जयपुर, 9 फरवरी। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने किरायेदारी विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी संयुक्त किरायेदार (Joint Tenant) के विरुद्ध पारित बेदखली (Eviction) डिक्री सभी संयुक्त किरायेदारों और उनके उत्तराधिकारियों पर समान रूप से लागू होगी, भले ही उन्हें मुकदमे में अलग से पक्षकार न बनाया गया हो।
हाईकोर्ट ने कहा कि संयुक्त किरायेदारी एक अविभाज्य अधिकार है और इसके उत्तराधिकारी अलग-अलग स्वतंत्र किरायेदार नहीं माने जा सकते।
जस्टिस बिपिन गुप्ता की एकलपीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट छाया सेठी व अन्य की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए किया है।
ये है मामला
एक विवादित संपत्ति को वर्ष 1949 में मकान मालिक जितेन्द्र बोहरा के पिता बालकिशन द्वारा दो व्यक्तियों—जमनालाल और बंशीधर—को किराये पर दी गई थी।
दोनों मूल किरायेदारों की मृत्यु के बाद उनके परिवारजन/उत्तराधिकारी उसी परिसर में रहने लगे, लेकिन किराया न देने और कब्जा न छोड़ने के कारण मकान मालिकों ने बेदखली तथा किराया बकाया का मुकदमा दायर किया।
इस मुकदमे में रेंट ट्रिब्यूनल ने 16 जनवरी 2016 को मकान मालिक जितेन्द्र बोहरा व अन्य के पक्ष में बेदखली डिक्री पारित कर दी, जो बाद में अंतिम हो गई क्योंकि इसे चुनौती नहीं दी गई।
बाद में डिक्री के निष्पादन (Execution) के दौरान कुछ उत्तराधिकारियों ने यह कहते हुए आपत्ति उठाई कि उन्हें मूल मुकदमे में पक्षकार नहीं बनाया गया, इसलिए डिक्री उनके खिलाफ लागू नहीं हो सकती।
रेंट ट्रिब्यूनल तथा अपीलीय ट्रिब्यूनल दोनों ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया, जिसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।
याचिका में दलीलें
याचिकाकर्ता छाया सेठी व अन्य की ओर से अधिवक्ता अशोक मेहता ने पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि वे मूल किरायेदार के उत्तराधिकारी हैं और सह-किरायेदार (Co-tenant) होने के कारण उन्हें मुकदमे में शामिल किए बिना डिक्री लागू नहीं की जा सकती।
उनका यह भी दावा था कि संपत्ति का मौखिक रूप से विक्रय हुआ था, इसलिए मकान मालिकों की डिक्री निष्पादन योग्य नहीं है।
उन्होंने दलील दी कि राजस्थान रेंट कंट्रोल कानून के अनुसार यदि संपत्ति में कई सह-किरायेदार हों, तो सभी को मुकदमे में शामिल करना आवश्यक है, अन्यथा डिक्री अपूर्ण मानी जाएगी।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि मूल किरायेदारों की मृत्यु के बाद उनके परिवार के सदस्य संयुक्त रूप से उसी मकान में रह रहे थे और वे सभी किरायेदारी अधिकारों के उत्तराधिकारी हैं।
इसलिए जब तक उन्हें औपचारिक रूप से मुकदमे में शामिल नहीं किया जाता, तब तक उनके खिलाफ निष्पादन कार्यवाही (Execution Proceedings) नहीं की जा सकती।
इसके अतिरिक्त याचिकाकर्ताओं ने एक और दावा किया कि पूर्व में संपत्ति के संबंध में मौखिक रूप से बिक्री (Oral Sale) का समझौता हुआ था, जिसके कारण मकान मालिकों का स्वामित्व विवादित है।
उनका कहना था कि इस तथ्य को छिपाकर मकान मालिकों ने डिक्री प्राप्त की, इसलिए यह डिक्री वैध नहीं है और इसके निष्पादन पर रोक लगाई जानी चाहिए।
मकान मालिक की दलीलें
मामले में सुनवाई के दौरान मकान मालिक जितेन्द्र बोहरा की ओर से अधिवक्ता अमोल व्यास, पुलकित अरोड़ा और देवन पारीक ने दलीलें देते हुए कहा कि विवादित संपत्ति मूल रूप से दो व्यक्तियों—जमनालाल और बंशीधर—को किराये पर दी गई थी और उनके निधन के बाद उनके सभी उत्तराधिकारी संयुक्त किरायेदार (Joint Tenants) के रूप में उसी किरायेदारी में शामिल हो गए।
कानून के अनुसार संयुक्त किरायेदारी एक ही इकाई होती है, इसलिए किसी एक संयुक्त किरायेदार के खिलाफ दायर बेदखली वाद और पारित डिक्री सभी उत्तराधिकारियों पर बाध्यकारी होती है।
मकानमालिक की ओर से यह भी कहा गया कि बेदखली की डिक्री वर्ष 2016 में पारित होकर अंतिम हो चुकी है और निचली अदालतों ने याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों को पहले ही खारिज कर दिया है। ऐसे में निष्पादन की प्रक्रिया को रोकने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
अधिवक्ता ने अनुरोध किया कि निचली अदालतों के समानांतर निष्कर्षों (Concurrent Findings) में हस्तक्षेप न किया जाए क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का अधिकार सीमित है।
मौखिक बिक्री के दावे को भी पूरी तरह निराधार बताते हुए कहा कि अचल संपत्ति का हस्तांतरण केवल पंजीकृत दस्तावेज से ही वैध होता है, इसलिए ऐसा कोई दावा डिक्री के निष्पादन को रोकने का आधार नहीं बन सकता।
हाईकोर्ट का फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में कहा कि मूल किरायेदार की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी स्वतंत्र सह-किरायेदार नहीं बनते, बल्कि संयुक्त किरायेदार (Joint Tenants) के रूप में उसी एक किरायेदारी में सम्मिलित रहते हैं।
इस कारण यदि किसी एक संयुक्त किरायेदार के खिलाफ बेदखली की कार्यवाही होती है और डिक्री पारित होती है, तो वह अन्य सभी संयुक्त किरायेदारों पर भी बाध्यकारी होती है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि संयुक्त किरायेदारी एक ही इकाई है, इसमें अलग-अलग हिस्सों में विभाजन नहीं माना जाता। इसलिए सभी उत्तराधिकारियों को अलग-अलग पक्षकार बनाना आवश्यक नहीं है।
मौखिक बिक्री का दावा भी खारिज
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए मौखिक बिक्री (Oral Sale) के दावे को भी अस्वीकार कर दिया और कहा कि अचल संपत्ति का हस्तांतरण केवल पंजीकृत दस्तावेज से ही मान्य होता है।
बिना पंजीकृत दस्तावेज के मौखिक बिक्री का दावा डिक्री को चुनौती देने का आधार नहीं बन सकता।
2001 के किराया कानून की व्याख्या
हाईकोर्ट ने राजस्थान रेंट कंट्रोल एक्ट, 2001 की परिभाषा का उल्लेख करते हुए कहा कि इस कानून में “हर उत्तराधिकारी” को स्वतः किरायेदार का दर्जा नहीं दिया गया है।
इसलिए ऐसे उत्तराधिकारी जो कानून में निर्धारित श्रेणी में नहीं आते, वे स्वतंत्र किरायेदारी अधिकार का दावा नहीं कर सकते और उनके नाम पर डिक्री की वैधता प्रभावित नहीं होती।
अनुच्छेद 227 के तहत सीमित हस्तक्षेप
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब निचली अदालतों और अपीलीय न्यायाधिकरण दोनों ने तथ्यों के आधार पर एक समान निष्कर्ष दिए हों, तो संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का हस्तक्षेप बहुत सीमित होता है और केवल स्पष्ट कानूनी त्रुटि होने पर ही हस्तक्षेप किया जा सकता है। इस मामले में ऐसा कोई आधार नहीं पाया गया।