टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

अदालतें जांच की दिशा बता सकती हैं, तरीका नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट

Court Can Order Further Investigation but Cannot Dictate Method, Says Rajasthan High Court

आपराधिक मामले में अदालत जांच एजेंसी को यह निर्देश नहीं दे सकती कि जांच किस विशेष तरीके से की जाए।

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने एक महत्वपूर्ण आपराधिक मामले में स्पष्ट किया है कि अदालत किसी मामले में आगे की जांच (Further Investigation) का आदेश तो दे सकती है, लेकिन जांच किस तरीके से की जाए, इसका आदेश देना अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।

जस्टिस संदीप शाह की एकलपीठ ने इस संबंध में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए चित्तौड़गढ़ की सीजेएम कोर्ट द्वारा जांच एजेंसी को जांच “विशेष तरीके से” करने के आदेश को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया।

ये है मामला

मामला चित्तौड़गढ़ के एक आपराधिक प्रकरण से जुड़ा था, जिसमें शिकायतकर्ता ने आरोपी महावीर सेठिया पर धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक षड्यंत्र जैसे गंभीर आरोप लगाए थे।

आरोप था कि याचिकाकर्ता ने बैंक खातों और हस्ताक्षरित चेकों का दुरुपयोग कर लाखों रुपये का गबन किया।

पुलिस जांच के बाद अंतिम रिपोर्ट (नेगेटिव एफआर) दाखिल की गई, जिसमें कहा गया कि आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले।

शिकायतकर्ता की प्रोटेस्ट याचिका पर ट्रायल कोर्ट ने पुलिस की अंतिम रिपोर्ट नामंजूर करते हुए आगे की जांच का आदेश दिया।

साथ ही कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि विवादित चेक और हस्तलिपि के हस्ताक्षरों की एफएसएल जांच कराई जाए और उसी आधार पर आगे रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।

ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती

याचिकाकर्ता आरोपी महावीर सेठिया ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में कहा कि अदालत आगे जांच का आदेश दे सकती है, लेकिन जांच किस तरीके से हो, इसके लिए विशेष निर्देश देना जांच एजेंसी के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप है।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और कानून का परीक्षण करते हुए कहा कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) के प्रावधानों के अनुसार जांच करने का तरीका पूरी तरह जांच एजेंसी के विवेक और अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत केवल यह देख सकती है कि जांच निष्पक्ष और कानून के अनुसार हो रही है या नहीं, परंतु जांच की दिशा या तकनीकी प्रक्रिया तय नहीं कर सकती।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता उमेश कांत व्यास ने पैरवी करते हुए कहा कि पुलिस जांच पूरी करने के बाद अंतिम रिपोर्ट (नेगेटिव एफआर) दाखिल कर चुकी थी, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि शिकायतकर्ता के आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।

जांच के दौरान जिन गवाहों के बयान महत्वपूर्ण बताए गए थे, उन्होंने शिकायतकर्ता के आरोपों का समर्थन नहीं किया। इसलिए आगे किसी विशेष प्रकार की जांच कराने की आवश्यकता नहीं थी।

अधिवक्ता ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट को यदि जांच अधूरी लगती थी तो वह आगे जांच का आदेश दे सकता था, लेकिन जांच किस प्रकार से की जाए, जैसे कि विवादित चेक और हस्तलिपि के हस्ताक्षरों की एफएसएल जांच कराने का निर्देश देना अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

जांच करने का तरीका और साक्ष्य एकत्र करने की प्रक्रिया पूरी तरह जांच एजेंसी के अधिकार क्षेत्र में आती है।

जांच एजेंसी के अधिकार क्षेत्र

अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अदालत जांच एजेंसी को किसी विशेष दिशा में जांच करने या किसी विशेष प्रकार का साक्ष्य एकत्र करने का आदेश नहीं दे सकती।

ऐसा करना जांच एजेंसी के अधिकार क्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप माना जाएगा। इसलिए ट्रायल कोर्ट और पुनरीक्षण अदालत द्वारा दिए गए निर्देशों को निरस्त किया जाना चाहिए।

याचिकाकर्ता ने यह स्पष्ट किया कि वह आगे की जांच के आदेश को चुनौती नहीं दे रहा है, बल्कि केवल उस हिस्से को चुनौती दे रहा है जिसमें जांच एजेंसी को जांच “विशेष तरीके से” करने के निर्देश दिए गए हैं।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य की ओर से पेश अधिवक्ता ने ट्रायल कोर्ट के आदेश का आंशिक समर्थन करते हुए कहा कि यदि अदालत को जांच अधूरी लगती है तो उसे आगे जांच का आदेश देने का अधिकार है।

हालांकि, सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि जांच के तरीके के संबंध में विस्तृत निर्देश देने का प्रश्न अलग कानूनी विचार का विषय है।

शिकायतकर्ता/प्रतिवादी की ओर से अधिवक्ता ने तर्क दिया कि पुलिस द्वारा की गई जांच अपूर्ण और सतही थी। शिकायतकर्ता ने पहले ही जांच अधिकारियों से हस्ताक्षरों की एफएसएल जांच कराने का अनुरोध किया था, लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया। इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा एफएसएल जांच कराने और आगे जांच करने का निर्देश देना उचित और न्यायोचित था।

शिकायतकर्ता ने यह भी कहा कि जब महत्वपूर्ण दस्तावेजों की सत्यता विवादित हो और जांच एजेंसी आवश्यक वैज्ञानिक जांच न करे, तब अदालत का यह दायित्व बनता है कि वह निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक निर्देश दे। इसलिए ट्रायल कोर्ट और पुनरीक्षण अदालत का आदेश सही है और इसे बरकरार रखा जाना चाहिए।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की दलीलें और बहस सुनने के बाद जस्टिस संदीप शाह की एकलपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि अपराध की जांच कार्यपालिका यानी पुलिस का विशेष क्षेत्र है और न्यायालय का कार्य जांच पूरी होने के बाद साक्ष्यों के आधार पर न्यायिक निर्णय देना है।

यदि अदालत जांच के तरीके तय करने लगे तो इससे निष्पक्ष जांच और ट्रायल की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का आगे जांच कराने का आदेश सही है, लेकिन जांच किस प्रकार से की जाए, विशेष रूप से हस्ताक्षरों की एफएसएल जांच कराने जैसे निर्देश देना न्यायिक अधिकार सीमा से बाहर है।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और पुनरीक्षण अदालत के आदेश को आंशिक रूप से निरस्त करते हुए यह स्पष्ट किया कि आगे की जांच जांच एजेंसी स्वतंत्र रूप से और कानून के अनुसार करेगी।\

सबसे अधिक लोकप्रिय