जयपुर, 8 दिसंबर 2025
राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने सोमवार को सहकारी बैंक से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कॉमर्शियल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें आर्बिट्रेशन के बाद आदर्श को-ऑपरेटिव बैंक के पक्ष में दिए पंचाट यानी Arbitration के फैसले को रद्द कर दिया गया था।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने इस मामले में स्पष्ट कहा कि सहकारी बैंक से ऋण का यह विवाद सहकारी समिति अधिनियम (MSCS Act, 2002) के तहत आता है और इसमें होने वाली मध्यस्थता संविदात्मक नहीं बल्कि वैधानिक पंचाट है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सहकारी समिति अधिनियम की धारा 12(5) जैसी आपत्तियाँ इन मामलों में लागू नहीं होतीं।
मामला कैसे शुरू हुआ?
आदर्श को-ऑपरेटिव बैंक ने 2007 में प्रेम सिंह वैद्य नामक सदस्य को ₹91,000 का गृह-सुधार ऋण दिया था। कुछ समय तक किश्तें जमा हुईं, लेकिन 2009 के बाद भुगतान बंद हो गया और खाता NPA बन गया।
चूंकि प्रेम सिंह बैंक के सदस्य भी थे, इसलिए बैंक ने MSCS Act की धारा 84 के तहत विवाद को केंद्रीय रजिस्ट्रार के पास भेजा।
केंद्रीय रजिस्ट्रार ने एक स्वतंत्र Arbitrator नियुक्त किया और 11 मार्च 2016 को Arbitrator ने प्रेम सिंह के खिलाफ ₹5,20,870 की वसूली का आदेश दिया।
लगभग पाँच साल बाद प्रेम सिंह ने इस फैसले को सहकारी समिति अधिनियम की धारा 34 के तहत कॉमर्शियल कोर्ट में चुनौती दी।
कॉमर्शियल कोर्ट ने Arbitrator द्वारा दिए गए फैसले को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि दावा 3 साल की लिमिटेशन से बाहर था और मध्यस्थ की नियुक्ति धारा 12(5) के खिलाफ थी।
कॉमर्शियल कोर्ट ने कहा कि इस मामले में Arbitrator की प्रक्रिया मान्य नहीं है।
कॉमर्शियल कोर्ट के इस आदेश को आदर्श को-ऑपरेटिव बैंक ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर कर चुनौती दी.
संविदात्मक नहीं, ‘वैधानिक पंचाट’
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि MSCS Act 2002 की धारा 84 के तहत सदस्य और सहकारी बैंक के बीच ऋण-वसूली विवाद सीधे केंद्रीय रजिस्ट्रार द्वारा नियुक्त पंच को भेजा जाता है।
यहां पक्षकार arbitrator नहीं चुनते, इसलिए यह पूरी तरह statutory arbitration है और ऐसे मामलों में Arbitration Act की धारा 12(5) लागू नहीं होती।
हाईकोर्ट ने लिमिटेशन की अवधि को लेकर भी स्पष्ट किया कि MSCS Act की धारा 85(1)(b) के अनुसार ऐसे मामलों में सीमाबद्धता 6 वर्ष की होती है।
कोर्ट ने कहा कि 2009 में अंतिम किश्त और 2015 में विवाद भेजा गया, मतलब यह 6 साल के भीतर किया गया था।
वैधानिक अधिकार, न कि पक्षकार की पसंद
हाईकोर्ट ने कहा कि कॉमर्शियल कोर्ट ने Limitation Act को गलत तरीके से लागू किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में धारा 12(5) का कोई मतलब नहीं बनता क्योंकि यह तभी लागू होती है जब Arbitrator किसी पक्ष द्वारा नियुक्त हो या पक्षकार से संबंधित हो।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में Arbitrator केंद्रीय रजिस्ट्रार द्वारा नियुक्त किया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि इसलिए धारा 12(5) या सातवीं अनुसूची का कोई प्रभाव नहीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत ने MSCS Act की धारा 84 व 85 पर सही ध्यान नहीं दिया और गलत तरीके से संविदात्मक पंचाट के सिद्धांत लागू कर दिए।
केंद्रीय रजिस्ट्रार द्वारा नियुक्त Arbitrator पर MSCS Act की धारा 12(5) लागू नहीं होती। हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में बैंक द्वारा की गई रिकवरी कार्रवाई कानूनन मान्य है।
हाईकोर्ट ने कॉमर्शियल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह गलत, त्रुटिपूर्ण और कानून के विपरीत बताते हुए रद्द करने का फैसला सुनाया।