हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका को “frivolous और merit-less” बताते AFT के फैसले पर लगाई मुहर
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने केंद्र सरकार द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए सेना के एक पूर्व जवान को बड़ी राहत दी है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल फैसले में स्पष्ट किया है कि सेना में सेवा के दौरान लगी चोट या बीमारी के कारण डिस्चार्ज किए गए सैनिकों को विकलांगता पेंशन में “राउंडिंग ऑफ” (Broad Banding) का लाभ मिलना उनका वैधानिक अधिकार है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई सैनिक सेवा के दौरान लगी चोट या बीमारी के कारण डिस्चार्ज होता है और उसकी विकलांगता 20% या उससे अधिक है, तो उसे 50% मानकर पेंशन दी जाएगी।
हाईकोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार की 31 जनवरी 2001 की अधिसूचना के अनुसार, 20% से अधिक विकलांगता होने पर उसे 50% माना जाएगा।
राजस्थान हाईकोर्ट ने Armed Forces Tribunal (AFT), जयपुर के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें पूर्व सैनिक की 30 प्रतिशत विकलांगता को 50 प्रतिशत मानते हुए पेंशन देने के निर्देश दिए गए थे।
जस्टिस इंदरजीत सिंह और जस्टिस रवि चिरानिया की खंडपीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट केंद्र सरकार की याचिका को खारिज करते हुए दिया है।
सेना के जवान की कहानी
मामले के अनुसार, प्रतिवादी सुरेंद्र कुमार भारतीय सेना की Army Educational Corps (AEC) में क्लर्क (GD/HD) के रूप में 8 जून 1984 को भर्ती हुए थे। लंबी सेवा के दौरान उन्हें नायब सूबेदार के पद पर पदोन्नति भी मिली।
9 जुलाई 2003 को ड्यूटी के दौरान एक सड़क दुर्घटना में उनके सिर में गंभीर चोट आई।
उनका इलाज सैन्य अस्पताल में हुआ और Court of Inquiry में यह स्पष्ट रूप से पाया गया कि यह चोट सेना सेवा के दौरान और ड्यूटी पर रहते हुए लगी थी, यानी यह सेवा से संबंधित (attributable to military service) थी।
करीब 26 वर्ष की सेवा पूरी करने के बाद उन्हें पहले सेवा विस्तार दिया गया, लेकिन अंततः 29 फरवरी 2012 को चिकित्सा आधार पर सेवा से मुक्त कर दिया गया।
मेडिकल बोर्ड ने उनकी विकलांगता 30 प्रतिशत आंकी और उसी आधार पर विकलांगता पेंशन स्वीकृत की गई।
AFT में दी गई चुनौती
पूर्व सैनिक ने मेडिकल बोर्ड के आधार पर दिए गए पेंशन के फैसले को Armed Forces Tribunal, जयपुर में चुनौती दी।
जिसमें विकलांगता पेंशन को 30% से बढ़ाकर 50% किए जाने का अनुरोध किया।
AFT ने 15 मार्च 2022 को पूर्व सैनिक के पक्ष में फैसला देते हुए पेंशन बढ़ाने के आदेश दिए और कहा कि केंद्र सरकार की 31 जनवरी 2001 की अधिसूचना के अनुसार, 20% से अधिक विकलांगता होने पर उसे 50% माना जाएगा।
केंद्र सरकार की दलील
AFT के आदेश से असंतुष्ट होकर केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में सरकार की ओर से कहा गया कि पूर्व सैनिक को पहले ही 30% विकलांगता पेंशन दी जा रही है।
50% तक “राउंडिंग ऑफ” का लाभ सभी मामलों में लागू नहीं होता और AFT ने तथ्यों और नियमों का सही आकलन नहीं किया।
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि MoD की 2017 की अधिसूचना के अनुसार यह लाभ सीमित रूप से लागू होता है।
सेना के जवान का पक्ष
अधिवक्ता दिव्येश माहेश्वरी ने प्रतिवादी सेना के रिटायर्ड जवान सुरेंद्र कुमार की ओर से पैरवी करते हुए कहा कि AFT ने तथ्यों और नियमों का सही आकलन करते हुए फैसला दिया है।
अधिवक्ता ने केंद्र सरकार की याचिका को सारहीन बताते हुए खारिज करने का अनुरोध किया।
अधिवक्ता ने कहा कि जो कानूनी बिंदु पहले ही सुप्रीम कोर्ट तय कर चुका है, उसे केंद्र ने याचिका के जरिए कोर्ट में लाकर केवल कानून का दुरुपयोग किया है।
हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख
दोनों पक्षों की दलीलें और बहस सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट में जस्टिस इंदरजीत सिंह और जस्टिस रवि चिरानिया ने केंद्र सरकार की सभी दलीलों को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि 31 जनवरी 2001 की केंद्र सरकार की अधिसूचना ऐसे मामलों में पूरी तरह लागू होती है।
यदि कोई सैनिक सेवा के दौरान लगी चोट या बीमारी के कारण डिस्चार्ज होता है और उसकी विकलांगता 20% या उससे अधिक है, तो उसे 50% मानकर पेंशन दी जाएगी।
इस सिद्धांत को सुप्रीम कोर्ट पहले ही कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला दिया, जिनमें प्रमुख हैं Union of India v. Ram Avtar (2014), Dharamvir Singh v. Union of India (2013), Bijender Singh v. Union of India (2025) शामिल हैं।
इन सभी फैसलों में यह सिद्धांत स्थापित किया गया है कि—
“सेना में भर्ती के समय जवान को स्वस्थ माना जाता है। यदि सेवा के दौरान कोई बीमारी या चोट होती है और उसके कारण डिस्चार्ज किया जाता है, तो यह माना जाएगा कि वह बीमारी या चोट सेवा से जुड़ी है। इसका उल्टा साबित करने का भार सरकार पर होता है, न कि सैनिक पर।”
‘अब यह मुद्दा res integra नहीं’
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस कानूनी बिंदु को सुप्रीम कोर्ट पहले ही तय कर चुका है, ऐसे में “विकलांगता पेंशन को 50 प्रतिशत तक राउंडिंग ऑफ करने का मुद्दा अब res integra (खुला प्रश्न) नहीं रह गया है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि
इसके बावजूद केंद्र सरकार द्वारा बार-बार ऐसी याचिकाएं दायर करना अनावश्यक मुकदमेबाजी को बढ़ावा देता है, खासकर तब जब मामला सेना के घायल पूर्व जवान से जुड़ा हो।
सरकार की याचिका ‘बिना आधार’
हाईकोर्ट ने माना कि सरकार यह साबित करने में पूरी तरह असफल रही कि पूर्व सैनिक की विकलांगता सेवा से संबंधित नहीं थी। मेडिकल बोर्ड और Court of Inquiry दोनों ने चोट को सेवा से जुड़ा माना था। ऐसे में 50% पेंशन न देना नियमों और न्याय—दोनों के खिलाफ है।
हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका को “frivolous और merit-less” बताते हुए खारिज कर दिया और AFT के आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा।