जोसेफ शाइन फैसले का प्रभाव पूर्वव्यापी, धारा 497 IPC के तहत दर्ज सभी लंबित आपराधिक कार्यवाहियां स्वतः निरस्त होंगी
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने व्यभिचार (Adultery) से जुड़े कानून को लेकर एक बार फिर ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक घोषित किए जाने के बाद उसके तहत दर्ज न केवल नए, बल्कि पहले से पेंडिंग सभी आपराधिक मामलों का भी कोई कानूनी अस्तित्व नहीं रह जाता।
ऐसे मामलों को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ के जस्टिस आनंद शर्मा ने याचिकाकर्ता एक स्कूली छात्र की ओर से दायर याचिका पर रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए यह फैसला सुनाया है।
इसके साथ ही राजस्थान हाईकोर्ट ने धारा 482 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ व्यभिचार के आरोप में चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जोसेफ शाइन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले को सीमित या भविष्य प्रभावी घोषित नहीं किया था। इसलिए, यह फैसला पूर्वव्यापी (Retrospective) रूप से सभी पेंडिंग मुकदमों पर भी लागू होगा।
ये हैं पूरा मामला
मामले के अनुसार, जयपुर निवासी स्कूली छात्र के खिलाफ वर्ष 2013 में थाना वैशाली नगर, जयपुर (दक्षिण) में मुकदमा दर्ज कराया गया था।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी, जो जयपुर के एक निजी स्कूल में शिक्षिका थी, ने अपने ही छात्र के साथ अवैध शारीरिक संबंध स्थापित किए।
शिकायत के आधार पर पुलिस ने धारा 497 आईपीसी (व्यभिचार) के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की।
हालांकि, जांच के बाद पुलिस ने यह पाते हुए कि आरोप केवल संदेह और अनुमान पर आधारित हैं, छात्र के पक्ष में फाइनल नेगेटिव रिपोर्ट कोर्ट में पेश की।
इस रिपोर्ट में कहा गया कि आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिले हैं।
ट्रायल कोर्ट और एडीजे कोर्ट का रुख
पुलिस की नकारात्मक रिपोर्ट को ट्रायल कोर्ट मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, जयपुर ने 16 दिसंबर 2014 को स्वीकार कर लिया।
जिसके खिलाफ शिकायतकर्ता ने एडीजे कोर्ट में निगरानी याचिका दायर की। एडीजे कोर्ट ने मामले को पुनः विचार के लिए ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया।
मामले के पुनर्विचार के बाद, ट्रायल कोर्ट ने 20 फरवरी 2017 को अनुज शर्मा के खिलाफ धारा 497 आईपीसी के तहत संज्ञान ले लिया।
इस आदेश को अनुज शर्मा ने एडीजे कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 20 नवंबर 2018 को एडीजे कोर्ट ने अनुज शर्मा की याचिका खारिज कर दी।
इसी बीच सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
मामले की सुनवाई के दौरान ही एक बड़ा संवैधानिक बदलाव सामने आया जब एडल्टरी को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया।
27 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन मानते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि व्यभिचार को अपराध मानने वाला कानून लैंगिक समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है।
इसके साथ ही धारा 198 दंड प्रक्रिया संहिता, जो व्यभिचार के मामलों में शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया से संबंधित थी, उसे भी निरस्त कर दिया गया।
हाईकोर्ट में मुख्य विवाद का मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद याचिकाकर्ता छात्र ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर यह सवाल उठाया कि जब धारा 497 को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया है, तो उसके तहत पहले से चल रहे आपराधिक मामलों का क्या होगा।
राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्य प्रभावी (Prospective) है और 27 सितंबर 2018 से पहले दर्ज मामलों पर लागू नहीं होता। इसलिए, 2013 में दर्ज एफआईआर और 2017 में लिया गया संज्ञान वैध है।
हाईकोर्ट ने किया स्पष्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया।
जस्टिस आनंद शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि—
“जब किसी दंडात्मक प्रावधान को असंवैधानिक घोषित किया जाता है, तो वह प्रारंभ से ही शून्य (Void ab initio) माना जाता है। ऐसे कानून के आधार पर कोई भी अभियोजन न तो जारी रह सकता है और न ही वैध ठहराया जा सकता है।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जोसेफ शाइन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले को सीमित या भविष्य प्रभावी घोषित नहीं किया था। इसलिए, यह फैसला पूर्वव्यापी (Retrospective) रूप से सभी लंबित मामलों पर लागू होगा।
अन्य हाईकोर्ट के फैसलों का भी हवाला
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में तेलंगाना, पंजाब एवं हरियाणा, बॉम्बे, पटना और दिल्ली हाईकोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया, जिनमें यह स्पष्ट किया गया था कि धारा 497 आईपीसी के निरस्त होने के बाद उसके तहत लंबित मामलों को जारी रखना कानूनन असंभव है।
अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा कानून को असंवैधानिक घोषित करने के बाद, न केवल नए बल्कि पुराने और लंबित मामलों का भी स्वतः अंत हो जाता है।
कोर्ट का अंतिम आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने इसके साथ ही याचिकाकर्ता छात्र के खिलाफ दिए गए ट्रायल कोर्ट के 20 फरवरी 2017 और एडीजे कोर्ट के 20 नवंबर 2018 के आदेश को रद्द करते हुए एडल्टरी से जुड़ी एफआईआर से जुड़ी संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है।