केवल आदेश की सूचना राजस्थान में मिलने से नहीं बनेगा राजस्थान हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र, CRPF जवान की याचिका खारिज:
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सेवा मामलों में हाईकोर्ट के क्षेत्राधिकार को लेकर रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि केवल आदेश की सूचना किसी राज्य में मिल जाने से उस राज्य की अदालत को स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी सरकारी कर्मचारी को सेवा से हटाने का आदेश यदि किसी दूसरे राज्य में पारित हुआ है और विभागीय कार्यवाही भी वहीं संपन्न हुई है, तो केवल उस आदेश की सूचना कर्मचारी को राजस्थान में मिलने से राजस्थान हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र (Territorial Jurisdiction) स्वतः स्थापित नहीं हो जाता।
हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226(2) के तहत हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र तभी बनता है जब विवाद से संबंधित कारण-ए-दावा (Cause of Action) का कोई महत्वपूर्ण हिस्सा उस राज्य की सीमा के भीतर उत्पन्न हुआ हो।
जस्टिस प्रवीर भटनागर की एकलपीठ ने झुंझुनूं निवासी सुरेन्द्र सिंह द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए यह रिपोर्टेबल जजमेंट दिया है।
याचिकाकर्ता ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) से अपनी सेवा समाप्ति को चुनौती देते हुए पुनः नियुक्ति और सभी परिणामी लाभ देने की मांग की थी।
क्या था पूरा मामला
याचिकाकर्ता सुरेन्द्र सिंह का चयन केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में कांस्टेबल (जीडी) पद पर हुआ था।
सेवा के दौरान विभाग को यह जानकारी मिली कि नियुक्ति के समय सत्यापन प्रपत्र भरते समय याचिकाकर्ता ने एक आपराधिक मामले में अपनी कथित संलिप्तता का खुलासा नहीं किया।
इसके बाद 13 अगस्त 2008 को उसे कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
इसके बाद सीआरपीएफ अधिकारियों ने सीआरपीएफ अधिनियम, 1949 की धारा 11(1) तथा नियम 27 के तहत विभागीय जांच शुरू की।
जांच पूरी होने के बाद 21 फरवरी 2009 को अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने याचिकाकर्ता को सेवा से हटा दिया।
याचिकाकर्ता ने इस आदेश के खिलाफ विभागीय अपील और पुनरीक्षण याचिका भी दायर की, लेकिन अपील 10 अगस्त 2009 और पुनरीक्षण 11 मई 2010 को खारिज कर दिए गए। इसके बाद उसने राजस्थान हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की।
याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत में दलील दी कि नियुक्ति के समय उसके खिलाफ कोई लंबित आपराधिक मामला नहीं था और उसने किसी भी तथ्य को जानबूझकर छिपाया नहीं था।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जिस आपराधिक मामले का उल्लेख किया जा रहा है, वह घटना वर्ष 2001 की थी और उस मामले में ट्रायल कोर्ट ने पहले ही उसे बरी कर दिया था। साथ ही उस समय वह नाबालिग भी था।
इसलिए सत्यापन प्रपत्र में किसी लंबित मामले का खुलासा करना आवश्यक नहीं था।
इसके अलावा अधिवक्ता ने यह भी कहा कि यद्यपि सेवा समाप्ति का आदेश अन्य राज्य में पारित हुआ था, लेकिन वह आदेश याचिकाकर्ता को राजस्थान स्थित उसके निवास पते पर प्राप्त हुआ।
इसलिए आदेश की सूचना राजस्थान में मिलने के कारण आंशिक कारण-ए-दावा राजस्थान में उत्पन्न हुआ और इस आधार पर हाईकोर्ट को याचिका सुनने का अधिकार है।
CRPF का जवाब
CRPF की ओर से अधिवक्ताओं ने याचिका का विरोध करते हुए आपत्ति जताई कि राजस्थान हाईकोर्ट को इस मामले में क्षेत्राधिकार ही प्राप्त नहीं है।
उन्होंने कहा कि विभागीय जांच, सेवा समाप्ति का आदेश, अपील और पुनरीक्षण—सभी कार्यवाही राजस्थान के बाहर हुई हैं। इसलिए केवल आदेश की सूचना राजस्थान में मिलने को आधार बनाकर यहां याचिका दायर नहीं की जा सकती।
CRPF ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल आदेश की प्राप्ति को कारण-ए-दावा नहीं माना जा सकता, जब तक वह विवाद के मूल तथ्यों से सीधे जुड़ा न हो।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने मामले के तथ्यों और सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का विश्लेषण करते हुए कहा कि कारण-ए-दावा (Cause of Action) वह तथ्यात्मक आधार होता है जिसके आधार पर कोई व्यक्ति अदालत से राहत मांग सकता है।
कोर्ट ने कहा कि सेवा से संबंधित मामलों में सामान्यतः कारण-ए-दावा उस स्थान पर उत्पन्न होता है जहां विभागीय कार्यवाही शुरू हुई, जांच पूरी हुई और सेवा समाप्ति का आदेश पारित किया गया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी का निवास स्थान या वहां आदेश की सूचना मिलना अपने आप में ऐसा महत्वपूर्ण तथ्य नहीं है जिससे अदालत का क्षेत्राधिकार स्थापित हो जाए।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में विभागीय कार्यवाही, सेवा समाप्ति का आदेश तथा अपील और पुनरीक्षण सभी प्रक्रियाएं राजस्थान के बाहर हुईं।
इसलिए केवल आदेश की सूचना राजस्थान में मिलने से यहां आंशिक कारण-ए-दावा उत्पन्न नहीं माना जा सकता।
याचिका खारिज, उचित मंच पर जाने की छूट
इन सभी तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में राजस्थान हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने गलत मंच पर रिट याचिका दाखिल की है। इसलिए याचिका को क्षेत्राधिकार के अभाव (Lack of Territorial Jurisdiction) के आधार पर प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज किया जाता है।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता यदि चाहे तो उचित न्यायिक मंच के समक्ष अपनी शिकायत लेकर जा सकता है।