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सरकारी कर्मचारियों के निलंबन आदेश पर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: केवल तकनीकी त्रुटि से रद्द नहीं होगा सस्पेंशन, ट्रिब्यूनल का आदेश निरस्त

Rajasthan High Court Says Maternity Leave Cannot Be Denied Solely for Third Child

जस्टिस रेखा बोराना ने कहा-निलंबन सजा नहीं, प्रशासनिक कार्रवाई है; तीन महीने में चार्जशीट न देना भी हर मामले में निलंबन को अवैध नहीं बनाता

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के निलंबन (Suspension) से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि निलंबन आदेश में विभागीय जांच (Inquiry) शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं भी हो, लेकिन रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हो कि विभाग जांच शुरू करने का निर्णय ले चुका था, तो केवल इस तकनीकी आधार पर निलंबन आदेश को अवैध नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि निलंबन स्वयं में कोई सजा (Punishment) नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक कार्रवाई (Administrative Action) है।

जस्टिस रेखा बोराना ने राज्य सरकार की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला दिया।

राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण (Rajasthan Civil Services Appellate Tribunal) के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें एक महिला चिकित्सक के निलंबन को रद्द कर दिया गया था।

साथ ही, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा 9 अप्रैल 2025 को जारी निलंबन आदेश को पुनः प्रभावी कर दिया।

ट्रिब्यूनल ने इन आधारों पर रद्द किया था निलंबन

राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण ने महिला चिकित्सक के पक्ष में फैसला देते हुए कहा था कि उनका निलंबन केवल समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के आधार पर किया गया।

ट्रिब्यूनल के अनुसार, महिला चिकित्सक के विरुद्ध न तो कोई विभागीय जांच लंबित थी और न ही किसी जांच पर विचार किया जा रहा था।

इसके अलावा, निलंबन से पहले कोई प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) नहीं की गई और न ही संबंधित कर्मचारी को कोई नोटिस दिया गया।

ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा था कि निलंबन एक गंभीर दंडात्मक कार्रवाई है, इसलिए इसे सामान्य तरीके से पारित नहीं किया जा सकता। साथ ही, निलंबन के तीन महीने के भीतर आरोपपत्र (Charge-sheet) भी जारी नहीं किया गया।

राज्य सरकार की ओर से बहस

राज्य सरकार की ओर से एजीसी अर्चित बोहरा ने दलील दी कि राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण द्वारा अपील स्वीकार करने के लिए दिए गए सभी आधार कानून के विपरीत हैं।

उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ के State of Rajasthan & Ors. v. Manvendra Singh तथा State of Rajasthan & Ors. v. Dr. Rajesh Kumar Sharma सहित एकलपीठ के Kiran Singaria v. State of Rajasthan और Brijmohan Sihag v. State of Rajasthan के निर्णयों पर भरोसा जताते हुए कहा कि किसी कर्मचारी को निलंबित करने से पहले प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) करना या पूर्व नोटिस देना कानूनन अनिवार्य नहीं है।

सरकार ने यह भी तर्क दिया कि संबंधित कर्मचारी के विरुद्ध विभागीय जांच प्रस्तावित थी, जिसका स्पष्ट उल्लेख निलंबन आदेश में आरोपपत्र तैयार कर सक्षम प्राधिकारी को भेजने के निर्देश से होता है।

इसलिए यह कहना गलत है कि बिना जांच के विचार के निलंबन किया गया। राज्य सरकार ने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनल द्वारा अपनाए गए आधार स्थापित विधि सिद्धांतों के विपरीत हैं।

प्रत्यर्थी डॉ. मनीषा की ओर से बहस

प्रत्यर्थी की ओर से अधिवक्ता ने Yogesh Acharya v. State of Rajasthan तथा Naresh Singh v. State of Rajasthan के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 के नियम 13 के अनुसार निलंबन आदेश में यह स्पष्ट रूप से दर्ज होना चाहिए कि विभागीय जांच लंबित (Pending) है अथवा विचाराधीन (Contemplated) है।

बचाव पक्ष ने कहा कि वर्तमान मामले में निलंबन आदेश में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है, इसलिए ट्रिब्यूनल द्वारा निलंबन आदेश को निरस्त करना पूरी तरह विधिसम्मत था।

प्रत्यर्थी की ओर से यह भी दलील दी गई कि निलंबन के तीन माह के भीतर आरोपपत्र (Charge-sheet) जारी किया जाना कानून की अनिवार्य आवश्यकता है।

चूंकि इस मामले में तीन माह के भीतर आरोपपत्र जारी नहीं किया गया, इसलिए ट्रिब्यूनल का आदेश सही था और उसमें हाईकोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

ट्रिब्यूनल का दृष्टिकोण कानून के विपरीत

ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के निष्कर्षों से असहमति जताई।

अदालत ने कहा कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो निलंबन से पहले प्रारंभिक जांच करना या कारण बताओ नोटिस जारी करना अनिवार्य बनाता हो।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि निलंबन एक अंतरिम प्रशासनिक कदम है और इसे किसी भी स्थिति में दंड नहीं माना जा सकता।

“निलंबन सजा नहीं है”

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Union of India v. Ashok Kumar Aggarwal (2013) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि निलंबन का उद्देश्य केवल संबंधित कर्मचारी को कार्य से अलग रखना होता है, ताकि विभागीय जांच निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से पूरी की जा सके।

अदालत ने कहा कि निलंबन एक प्रशासनिक निर्णय है, इसलिए न्यायालयों का हस्तक्षेप सीमित होता है। अदालतें अनुशासनात्मक प्राधिकारी के निर्णय पर अपीलीय अदालत की तरह पुनर्विचार नहीं कर सकतीं।

आदेश में “जांच प्रस्तावित” शब्द नहीं था, फिर भी निलंबन वैध

हाईकोर्ट ने पाया कि यद्यपि निलंबन आदेश में स्पष्ट रूप से यह नहीं लिखा गया था कि विभागीय जांच प्रस्तावित है, लेकिन उसी आदेश के साथ संलग्न नोट में सक्षम अधिकारी को आरोपपत्र तैयार करने और विभागीय कार्रवाई प्रारंभ करने के स्पष्ट निर्देश दिए गए थे।

अदालत ने कहा कि इससे यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि सक्षम प्राधिकारी ने मामले पर विचार कर विभागीय जांच शुरू करने का निर्णय ले लिया था।

इसलिए केवल इस कारण कि आदेश में “जांच प्रस्तावित” जैसे शब्द नहीं लिखे गए, निलंबन आदेश को अवैध नहीं माना जा सकता।

तीन महीने में चार्जशीट देना अनिवार्य नहीं

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि निलंबन के तीन महीने के भीतर आरोपपत्र देना कोई कठोर वैधानिक अनिवार्यता (Mandatory Requirement) नहीं है। यह केवल एक निर्देशात्मक व्यवस्था (Directory Provision) है।

अदालत ने कहा कि यदि बाद में आरोपपत्र जारी कर दिया गया है, तो केवल इस आधार पर निलंबन आदेश स्वतः अवैध नहीं हो जाता।

इस मामले में आरोपपत्र जनवरी 2026 में जारी कर दिया गया था, इसलिए केवल देरी के आधार पर निलंबन आदेश को रद्द नहीं किया जा सकता।

ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द, निलंबन बहाल

सभी तथ्यों, रिकॉर्ड और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण के 19 अगस्त 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया तथा 9 अप्रैल 2025 को जारी मूल निलंबन आदेश को पुनर्जीवित कर दिया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि संबंधित कर्मचारी लंबे समय से निलंबित हैं, तो वे निलंबन समाप्त (Revocation of Suspension) कराने के लिए सक्षम प्राधिकारी के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं।

ऐसी स्थिति में राज्य सरकार संबंधित नियमों और प्रचलित दिशा-निर्देशों के अनुसार उस आवेदन पर विधि सम्मत निर्णय लेने के लिए बाध्य होगी।

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