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सर्जिकल ग्लव्स मशीन डिज़ाइन विवाद में राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला-निष्पादन कार्यवाही की सीमाएं तय, एक मशीन की कुर्की बरकरार, दूसरी को मिली राहत

Rajasthan High Court Defines Limits of Execution Proceedings in Surgical Gloves Machine Design Dispute

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने सर्जिकल ग्लव्स निर्माण मशीनों के डिज़ाइन, गोपनीयता समझौते और निष्पादन कार्यवाही से जुड़े विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने Anondita Healthcare कंपनी की ओर से दायर याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि निष्पादन अदालत (Executing Court) न तो डिक्री से आगे जा सकती है और न ही पुनः ट्रायल कोर्ट जैसा व्यवहार कर सकती है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने धौलपुर की Executing Court के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें एक मशीन को कुर्की से मुक्त करने और दूसरी मशीन पर कुर्की बनाए रखने के आदेश दिए गए थे।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सीपीसी की धारा 115 के तहत पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र अत्यंत सीमित है और इसमें साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन या नए दस्तावेज जोड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

ये है मामला

यह विवाद Anondita Healthcare (नोएडा) और स्वेयर हेल्थकेयर (धौलपुर) सहित अन्य पक्षकारों के बीच सर्जिकल ग्लव्स और कंडोम निर्माण में प्रयुक्त मशीनों के डिज़ाइन को लेकर उत्पन्न हुआ।

Anondita Healthcare का दावा था कि उसने वर्ष 2009 के आसपास इन मशीनों का डिज़ाइन, तकनीक और विशिष्टताएं स्वयं विकसित की थीं।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, मशीनों के निर्माण (फैब्रिकेशन) के लिए फैज़ मोहम्मद और उनके सहयोगियों को नियुक्त किया गया।

इस दौरान गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए पहले एक एमओयू और बाद में 18 अक्टूबर 2015 को एक विस्तृत गोपनीयता एवं फैब्रिकेशन समझौता किया गया।

इस समझौते के तहत फैब्रिकेटर को डिज़ाइन किसी तीसरे पक्ष के साथ साझा न करने की बाध्यता थी।

डिज़ाइन लीक और तीसरे पक्ष पर आरोप

आरोप लगाया गया कि इस समझौते के बावजूद मशीनों का डिज़ाइन स्वेयर हेल्थकेयर को उपलब्ध कराया गया और उसी आधार पर वहां मशीनों का निर्माण कर दिया गया।

इसे डिज़ाइन की चोरी और गोपनीयता समझौते का खुला उल्लंघन बताया गया।

इसके बाद Anondita Healthcare ने वर्ष 2016 में नोएडा स्थित सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत में स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) का वाद दायर किया।

समन की तामील के बावजूद प्रतिवादी अदालत में उपस्थित नहीं हुए, जिसके चलते अदालत ने 9 फरवरी 2017 को एकतरफा डिक्री पारित कर दी।

इस डिक्री में प्रतिवादी को निर्देश दिया गया कि वह Anondita Healthcare के डिज़ाइन के आधार पर बनी मशीनों को किसी अन्य को न तो हस्तांतरित करे और न ही साझा करे।

निष्पादन कार्यवाही और मशीनों की कुर्की

डिक्री के कथित उल्लंघन का आरोप लगाते हुए Anondita Healthcare ने वर्ष 2019 में निष्पादन याचिका दायर की।

प्रारंभिक तौर पर नोएडा की अदालत ने धौलपुर स्थित फैक्ट्री में लगी मशीनों को कुर्क करने का आदेश दिया, लेकिन क्षेत्राधिकार के कारण मामला धौलपुर जिला अदालत को स्थानांतरित कर दिया गया।

धौलपुर की निष्पादन अदालत ने अगस्त 2021 में फैक्ट्री में मौजूद दो मशीनों को कुर्क किया।

इसके बाद स्वेयर हेल्थकेयर ने सीपीसी की धारा 47 के तहत आपत्तियां दाखिल करते हुए कहा कि एक मशीन 2015 के कथित अलग समझौते के तहत बनी थी और उसका डिक्री से कोई संबंध नहीं है।

निचली अदालत का आदेश

लंबी सुनवाई और साक्ष्यों के बाद धौलपुर जिला अदालत ने 11 नवंबर 2022 को आदेश देते हुए एक मशीन को कुर्की से मुक्त किया और दूसरी मशीन पर कुर्की को जारी रखा।

इस आदेश के खिलाफ दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

डिक्रीधारक ने मशीन रिलीज को चुनौती दी, जबकि जजमेंट डेब्टर्स ने कुर्की जारी रखने पर आपत्ति जताई।

हाईकोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें

हाईकोर्ट में Anondita Healthcare की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि निष्पादन अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्णय किया और 29 जनवरी 2015 के कथित समझौते की केवल फोटो कॉपी पर भरोसा किया।

अधिवक्ता ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 के तहत द्वितीयक साक्ष्य की शर्तें पूरी नहीं की गईं।

उनका कहना था कि एक मशीन को रिलीज करना डिक्री की भावना के विपरीत है।

वहीं दूसरी तरफ जजमेंट डेब्टर्स स्वेयर हेल्थकेयर की ओर से कहा गया कि मूल डिक्री में मशीनों की कुर्की का कोई निर्देश नहीं था।

अधिवक्ता ने कहा कि निष्पादन अदालत डिक्री से आगे नहीं जा सकती और कुर्की जारी रखने के लिए पर्याप्त कारण दर्ज नहीं किए गए।

हाईकोर्ट का आदेश

दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि—

निष्पादन अदालत डिक्री के पीछे नहीं जा सकती, लेकिन डिक्री के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठा सकती है।

धारा 47 सीपीसी के तहत उठाए गए प्रश्न केवल निष्पादन, संतुष्टि या निर्वहन तक सीमित होते हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 115 सीपीसी के तहत पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र में अदालत अपीलीय अदालत की तरह कार्य नहीं कर सकती।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुनरीक्षण स्तर पर अतिरिक्त दस्तावेज पेश करना निष्पादन रिकॉर्ड को बढ़ाने जैसा होगा, जो कानूनन अस्वीकार्य है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने धौलपुर की Executing Court के आदेश पर मुहर लगाते हुए एक मशीन को कुर्की से मुक्त रखने का आदेश बरकरार रखा, वहीं दूसरी मशीन पर कुर्की जारी रखने का आदेश भी बरकरार रखा गया।

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