मृत मजदूर की आय पर आश्रित माता-पिता भी मुआवजा पाने के हकदार, श्रमिक मुआवजा कानून से जुड़ा बड़ा फैसला
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने श्रमिक मुआवजा कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए बड़ा फैसला दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि माता-पिता मृत कर्मचारी की आय पर आंशिक या पूर्ण रूप से निर्भर थे तो वे भी मुआवजा पाने के पात्र हो सकते हैं।
हाईकोर्ट ने वर्कमेन कम्पनसेशन कमिश्नर, सिरोही द्वारा वर्ष 2006 में दिए गए उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मृतक युवती के माता-पिता के मुआवजे के दावे को केवल इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि वे “डिपेंडेंट” की श्रेणी में नहीं आते।
जस्टिस संदीप शाह की एकलपीठ ने लेबर कमिश्नर के फैसले को रद्द करते हुए मामले को दोबारा विचार के लिए कमिश्नर के पास भेजते हुए छह माह में पुनः निर्णय करने का आदेश दिया।
27 साल पहले हुई थी कार्यस्थल पर मौत
मामले में अपीलकर्ता पिता की 17 वर्षीय मजदूर बेटी नानू की मौत 27 साल पहले जून 1999 में सिरोही में सार्वजनिक निर्माण विभाग द्वारा चलाए जा रहे एक फेमिन वर्क के दौरान हो गई थी।
ग्रेवल सड़क निर्माण के दौरान मजदूरी करते समय युवती नानू ट्रैक्टर की चपेट में आने से दुर्घटना का शिकार हो गई थी।
आरोप था कि ट्रैक्टर चालक ने लापरवाही से वाहन चलाया, जिससे युवती ट्रैक्टर से गिर गई और उसके ऊपर वाहन चढ़ने से उसकी मौके पर ही मौत हो गई।
घटना के बाद आईपीसी की धाराओं 279 और 304-ए के तहत एफआईआर भी दर्ज हुई थी।
बेटी की मृत्यु के बाद पिता और माता की ओर से वर्कमेन कम्पनसेशन के तहत मुआवजे के लिए आवेदन किया गया।
आवेदन में कहा गया कि उनकी बेटी मजदूरी करके लगभग 1800 रुपये प्रतिमाह कमाती थी तथा उसके माता-पिता उसकी आय पर निर्भर थे। इस आधार पर वर्कमेन कम्पनसेशन एक्ट के तहत 2.50 लाख रुपये मुआवजा और ब्याज की मांग की गई थी।
कमिश्नर का फैसला और विवाद
साल 2006 में वर्कमेन कम्पनसेशन कमिश्नर ने माता-पिता का दावा खारिज करते हुए कहा कि मृतका विवाहित थी और उसके माता-पिता कानून की परिभाषा के अनुसार “डिपेंडेंट” नहीं माने जा सकते, इसलिए उन्हें मुआवजा नहीं दिया जा सकता।
साथ ही यह भी कहा गया कि मृतका के कथित पति ने मुआवजा लेने से इनकार कर दिया था, इसलिए दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अपीलकर्ता पिता की दलीलें
पिता रावताराम और उनकी पत्नी ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर कर लेबर कमिश्नर के निर्णय में गंभीर कानूनी त्रुटि बताते हुए कहा कि वर्कमेन कम्पनसेशन एक्ट की धारा 2(1)(d) के अनुसार माता-पिता भी “डिपेंडेंट” की श्रेणी में आ सकते हैं, यदि वे मृत कर्मचारी की आय पर निर्भर हों।
पिता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि कमिश्नर ने मामले में कई मुद्दे तय किए थे, लेकिन उन मुद्दों पर कोई विस्तृत निर्णय नहीं दिया और बिना साक्ष्यों पर विचार किए ही दावा खारिज कर दिया।
अपीलकर्ताओं ने यह भी कहा कि मृतका की शादी होने का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं था। राशन कार्ड, पहचान पत्र, मृत्यु प्रमाण पत्र और अन्य सरकारी दस्तावेजों में मृतका को पिता की बेटी के रूप में ही दर्शाया गया था।
कानून की गलत व्याख्या
मृतका के माता-पिता (अपीलकर्ताओं) ने हाईकोर्ट में कमिश्नर के आदेश को चुनौती देते हुए कई महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं पर दलील दी कि वर्कमेन कम्पनसेशन एक्ट, 1923 की धारा 2(1)(d) के अनुसार माता-पिता भी मृत कर्मचारी के “डिपेंडेंट” माने जा सकते हैं, यदि वे उसकी आय पर आंशिक या पूर्ण रूप से निर्भर हों।
इसलिए केवल इस आधार पर दावा खारिज करना कि वे माता-पिता हैं, कानून की गलत व्याख्या है।
अपीलकर्ताओं ने कहा कि कमिश्नर ने मामले में कई मुद्दे तय किए थे, जिनमें मुख्य मुद्दा यह था कि क्या माता-पिता मृतका की आय पर निर्भर थे, लेकिन इन मुद्दों पर कोई स्पष्ट निर्णय नहीं दिया गया।
साक्ष्य रिकॉर्ड होने के बावजूद मुद्दों पर विचार किए बिना दावा खारिज कर देना न्यायिक प्रक्रिया के विपरीत है।
अपीलकर्ताओं ने यह भी कहा कि प्रतिवादियों ने मृतका को विवाहित बताकर गलत तथ्य पेश किए। राशन कार्ड, पहचान पत्र, मृत्यु प्रमाण पत्र, एफआईआर और अन्य सरकारी दस्तावेजों में मृतका को पिता की बेटी के रूप में ही दर्शाया गया था, जिससे स्पष्ट होता है कि शादी का दावा सिद्ध नहीं था।
अपीलकर्ताओं ने अपने बयान में कहा कि वे आर्थिक रूप से कमजोर थे और मृतका की मजदूरी की आय पर निर्भर थे। इसलिए उन्हें मुआवजा मिलना चाहिए।
अपीलकर्ताओं ने यह भी कहा कि कमिश्नर ने जिस न्यायिक निर्णय पर भरोसा किया वह मोटर वाहन अधिनियम से संबंधित था, जबकि वर्तमान मामला वर्कमेन कम्पनसेशन एक्ट से जुड़ा था। इसलिए उस मिसाल का उपयोग गलत था।
सार्वजनिक निर्माण विभाग और निजी ठेकेदारों का जवाब
मामले में मुख्य विभाग, जिसके तहत फेमिन कार्य चल रहा था, सार्वजनिक निर्माण विभाग था। साथ ही विभाग द्वारा निजी ठेकेदारों से काम लिया जा रहा था।
ऐसे में दलीलें देते हुए विभाग ने कहा कि मृतका उनके सीधे रोजगार में नहीं थी और उसका रोजगार ठेकेदार के माध्यम से था, इसलिए वे मुआवजे के लिए जिम्मेदार नहीं हैं।
निजी प्रतिवादियों ने कहा कि मृतका की शादी हो चुकी थी और उसका पति ही मुआवजे का वास्तविक दावेदार है। इसलिए माता-पिता मुआवजे के पात्र नहीं हैं।
निजी ठेकेदारों ने यह भी कहा कि मृतका के कथित पति ने उनसे समझौता कर लिया था और मुआवजा लेने की इच्छा नहीं जताई थी, इसलिए दावा स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
प्रतिवादियों ने कमिश्नर के आदेश का समर्थन करते हुए कहा कि उन्होंने कानून के अनुसार ही निर्णय दिया है और उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की बहस और दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वर्कमेन कम्पनसेशन एक्ट एक कल्याणकारी कानून है और इसकी व्याख्या कर्मचारियों तथा उनके परिवारों के हित में की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून की परिभाषा के अनुसार यदि माता-पिता मृत कर्मचारी की आय पर निर्भर थे तो उन्हें भी डिपेंडेंट माना जाएगा और मुआवजे का दावा करने का अधिकार होगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि कमिश्नर ने साक्ष्यों और दस्तावेजों का विश्लेषण किए बिना ही निर्णय दे दिया और मुद्दों पर कोई स्पष्ट निष्कर्ष नहीं दिया। इसे अदालत ने गंभीर प्रक्रिया संबंधी त्रुटि माना।
हाईकोर्ट ने कहा कि मृतका विवाहित थी या नहीं, यह केवल बयान के आधार पर तय नहीं किया जा सकता; इसके लिए उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण आवश्यक है।
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने इस मामले में लेबर कमिश्नर का आदेश रद्द करते हुए मामले को पुनः विचार के लिए भेजने का आदेश दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि लेबर कमिश्नर का निर्णय बिना किसी कारण के था। हाईकोर्ट स्वयं इस मामले में निर्णय कर सकता है, लेकिन साक्ष्यों का परीक्षण कमिश्नर स्तर पर हुआ है, इसलिए पुनः विचारार्थ वर्कमेन कम्पनसेशन कमिश्नर, सिरोही के पास भेजा जाता है।
हाईकोर्ट ने लेबर कमिश्नर को आदेश दिया है कि दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर प्रदान करते हुए तथा समस्त साक्ष्यों पर विचार करते हुए, इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से छह माह की अवधि के भीतर नया निर्णय पारित करेगा।