988 में हुई थी नियुक्ति
याचिकाकर्ता लच्छीराम राजस्थान पशु एवं पशुपालन विश्वविद्यालय (राजूवास), बीकानेर के अंतर्गत वल्लभ नगर, उदयपुर में वाहन चालक के पद पर कार्यरत है।
वर्ष 1988 में उसकी नियुक्ति चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में उसके स्कूल दस्तावेजों और प्रमाणपत्रों के आधार पर की गई थी।
इन सभी दस्तावेजों में उसकी जन्मतिथि 18.05.1964 दर्ज है।
इन्हीं दस्तावेजों को आधार मानकर पशु विश्वविद्यालय ने वर्ष 2013 में उसे वाहन चालक के पद पर पदोन्नत किया। वरिष्ठता सूची में भी यही तिथि दर्ज रही।
तीन दशक बाद जन्मतिथि में परिवर्तन का दावा
वर्ष 2021 में लच्छीराम ने विश्वविद्यालय को प्रार्थना-पत्र देकर यह दावा किया कि उसकी वास्तविक जन्मतिथि 18.05.1969 है और उसने इसके समर्थन में डुप्लीकेट स्थानांतरण प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत किया।
पशु विश्वविद्यालय ने इस प्रमाणपत्र को संदिग्ध और अवैध मानते हुए पुराने दस्तावेजों को ही सही माना और उसे 31.05.2024 से सेवानिवृत्त करने का आदेश 04.11.2023 को जारी किया।
इस आदेश को चुनौती देते हुए लच्छीराम ने हाईकोर्ट से कहा कि उसकी जन्मतिथि में त्रुटि रही है, इसलिए अदालत 1964 की जगह 1969 मानकर उसकी सेवानिवृत्ति आगे बढ़ाए।
33 साल बाद बदलाव असंगत: विश्वविद्यालय
सुनवाई के दौरान राजूवास की ओर से अधिवक्ता प्रमेन्द्र बोहरा ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि कर्मचारी ने 1988 में जो दस्तावेज दिए, नियुक्ति उन्हीं के आधार पर हुई थी।
पदोन्नति, वरिष्ठता सूची, वाहन चालक लाइसेंस, आधार कार्ड, पहचान पत्र—सभी में जन्मतिथि 18.05.1964 ही दर्ज है। नियुक्ति के 33 वर्ष बाद जन्मतिथि बदलने का दावा कानूनन अस्वीकार्य है।
अधिवक्ता प्रमेन्द्र बोहरा ने हाईकोर्ट में तर्क दिया सेवानिवृत्ति के समय जन्मतिथि बदलना भी कदापि उचित नहीं, क्योंकि ऐसा संशोधन नियुक्ति के समय ही किया जा सकता था।
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की
हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय के तर्कों से सहमति जताते हुए लच्छीराम की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि सेवानिवृत्ति में नियुक्ति के समय प्रस्तुत दस्तावेज ही अंतिम माने जाएंगे, सेवानिवृत्ति के समय जन्मतिथि बदलवाने का प्रयास अवैध, अनुचित और अस्वीकार्य है।