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पट्टा जारी करने का अधिकार स्थायी लोक अदालत को नहीं, आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर- Rajasthan Highcourt

Rajasthan High Court Rules: Permanent Lok Adalat Has No Authority to Grant Land Patta

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने स्थायी लोक अदालत के क्षेत्राधिकार सीमा को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि स्थायी लोक अदालत (Permanent Lok Adalat) को पट्टा जारी करने, स्वामित्व तय करने या संपत्ति अधिकारों से जुड़े किसी भी विवाद में आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है।

हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि लोक अदालतें न तो सिविल कोर्ट का विकल्प हैं और न ही वे जटिल भूमि एवं राजस्व विवादों का निस्तारण कर सकती हैं।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने बीकानेर की स्थायी लोक अदालत द्वारा पारित उस आदेश को पूरी तरह अधिकार क्षेत्र से बाहर मानते हुए रद्द कर दिया, जिसमें एक निजी व्यक्ति के पक्ष में पट्टा जारी करने और मुआवजा देने के आदेश दिए गए थे।

हाईकोर्ट ने अपने रिपोर्टेबल फैसले में स्पष्ट किया कि भूमि अधिकारों का फैसला संक्षिप्त मंचों से नहीं, बल्कि विधिवत न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा।

ये है पूरा मामला

UIT बीकानेर और एक निजी व्यक्ति के बीच हुए जमीन के पट्टे के विवाद के मामले में संबंधित व्यक्ति ने स्थायी लोक अदालत, बीकानेर में आवेदन कर एक भू-खंड का पट्टा जारी करने की मांग की थी।

लोक अदालत ने 17 जनवरी 2018 को आदेश पारित करते हुए न केवल पट्टा जारी करने बल्कि मुआवजा देने के भी आदेश दिए।

इस आदेश को UIT बीकानेर ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।

UIT बीकानेर की दलीलें

हाईकोर्ट में दायर की गई याचिका में UIT बीकानेर की ओर से दलील दी गई कि जिस भूमि के संबंध में पट्टा मांगा गया है, वह भूमि UIT के नाम म्यूटेशन में दर्ज ही नहीं है, ऐसे में पट्टा जारी करना कानूनन असंभव और नियमों के विपरीत है।

UIT ने यह भी कहा कि स्थायी लोक अदालत ने अपने सीमित अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करते हुए ऐसा आदेश पारित किया, जो केवल सक्षम सिविल या राजस्व अदालत ही दे सकती है।

हाईकोर्ट की दो टूक

राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले की विस्तृत सुनवाई के दौरान लीगल सर्विसेज अथॉरिटीज एक्ट, 1987 की धाराओं का विश्लेषण करते हुए कहा कि स्थायी लोक अदालतों की स्थापना का उद्देश्य सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं से जुड़े विवादों का त्वरित और पूर्व-वाद समाधान करना है।

कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि बाद में “हाउसिंग और रियल एस्टेट सेवाओं” को सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं की श्रेणी में जोड़ा गया, लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं निकाला जा सकता कि भूमि का स्वामित्व तय करना, पट्टा जारी करना, टाइटल, उत्तराधिकार या दस्तावेजों की वैधता पर निर्णय देना भी लोक अदालतों के अधिकार क्षेत्र में आ जाता है।

पट्टा कोई साधारण प्रशासनिक कार्य नहीं

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि पट्टा जारी करना कोई साधारण सेवा या औपचारिक प्रक्रिया नहीं है। इसके पीछे कई गंभीर और जटिल प्रश्न जुड़े होते हैं, जैसे वास्तविक स्वामी कौन है, क्या कोई तीसरे पक्ष का दावा मौजूद है, दस्तावेज वैध हैं या नहीं, या क्या उत्तराधिकार या हस्तांतरण से अधिकार उत्पन्न हुए हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि इन सभी प्रश्नों का निर्णय गंभीर सिविल परिणाम पैदा करता है और इनके लिए पूरी विधिक प्रक्रिया, साक्ष्य और सुनवाई आवश्यक होती है।

त्वरित न्याय के नाम पर कानून से समझौता नहीं

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायालय त्वरित न्याय की आवश्यकता को समझता है, लेकिन त्वरित न्याय के नाम पर कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि स्थायी लोक अदालतों को सिविल अदालतों के विकल्प के रूप में इस्तेमाल करना विधि के मूल सिद्धांतों, न्यायिक अनुशासन और कानून के शासन के विरुद्ध होगा।

स्थायी लोक अदालतें सिविल कोर्ट नहीं

जस्टिस फरजंद अली ने अपने फैसले में कहा कि स्थायी लोक अदालतें अर्ध-न्यायिक निकाय हैं, इनका अधिकार क्षेत्र सीमित और परिभाषित है और ये जटिल संपत्ति विवादों का निस्तारण नहीं कर सकतीं।

यदि ऐसे मामलों को लोक अदालतों में सुना जाने लगा, तो इससे सिविल न्यायालयों की स्थापित व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

सभी दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने UIT बीकानेर की याचिका स्वीकार करते हुए स्थायी लोक अदालत, बीकानेर का 17 जनवरी 2018 का आदेश रद्द कर दिया।

साथ ही स्पष्ट किया कि पट्टा और संपत्ति अधिकारों से जुड़े विवाद उचित सिविल या राजस्व न्यायालय में ही उठाए जा सकते हैं।

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